चंपाबाग जैन मंदिर में उत्तम तप धर्म की पूजा, मंत्रोच्चार के साथ चढ़ाए अर्घ्य
आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज ने कहा—भोजन छोड़ने के साथ मन की आकुलता सहना भी तप; श्रीजी का पंचामृत अभिषेक और बृहद शांतिधारा हुई
ग्वालियर। दाना ओली स्थित दिगंबर बीस पंथी चंपाबाग जैन मंदिर में पर्युषण पर्व के सातवें दिन मंगलवार को उत्तम तप धर्म मनाया गया। आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज और मुनिश्री अनुमान सागर महाराज के सानिध्य में श्रीजी का पंचामृत अभिषेक, बृहद शांतिधारा और दसलक्षण पूजन हुआ। महिलाओं, पुरुषों और बालिकाओं ने पूजन में भाग लिया तथा भगवान जिनेंद्र के समक्ष अष्ट द्रव्य से महाअर्घ्य समर्पित किए।
आकुलता सहने में भी तप का भाव: आचार्य श्री
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज ने कहा कि तप को केवल शरीर या मन तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। आत्मा में शरीर की शक्ति से भी ऊपर शक्ति है और उसे प्रकट करने का नाम तप है। उन्होंने कहा कि कई बार उपवास के दिन दोपहर बाद भोजन की इच्छा से मन में आकुलता होने लगती है। केवल भोजन छोड़ देना ही तप नहीं है; उस आकुलता को सहना भी तप का महत्वपूर्ण पक्ष है।
आचार्य श्री ने तप को आत्मशुद्धि का माध्यम बताते हुए कहा कि तपस्या जीवन में सकारात्मकता और श्रेष्ठ गुणों का संचार करती है। उनके अनुसार, तप और ध्यान जीवन के आवश्यक कर्तव्य हैं। साधना के माध्यम से व्यक्ति आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ता है। उन्होंने ज्ञान और तप से आत्मा के निखरने की बात कही।
आचार्य श्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में अध्यात्म और साधना को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को तप के बाहरी स्वरूप के साथ उसके आंतरिक भाव पर भी ध्यान देने का संदेश दिया। धर्मसभा में आए समाजजनों ने उत्तम तप धर्म पर उनके विचार सुने।
संयम और शांति के साथ किया गया तप सार्थक: मुनिश्री
मुनिश्री अनुमान सागर महाराज ने कहा कि तप विशुद्ध भाव और वाणी के संयम के साथ किया जाना चाहिए। मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ने के लिए अंतःकरण को स्वच्छ रखना और नियम-संयम अपनाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि ऐसा तप कर्मों की निर्जरा का साधन बनता है।
मुनिश्री ने बाहरी तपस्या के साथ मन की शांति पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति के भीतर शांति का भाव नहीं है, तो केवल बाहरी तपस्या से अपेक्षित आत्मिक परिणाम नहीं मिलता। नियम और संयम से जीवन को दिशा मिलती है तथा व्यक्ति तप के मार्ग पर आगे बढ़ पाता है। उन्होंने आत्मा में निहित शक्ति को पहचानने और साधना से उसे निखारने की बात कही।
108 मंत्रों के साथ श्रीजी का पंचामृत अभिषेक
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि उत्तम तप धर्म के अवसर पर प्रतिष्ठाचार्य पंडित डॉ. आनंद प्रकाश शास्त्री के मार्गदर्शन में धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। समाजजनों ने मुकुट-माला धारण कर रत्नजड़ित कलशों से 108 मंत्रों के उच्चारण के साथ श्रीजी का पंचामृत अभिषेक किया। इसके बाद रिद्धि मंत्रों के साथ बृहद शांतिधारा हुई।
अभिषेक और शांतिधारा के बाद दसलक्षण पूजन कराया गया। श्रद्धालुओं ने उत्तम तप धर्म के साथ सोलह कारण पूजा, नवदेवता पूजा और पंचमेरु पूजन में भाग लिया। संगीतमय भक्ति के बीच अष्ट द्रव्य से भगवान जिनेंद्र के समक्ष महाअर्घ्य चढ़ाए गए। पूजन के दौरान मंदिर में मंत्रोच्चार गूंजता रहा।
बुधवार को होगी उत्तम त्याग धर्म की पूजा
धर्मसभा से पहले श्रीफल अर्पित करने वालों में समिति अध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र गंगवाल, महामंत्री निर्मल पाटनी, विकास गंगवाल, विनय कासलीवाल और पंकज छाबड़ा शामिल रहे। जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि बुधवार, 23 सितंबर को पर्युषण पर्व के तहत उत्तम त्याग धर्म की पूजा होगी। रात में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।
