आचार्य विशुद्ध सागर जी प्रवचन 05 अगस्त 2026 में जानिए विचारों की शक्ति, अनुशासन, आत्मशांति, धर्म और कर्म पर आधारित 5 दिव्य जीवन सूत्र। दिल्ली ऋषभ विहार से विशेष आध्यात्मिक संदेश।
आचार्य विशुद्ध सागर जी प्रवचन 05 अगस्त 2026: 5 दिव्य जीवन सूत्र, जो बदल सकते हैं आपका जीवन
संवाददाता : राजेश जैन दद्दू
संकलन : मुनि सुव्रत सागर जी
स्थान : ऋषभ विहार, दिल्ली
दिल्ली के ऋषभ विहार में विराजमान चर्या शिरोमणि दिगम्बर जैनाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन को सफल, शांत और अनुशासित बनाने वाले अनेक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश दिए। आचार्य विशुद्ध सागर जी प्रवचन 05 अगस्त 2026 में उन्होंने स्पष्ट कहा कि मनुष्य का भविष्य उसके विचारों से बनता है। यदि विचार श्रेष्ठ होंगे तो आचरण भी श्रेष्ठ होगा और जीवन स्वतः ही सफलता एवं आनंद की ओर अग्रसर होगा।उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जीवन जीने की श्रेष्ठ कला है। मनुष्य यदि अपने विचारों को पवित्र बना ले, तो उसका संपूर्ण जीवन बदल सकता है।
विचारों के अनुसार आचार
आचार्य श्री ने कहा कि विचार ही मनुष्य को उठाते हैं और विचार ही गिराते हैं। अच्छे विचार व्यक्ति को भगवान के समान महान बना सकते हैं, जबकि बुरे विचार उसे पतन की ओर ले जाते हैं।उन्होंने कहा—“आज के विचार ही कल का भविष्य बनते हैं।”यदि जीवन में श्रेष्ठ आचरण चाहिए तो सबसे पहले विचारों को पवित्र बनाना होगा। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व और व्यवहार बन जाता है।उन्होंने कहा कि विचारवान व्यक्ति ही सुख, समृद्धि और सफलता का वास्तविक अधिकारी होता है।
धन नहीं, धर्म से जीवन होता है धन्य
आचार्य श्री ने कहा कि आत्मिक सुख पाने के लिए धन पर नहीं, आत्मा पर ध्यान देना आवश्यक है।उन्होंने कहा—“धन से जीवन धन्य नहीं होता, धर्म से जीवन धन्य होता है।”उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से धर्म को समझने, जानने और उसकी अनुभूति करने का संदेश दिया। धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति ही वास्तविक शांति, आनंद और आत्मसंतोष प्राप्त करता है।
कोई किसी का कर्ता नहीं
प्रवचन में आचार्य श्री ने जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों को समझाते हुए कहा कि संसार का कोई कर्ता या विनाशक नहीं है। जगत का परिवर्तन स्वाभाविक रूप से होता रहता है।उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव स्वतंत्र सत्ता रखता है। मनुष्य अपने कर्मों का स्वयं निर्माता है और उसी के अनुसार फल प्राप्त करता है।उन्होंने कहा—“भाव ही भव के निर्माता होते हैं।”अर्थात मनुष्य के भाव ही उसके भविष्य का निर्माण करते हैं।
अनुशासन सफलता का मंत्र
आचार्य विशुद्ध सागर जी ने अनुशासन को जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बताया।उन्होंने कहा कि यदि जीवन में उन्नति चाहिए तो आत्मानुशासन अपनाना आवश्यक है।उनके अनुसार—
- अनुशासन सफलता का मंत्र है।
- अनुशासन श्रेष्ठता की पहचान है।
- अनुशासन आनंद का द्वार है।
- अनुशासन विद्यार्थियों के लिए वरदान है।
- अनुशासन व्यक्ति को समाज में सम्मान दिलाता है।
उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से अनुशासनप्रिय बनने और आनंदपूर्वक जीवन जीने का आह्वान किया।
जीवन का सार
आचार्य श्री ने अपने प्रवचन का सार बताते हुए कहा कि यदि मनुष्य अपने विचारों को श्रेष्ठ बनाए, धर्म को जीवन में उतारे, कर्मों की जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार करे और अनुशासन का पालन करे तो उसका जीवन स्वतः ही सुख, शांति और आनंद से भर जाएगा।उन्होंने कहा कि बाहरी संपत्ति से अधिक महत्वपूर्ण आत्मिक संपत्ति है। जो व्यक्ति आत्मा की ओर ध्यान देता है, वही वास्तविक सुख प्राप्त करता है।
मुख्य संदेश
- विचारों को पवित्र बनाइए।
- धर्म को जीवन में अपनाइए।
- कर्मों की जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार कीजिए।
- अनुशासन को जीवन का आधार बनाइए।
- आत्मा पर ध्यान देकर वास्तविक आनंद प्राप्त कीजिए।

