अम्बाह जैन बगीची में उत्तम त्याग धर्म पर आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि सच्चा त्याग वस्तुओं का नहीं, मोह, अहंकार और ‘मेरापन’ का होता है।
त्याग वस्तुओं का नहीं, मन में बसे ‘मेरापन’ का होना चाहिए: आर्यिका संगममति
दैनिक स्वराज वाणी
संवाददाता: मनोज जैन नायक
दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन अम्बाह जैन बगीची में मनाया गया उत्तम त्याग धर्म
अम्बाह/मुरैना। दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन अम्बाह स्थित जैन बगीची में उत्तम त्याग धर्म श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। प्रातःकाल से श्रद्धालुओं ने अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में उत्साहपूर्वक भाग लिया।
प्रवचन सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री सिद्धांत सागर महाराज की शिष्या परम पूज्य गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ने उत्तम त्याग धर्म का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि त्याग का अर्थ केवल वस्तुओं को छोड़ना नहीं, बल्कि उनके प्रति मन में बसे मोह, ममता और ‘मेरापन’ की भावना का त्याग करना है।
आर्यिका माताजी ने कहा कि मनुष्य जीवनभर धन, संपत्ति, परिवार और भौतिक वस्तुओं को अपना मानकर उनके संग्रह में लगा रहता है, लेकिन मृत्यु के समय सबकुछ यहीं छूट जाता है। इसलिए हमारे पास जो कुछ भी है, उस पर पूर्ण स्वामित्व की भावना रखने के बजाय उसका सदुपयोग करना और आवश्यकता पड़ने पर त्याग करना चाहिए। यही सच्चे त्याग की भावना है।
उन्होंने कहा कि राग-द्वेष, मोह और परिग्रह आत्मा को बंधन में रखने वाले तत्व हैं। जब तक मनुष्य इनसे बंधा रहता है, तब तक उसे आत्मिक शांति प्राप्त नहीं हो सकती। त्याग का संबंध बाहरी वस्तुओं से कम और मन के भावों से अधिक है। व्यक्ति घर-परिवार में रहते हुए भी आसक्ति, अहंकार, लोभ और स्वार्थ का त्याग कर सकता है।
आर्यिका माताजी ने कहा कि वास्तविक त्याग वही है, जिसके बाद मन हल्का हो और दूसरों के प्रति करुणा, प्रेम तथा सहयोग की भावना बढ़े। दान में वस्तु से अधिक भावना का महत्व होता है। यदि दान करते समय अहंकार आ जाए तो उसकी पवित्रता कम हो जाती है। सच्चा दान वही है, जिसमें देने वाले के मन में अहंकार न हो और प्राप्त करने वाले के प्रति सम्मान बना रहे।
उन्होंने श्रद्धालुओं से दशलक्षण महापर्व के धर्मों को व्यवहार में उतारने का आह्वान करते हुए कहा, “जो मिला है, वह बांटने के लिए मिला है और जो एक दिन छूट जाना है, उसके प्रति इतना मोह क्यों रखा जाए।”


