न धर्म में दीपावली अहिंसा और भगवान महावीर के निर्वाण का पर्व है। राजेश जैन दद्दू ने पटाखों से होने वाली जीव हिंसा और आठ कर्मों के बंध का धार्मिक महत्व समझाया।
*जैन हूँ साहब, पटाखे नहीं फोड़ता…*
*पटाखे फोड़ने से आठ कर्मों का बंध होता है — जानिए क्यों जैन समाज दीपावली पर अहिंसा का दीप जलाता है*
*इंदौर | राजेश जैन दद्दू*
दीपावली आती है तो पूरा देश रोशनी से जगमगा उठता है। लेकिन एक जैन समाज ऐसा भी है, जो इस रोशनी में भी एक दीपक अहिंसा का जलाता है।वह कहता है —
*”जैन हूँ साहब, पटाखे नहीं फोड़ता…”*
यह कोई कमजोरी नहीं है। यह कोई डर नहीं है। यह तो भगवान महावीर के सिद्धांतों की सबसे बड़ी ताकत है। जियो और जीने दो। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि जैन धर्म कहता है — एक पटाखा फूटता है तो केवल आवाज नहीं होती, केवल रोशनी नहीं होती, उसके साथ *आठ कर्मों का बंध* होता है।
*आइए, समझें इन आठ कर्मो का गहरा अर्थ —*
*1. ज्ञानावरणीय कर्म*
पटाखे में कागज, अक्षर आदि जलते हैं। ज्ञान के साधनों को जलाने से ज्ञानावरणीय पाप बंधता है, जिससे ज्ञान और बुद्धि का नाश होता है। जो व्यक्ति ज्ञान का सम्मान नहीं करता, वह स्वयं अज्ञानी बन जाता है।
*2. दर्शनावरणीय कर्म*
पटाखों की चिंगारी जीवों के अंगों पर लगती है, उनकी आंखों को नुकसान पहुंचता है। इससे दर्शनावरणीय पाप बंधता है, जिससे देखने की शक्ति बाधित होती है। आज हम किसी जीव की आंख फोड़ेंगे, तो कल हमारी देखने की शक्ति कैसे बचेगी?
*3. वेदनीय कर्म*
जीवों को दुःख, पीड़ा और त्रास देने से असाता वेदनीय पाप बंधता है, जिससे रोग और कष्ट मिलते हैं। पटाखों की आवाज से कुत्ते, बिल्ली, पक्षी, गाय, छोटे-छोटे जीव भय से कांप उठते हैं। उनकी चीख हमें सुनाई नहीं देती, लेकिन कर्म को सब सुनाई देता है।
*4. मोहनीय कर्म*
पटाखों की आवाज और रोशनी से मोहनीय पाप बंधता है, जिससे विवेक भ्रमित होता है। क्षणिक मजा, क्षणिक रोशनी, क्षणिक शोर — यही मोह है। जो व्यक्ति इस मोह में फंस जाता है, वह सही-गलत का भेद भूल जाता है।
*5. आयुष्य कर्म*
जीव हिंसा के परिणाम से दुर्गति का आयुष्य बंधता है। एक पटाखे में लाखों सूक्ष्म जीव मर जाते हैं। हवा में, आग में, धुएं में — अनंत जीवों की हिंसा होती है। और हिंसा का फल कभी अच्छा नहीं होता।
*6. नाम कर्म*
जीवों के शरीर को नुकसान पहुंचाने से अशुभ नाम कर्म बंधता है। जो दूसरों को कुरूप करता है, जो दूसरों को विकलांग करता है, उसका स्वयं का नाम कर्म भी अशुभ हो जाता है।
*7. गोत्र कर्म*
पटाखे फोड़कर अहंकार करने से नीच गोत्र कर्म बंधता है। “मैंने सबसे बड़ा पटाखा फोड़ा, मैंने सबसे ज्यादा पैसा उड़ाया” — यही अहंकार है। और अहंकार ही मनुष्य को नीचे गिराता है।
*8. अंतराय कर्म*
जीवों के सुख-शांति में बाधा डालने से अंतराय कर्म बंधता है। जब हम पटाखे फोड़ते हैं, तो हम अस्पताल में सोए मरीज की नींद में बाधा डालते हैं, पढ़ते हुए बच्चे की पढ़ाई में बाधा डालते हैं, सोते हुए जीवों की शांति में बाधा डालते हैं। और जो दूसरों के सुख में बाधा डालता है, उसके स्वयं के सुख में भी बाधा आ जाती है। इसलिए
जैन पटाखा नहीं फोड़ता, लेकिन वह दीपक जरूर जलाता है।
जैन शोर नहीं करता, लेकिन वह भगवान महावीर का जयकारा जरूर लगाता है।
जैन जीवों को डराता नहीं, बल्कि जीवों को अभयदान देता है।
क्योंकि दीपावली का असली अर्थ है — *अंधकार से प्रकाश की ओर, हिंसा से अहिंसा की ओर, मोह से मुक्ति की ओर।*
भगवान महावीर ने कार्तिक अमावस्या की रात को निर्वाण प्राप्त किया था। उस रात देवों ने ढोल बजाए दीपक जलाए थे। इसलिए हम दीपक जलाते हैं, पटाखे नहीं फोड़ते। आओ हम सब मिलकर इस दीपावली पर संकल्प लें —*
– हम पटाखे नहीं फोड़ेंगे।
– हम जीवों को नहीं डराएंगे।
– हम हवा को प्रदूषित नहीं करेंगे।
– हम अपने बच्चों को अहिंसा का संस्कार देंगे।
*अहिंसा परमो धर्मः*
*निवेदन —*
*राजेश जैन दद्दू*
इंदौर*
