राग-द्वेष और कषाय से मुक्ति ही सच्ची अहिंसा: जैनाचार्य उदारसागर
मुरैना (मनोज जैन नायक)। श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने हिंसा और अहिंसा के सूक्ष्म स्वरूप पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंसा केवल किसी जीव के प्राण लेने तक सीमित नहीं है। आत्मा में उत्पन्न होने वाले राग-द्वेष और क्रोध, मान, माया तथा लोभ जैसे कषाय भी हिंसा के मूल कारण हैं। अहिंसा का वास्तविक पालन तभी संभव है, जब व्यक्ति बाहरी व्यवहार के साथ अपने भीतर के विकारी भावों को भी पहचानकर उनसे मुक्त होने का प्रयास करे।
आचार्यश्री ने जैन दर्शन के महत्वपूर्ण ग्रंथ पुरुषार्थसिद्ध्युपाय के आधार पर द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा का विस्तार से विवेचन किया। उन्होंने कहा कि किसी जीव के प्राणों का घात द्रव्य हिंसा है, जबकि मन में उत्पन्न राग, द्वेष और अन्य कषाय भाव भाव हिंसा से जुड़े हैं। किसी जीव की मृत्यु हो जाना ही हिंसा का पूरा स्वरूप नहीं बताता; उसके पीछे व्यक्ति की भावना, सावधानी और आत्मा के परिणामों को भी समझना आवश्यक है।
मन, वचन और काया की प्रवृत्तियों में रखें सावधानी
आचार्यश्री ने हिंसा के छह प्रकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका सूक्ष्म विवेचन करते समय केवल बाहरी क्रिया पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति के मन के परिणाम और उसके भीतर उठने वाले भाव भी महत्वपूर्ण हैं। मन, वचन और काया से होने वाली प्रत्येक प्रवृत्ति में सावधानी रखना तथा विकारी भावों को दूर करने का प्रयास करना अहिंसा की दिशा में वास्तविक पुरुषार्थ है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि अहिंसा को केवल व्यवहार का नियम न मानें, बल्कि उसे आत्मशुद्धि का मार्ग समझें। दूसरों के प्रति करुणा, मैत्री और संवेदनशीलता का भाव रखते हुए अपने मन को राग-द्वेष से मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए। जब व्यक्ति अपने भीतर के कषायों पर विजय पाने का अभ्यास करता है, तभी अहिंसा का सच्चा स्वरूप प्रकट होता है। आत्मा को निर्मल परिणामों की ओर ले जाना ही जिनशासन की भावना है।
विचार, वाणी और व्यवहार में अहिंसा का संदेश
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने भी अहिंसा के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रत्येक कार्य में विवेक और सावधानी रखनी चाहिए। केवल शरीर से किसी जीव को कष्ट न पहुंचाना ही पर्याप्त नहीं है; मन में किसी के प्रति द्वेष, वैर या दुर्भावना न रखना भी जरूरी है।
मुनिश्री ने कहा कि जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोच्च धर्म माना गया है। इसलिए व्यक्ति को अपने विचारों, वाणी और व्यवहार में अहिंसा अपनानी चाहिए और सभी जीवों के प्रति मैत्री तथा करुणा का भाव रखना चाहिए। आत्मकल्याण के लिए अपने परिणामों को निर्मल बनाना और कषायों से दूर रहने का प्रयास आवश्यक है।
जैन दर्शन का मूल संदेश “अहिंसा परमो धर्मः” है। इसके अनुसार किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से नुकसान न पहुंचाना सर्वोच्च नैतिक भावना है। हिंसक और दुर्भावनापूर्ण परिणाम आत्मा को अशुद्ध करते हैं तथा आत्मकल्याण के मार्ग में बाधा बनते हैं। इसीलिए अहिंसा का अभ्यास बाहरी आचरण के साथ-साथ भीतर के भावों में भी होना चाहिए।
अहिंसा के तीन स्तर बताए


धर्मसभा में अहिंसा के तीन स्तरों—मन, वचन और काया—की महत्ता भी समझाई गई। मन की अहिंसा का अर्थ है कि किसी के प्रति बुरा विचार, द्वेष, क्रोध या हिंसा की भावना न रखी जाए। वचन की अहिंसा में कठोर, झूठी या किसी को मानसिक कष्ट पहुंचाने वाली वाणी से बचना शामिल है। वहीं काया की अहिंसा का आशय शरीर से किसी जीव की हत्या या उसे चोट न पहुंचाने से है।
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि वे अपने दैनिक जीवन में इन तीनों स्तरों पर सावधानी बरतें। मन में मैत्री, वाणी में मधुरता और व्यवहार में करुणा रखकर व्यक्ति अहिंसा के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
9 नवंबर को होगा श्री महावीर महामंडल विधान
विद्वान नवनीत जैन शास्त्री ने धर्मसभा में आगामी आयोजन की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आचार्यश्री उदारसागर महाराज एवं मुनिश्री उपशांतसागर महाराज के ससंघ सान्निध्य में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में सोमवार, 9 नवंबर 2026 को प्रातः 7 बजे से श्री महावीर महामंडल विधान आयोजित किया जाएगा।
भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष कल्याणक के पावन अवसर पर निर्वाण कल्याणक की भावना के साथ निर्वाण लड्डू समर्पित किया जाएगा। समाज के धर्मप्रेमी बंधुओं से विधान में शामिल होकर धर्मलाभ लेने का आग्रह किया गया है।
धर्मसभा का संचालन विद्वान श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। श्रीमती गुंजन जैन ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। इस अवसर पर समाज के गणमान्य सदस्यों ने दीप प्रज्वलन और चित्र अनावरण किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
