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2009-2019 का बकाया DA जारी करने का आदेश, ममता सरकार की वित्तीय तंगी वाली दलीलों को खारिज

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Published On: 5 February 2026
Supreme Court Orders West Bengal to Pay Pending DA from 2009-2019 to Employees
— Supreme Court Orders West Bengal to Pay Pending DA from 2009-2019 to Employees

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SC ने पश्चिम बंगाल कर्मचारियों के महंगाई भत्ते को वैधानिक अधिकार करार दिया, 

नई दिल्ली: SC ने पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ा झटका देते हुए राज्य कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (Dearness Allowance – DA) को उनका वैधानिक अधिकार घोषित कर दिया है। जस्टिस संजय करोल और पीके मिश्रा की बेंच ने 2009 से 2019 तक का बकाया DA जारी करने का आदेश देते हुए ममता बनर्जी सरकार की वित्तीय तंगी वाली दलीलों को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि DA केवल एक भत्ता नहीं बल्कि कर्मचारियों के वेतन का अभिन्न हिस्सा है और ROPA नियमों (Rules of Pay Allocation) के तहत परिलब्धियों की गणना में इसे अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा वित्तीय क्षमता का हवाला देकर DA देने से इनकार करना कानूनी तौर पर सही नहीं है।

बकाया DA भुगतान के लिए विशेष कमेटी का गठन

SC ने इस भुगतान की प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए एक स्पेशल कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी की अध्यक्षता पूर्व जस्टिस इंदु मल्होत्रा करेंगी। इसके अलावा समिति में दो सेवानिवृत्त हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीश और कैग (CAG) के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश राज्य सरकार द्वारा पिछली कानूनी हारों के खिलाफ अपीलों पर आया है। इन पिछली मामलों में अदालत ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन राज्य सरकार द्वारा इसे लागू करने में विलंब किया गया था।

कोर्ट ने राज्य सरकार के तर्क खारिज किए

पश्चिम बंगाल सरकार ने अपनी अपील में वित्तीय तंगी और बजट की सीमाओं को आधार बनाकर DA भुगतान से इनकार करने की कोशिश की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि एक बार जब किसी कर्मचारी को कोई अधिकार ROPA नियमों के तहत प्रदान कर दिया गया है, तो किसी भी वित्तीय नीति के कारण इसे रोका नहीं जा सकता।

कोर्ट ने राज्य सरकार के DA नियमों में बदलाव को ‘मनमाना’ (Capricious) और ‘सनकी’ (Arbitrary) करार दिया। न्यायालय ने कहा कि नियमों में अचानक बदलाव से कर्मचारियों के अंदर वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) पैदा हुई थी, जिसे बिना ठोस कारण उल्लंघन करना गलत है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के तर्क को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार ने अपनी शक्ति थोप दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कल्पना की उपज है और न्यायिक समीक्षा के दौरान राज्य की यह दलील टिकाऊ नहीं ठहराई जा सकती।

DA को गतिशील और आवश्यक माना

कोर्ट ने यह भी बताया कि DA कोई स्थिर (Static) वस्तु नहीं है बल्कि यह गतिशील (Dynamic) है। ROPA नियम इसमें बदलाव की अनुमति देते हैं, लेकिन यह बदलाव कर्मचारियों के हितों के खिलाफ नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महंगाई भत्ते को वेतन के हिस्से के रूप में शामिल करना अनिवार्य है और इसे कर्मचारियों से छीनना या विलंब करना कानून के खिलाफ है।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि साल में दो बार DA का भुगतान नहीं किया जा सकता। महंगाई भत्ते को मौलिक अधिकार मानने के सवाल को सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के उपयुक्त मंच पर विचार के लिए छोड़ दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का महत्व

यह फैसला पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों के लिए वित्तीय सुरक्षा और कानूनी अधिकारों की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है। कोर्ट के इस आदेश से स्पष्ट संदेश गया कि:

  1. कर्मचारी अधिकारों को वित्तीय कठिनाइयों के पीछे नहीं दबाया जा सकता।
  2. ROPA नियमों के तहत उपलब्ध सुविधाओं में DA अनिवार्य है।
  3. राज्य सरकार के नियमों में अचानक बदलाव कर्मचारी की वैध अपेक्षाओं का उल्लंघन है।

विशेष कमेटी द्वारा भुगतान की प्रक्रिया निर्धारित करने से यह सुनिश्चित होगा कि कर्मचारियों को उनका पूर्ण बकाया DA 2009 से 2019 तक समय पर और उचित तरीके से मिल सके।

कर्मचारियों के लिए राहत

इस आदेश के बाद राज्य सरकार के कर्मचारियों को करीब एक दशक से लंबित महंगाई भत्ते मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। कर्मचारियों ने लंबे समय से DA भुगतान के लिए अदालतों में याचिकाएं दायर की थीं। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उनके वित्तीय हितों की रक्षा सुनिश्चित हो गई है।

विशेष रूप से सरकारी कर्मचारियों का यह मानना है कि महंगाई भत्ता केवल वेतन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह जीवन यापन की लागत में वृद्धि और महंगाई से बचाव के लिए जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैधानिक अधिकार मानकर कर्मचारियों की मांगों को न्यायसंगत ठहराया।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश पश्चिम बंगाल सरकार के लिए कड़ा संदेश है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून और कर्मचारियों के अधिकारों के बीच किसी भी तरह का समझौता स्वीकार्य नहीं है।

2009 से 2019 तक के बकाया DA का भुगतान न केवल कर्मचारियों के वित्तीय हितों की रक्षा करेगा, बल्कि राज्य सरकार के लिए भी यह प्रशासनिक और कानूनी जिम्मेदारी बन जाएगा।

इस निर्णय से यह भी स्पष्ट हुआ कि सुप्रीम कोर्ट कर्मचारी अधिकारों के पक्ष में और राज्य सरकारों के मनमाने फैसलों के खिलाफ कड़ा रुख अपना रही है। भविष्य में अन्य राज्यों में भी कर्मचारियों के DA भुगतान और वेतन संबंधी मुद्दों में यह फैसला मार्गदर्शक साबित हो सकता है।

 

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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