भारत और फ्रांस के प्रदर्शनों पर UN के बयानों की तुलना, रुख को लेकर उठे सवाल
भारत में पुलिस कार्रवाई पर चिंता जताई; यूरोप के कई देशों के प्रदर्शनों के बीच UN मानवाधिकार प्रमुख ने बातचीत को बताया आगे का रास्ता
नई दिल्ली। भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और फ्रांस सहित यूरोप के कई देशों में जारी विरोध-प्रदर्शनों पर संयुक्त राष्ट्र के अलग-अलग बयानों के बाद उसके रुख को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने भारत और यूरोप के प्रदर्शनों पर इस्तेमाल की गई भाषा की तुलना करते हुए संयुक्त राष्ट्र पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाया है। हालांकि, ये दोनों बयान अलग संदर्भों में दिए गए थे।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों की जांच करने की अपील की थी। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने अल्बानिया, बेल्जियम, फ्रांस, इटली और पुर्तगाल में हो रहे प्रदर्शनों पर चिंता जताई। उन्होंने हिंसा की निंदा करते हुए तनाव कम करने और समावेशी एवं सुरक्षित बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की।
भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर चिंता
संयुक्त राष्ट्र जिनेवा की ओर से साझा संदेश में 20 से अधिक स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों की अपील का उल्लेख किया गया। विशेषज्ञों ने भारतीय अधिकारियों से शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने के अधिकार का सम्मान करने, उसकी रक्षा करने और उसे सुनिश्चित करने को कहा। उन्होंने भारत में हालिया प्रदर्शनों और इससे पहले हुई घटनाओं के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों पर भी चिंता जताई।
इस संदेश में प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और कथित उल्लंघनों की जवाबदेही पर जोर दिया गया। इसी भाषा को लेकर भारत में बहस शुरू हुई और कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या संयुक्त राष्ट्र ने भारत के मामले में ज्यादा सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया।
यूरोप के प्रदर्शनों पर बातचीत की अपील
यूरोप के कई देशों में बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों को लेकर वोल्कर तुर्क ने कहा कि वहां मानवाधिकार से जुड़ी चिंताएं हैं। उन्होंने हिंसा की घटनाओं की निंदा की और संबंधित पक्षों से तनाव कम करने तथा आगे हिंसा रोकने की अपील की। उनके संदेश में बातचीत को आगे बढ़ने का सबसे अच्छा और एकमात्र रास्ता बताया गया।
भारत और यूरोप से संबंधित इन बयानों की तुलना के बाद सोशल मीडिया पर संयुक्त राष्ट्र की भाषा को लेकर बहस छिड़ गई। आलोचकों का कहना है कि भारत में पुलिस कार्रवाई को लेकर जारी बयान की भाषा अधिक कड़ी थी, जबकि यूरोप के प्रदर्शनों के संबंध में संवाद और तनाव कम करने पर जोर दिया गया। इस तुलना के आधार पर संयुक्त राष्ट्र के रुख पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
UN मंच पर भारत ने भी रखी अपनी बात
संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत की ओर से विदेश मंत्रालय की प्रतिनिधि बरखा ताम्रकार ने देश का पक्ष रखा। उन्होंने कानून के शासन, संवैधानिक सुरक्षा उपायों और जवाबदेही के महत्व पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि बिना पुष्टि किए गए आरोपों को किसी फैसले की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों की रिपोर्ट पर भी आपत्ति जताई थी। भारतीय पक्ष ने सवाल किया कि यदि युवाओं को अपनी बात रखने और सरकार से सवाल करने की स्वतंत्रता नहीं होती, तो वे राजधानी तक मार्च कैसे कर सकते और देश के वरिष्ठ नेताओं के साथ बातचीत कैसे कर पाते। भारत की ओर से यह भी कहा गया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत लोगों को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है।
अलग बयानों के संदर्भ पर भी चर्चा
दोनों मामलों में संयुक्त राष्ट्र के बयानों का संदर्भ अलग था। भारत के संबंध में मानवाधिकार विशेषज्ञों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और कथित उल्लंघनों की जवाबदेही पर बात की, जबकि यूरोप के संदर्भ में मानवाधिकार प्रमुख ने कई देशों में विरोध-प्रदर्शनों, हिंसा और तनाव कम करने की जरूरत का उल्लेख किया।
इसी अंतर को लेकर आलोचना और बहस जारी है। कुछ लोग इसे संयुक्त राष्ट्र के दोहरे रवैये के रूप में देख रहे हैं, जबकि बयान के समर्थक इसे अलग-अलग परिस्थितियों पर दी गई प्रतिक्रियाएं बताते हैं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए आरोपों की पुष्टि और निष्पक्ष आकलन की आवश्यकता पर जोर दिया है।
