उत्तम तप धर्म पर पं. संयम शास्त्री ने कहा—भेद-विज्ञान से समझें आत्मा का स्वरूप
विदिशा के शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में दशलक्षण पर्व के सातवें दिन हुए प्रवचन; बच्चों ने धार्मिक नाटक प्रस्तुत किया
विदिशा। श्री शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में दशलक्षण पर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म मनाया गया। मुंबई से आए पं. संयम शास्त्री ने स्वाध्याय और प्रवचन में तप के बाहरी तथा भीतरी स्वरूप पर बात की। उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मा और शरीर के बीच अंतर को समझने तथा धार्मिक क्रियाओं के साथ आत्मचिंतन करने का आग्रह किया।
मंदिर ट्रस्ट के प्रवक्ता डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि पं. संयम शास्त्री का नाटक समयसार ग्रंथ पर स्वाध्याय चल रहा है। सुबह के स्वाध्याय में उन्होंने ग्रंथ के 11वें छंद की चर्चा करते हुए ‘भेद-विज्ञान’ का अर्थ समझाया। उनके अनुसार, भेद-विज्ञान का आशय अपने आत्मस्वरूप और उससे अलग वस्तुओं के बीच अंतर पहचानने से है।
“केवल क्रिया को ही धर्म न मानें”
पं. संयम शास्त्री ने प्रवचन में कहा कि उपवास, स्वाध्याय और तप का महत्व आत्मबोध से जुड़ने पर है। अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने चेक का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि चेक पर केवल शून्य लिखे हों और उनके आगे एक का अंक न हो, तो उनका कोई मूल्य नहीं बनता। इसी तरह उनके अनुसार भेद-विज्ञान के बिना धार्मिक क्रियाओं का आध्यात्मिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
उन्होंने कहा कि शरीर से जुड़ी क्रियाओं को ही धर्म का पूरा स्वरूप मान लेना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति को यह भी विचार करना चाहिए कि वह अपने भीतर क्या बदलाव ला रहा है। पं. शास्त्री ने श्रद्धालुओं के सामने सवाल रखा—“मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और मेरा स्वरूप क्या है?” उन्होंने इन प्रश्नों पर मनन को आत्मचिंतन का आधार बताया।
प्रवचन के दौरान उन्होंने शरीर, धन और परिवार के प्रति लगाव का उदाहरण देकर कहा कि परिवर्तनशील वस्तुओं को स्थायी मानने से दुख पैदा होता है। उनके अनुसार, ज्ञानी व्यक्ति यह देखता है कि वह किसे अपना मान रहा है और उस भावना का उसके जीवन पर क्या असर पड़ता है।
बाहरी और भीतरी तप का बताया महत्व
सायंकालीन प्रवचन में पं. संयम शास्त्री ने उत्तम तप धर्म पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि तप का बाहरी रूप उपवास, कम भोजन करना और स्वाद का त्याग करना हो सकता है। इसके साथ ही विनम्रता, अपनी गलतियों को स्वीकार करना, सेवा, स्वाध्याय और ध्यान को उन्होंने भीतरी तप बताया।
उन्होंने कहा कि उपवास के बाद यदि मन में अहंकार बढ़ जाए, तो तप का उद्देश्य पूरा नहीं होता। उनके अनुसार सच्चा तप इच्छाओं को शांत करने और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने से जुड़ा है। उन्होंने श्रद्धालुओं को धार्मिक अभ्यास के साथ अपने व्यवहार और विचारों पर भी ध्यान देने का संदेश दिया।
बच्चों ने प्रस्तुत किया धार्मिक नाटक
डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि सायंकालीन कार्यक्रम में वीतराग विज्ञान पाठशाला के बच्चों ने जैन विद्वान गोपाल दास जी बरैया के जीवन पर आधारित धार्मिक नाटक प्रस्तुत किया। बच्चों ने अभिनय के माध्यम से धर्म से जुड़ी बातों को सरल ढंग से सामने रखा।
ट्रस्ट के अनुसार, रात्रि में ‘जीवन यात्रा: संसार से मोक्षमार्ग तक’ शीर्षक लघु नृत्य नाटिका का मंचन किया जाएगा। ट्रस्ट अध्यक्ष मलुकचंद जैन ने श्रद्धालुओं से मंदिर में चल रहे स्वाध्याय और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होकर धर्मलाभ लेने की अपील की है।
