इंदौर के दलाल बाग में दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने उत्तम शौच धर्म का महत्व समझाया। उन्होंने तीर्थ, परिवार, समाज, संस्कृति और आचरण की पवित्रता बनाए रखने का संदेश दिया।
शुद्ध को अशुद्ध न करना ही उत्तम शौच धर्म की सच्ची साधना: मुनिपुंगव सुधासागर जी
दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म पर प्रवचन, कहा—बाहरी स्वच्छता के साथ मन, वचन, शरीर और आचरण की शुद्धता भी जरूरी
इंदौर। दशलक्षण महापर्व के चौथे दिन शनिवार को दलाल बाग स्थित विद्या सुधा देशना मंडप में आयोजित 10 दिवसीय श्रावक संस्कार शिविर में निर्यापक मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने उत्तम शौच धर्म की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि शौच धर्म केवल बाहरी स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन, शरीर और आचरण की शुद्धता भी इसका महत्वपूर्ण अंग है।
धर्म समाज प्रचारक एवं मीडिया प्रभारी राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनिपुंगव सुधासागर जी महाराज ने शिविरार्थियों और समाजजनों को संबोधित करते हुए कहा कि स्वयं अशुद्ध रह जाना उतना बड़ा पाप नहीं है, जितना अपने कारण किसी शुद्ध को अशुद्ध कर देना। उन्होंने कहा कि जीवन में निमित्त का बहुत प्रभाव होता है। स्वयं गलत करना कमजोरी हो सकती है, लेकिन किसी दूसरे व्यक्ति को गलत मार्ग पर ले जाना गंभीर कर्मबंध का कारण बन सकता है।
तीर्थों की पवित्रता बनाए रखना प्रत्येक श्रद्धालु की जिम्मेदारी
मुनिश्री ने सम्मेद शिखरजी और गिरनार जैसे सिद्ध क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए श्रद्धालुओं को तीर्थ क्षेत्रों की स्वच्छता एवं मर्यादा बनाए रखने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि वंदना करें या न करें, लेकिन तीर्थ को अपने कारण अपवित्र नहीं होने दें।
उन्होंने कहा कि पवित्र पर्वत और तीर्थ क्षेत्र में थूकना, कचरा फैलाना या गंदगी करना उसकी मर्यादा को प्रभावित करता है। यदि किसी व्यक्ति की शारीरिक क्षमता वंदना करने की नहीं है तो वह नीचे से ही श्रद्धापूर्वक नमस्कार कर सकता है, लेकिन वंदना के नाम पर तीर्थ की पवित्रता भंग नहीं करनी चाहिए।
ऐसा आचरण हो कि धर्म और समाज की प्रतिष्ठा बढ़े
मुनिपुंगव सुधासागर जी महाराज ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को कोई भी कार्य करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि उसके आचरण से देश, संस्कृति, धर्म और समाज की प्रतिष्ठा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि संयम, शाकाहार, अहिंसा और मर्यादा भारतीय एवं जैन संस्कृति की महत्वपूर्ण पहचान हैं। प्रत्येक जैन को यह विचार करना चाहिए कि उसके आचरण के कारण पूरे समाज की छवि प्रभावित न हो। व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि लोग कहें कि जैन धर्म के संस्कार आज भी जीवित हैं।
परिवार में भी जरूरी है शौच धर्म
परिवार के संदर्भ में उन्होंने कहा कि पिता का आचरण ऐसा होना चाहिए कि संतान को कभी शर्मिंदा न होना पड़े और संतान को भी ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे माता-पिता का सिर झुके। बच्चे केवल उपदेश से नहीं, बल्कि अपने बड़ों के आचरण से अधिक सीखते हैं।
उन्होंने शिविरार्थियों से कहा कि केवल शिविर में शामिल होना पर्याप्त नहीं है। यहां प्राप्त संस्कारों और शिक्षाओं को दैनिक जीवन में उतारना ही शिविर की वास्तविक सार्थकता है। शिविरार्थियों का व्यवहार और अनुशासन ऐसा होना चाहिए कि उनकी अलग पहचान दिखाई दे।
आंख, कान, वाणी और मन की पवित्रता पर दिया जोर
मुनिश्री ने इंद्रियों के शौच धर्म को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि आंखों का शौच बुरी दृष्टि से बचना, कानों का शौच निंदा और अश्लीलता से दूर रहना तथा मुख का शौच नशा, गुटखा और अपशब्दों से बचना है।
उन्होंने सात्विक खान-पान अपनाने के साथ मन में ईर्ष्या और द्वेष तथा वाणी में कटुता से बचने की सीख दी। उन्होंने शिविरार्थियों से कहा कि गुरु वाणी सुनने के बाद व्यक्ति की दृष्टि, श्रवण और आचरण में भी उसका प्रभाव दिखाई देना चाहिए।
धर्म को स्वार्थ का साधन न बनाने की सीख
मुनिपुंगव सुधासागर जी महाराज ने कहा कि अपने गलत कार्यों की सफलता के लिए भगवान, गुरु अथवा धर्म का नाम लेना उचित नहीं है। धर्म का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के साधन के रूप में नहीं होना चाहिए।
प्रवचन के अंत में उन्होंने शिविरार्थियों को स्वयं शुद्ध रहने और अपने कारण किसी तीर्थ, धर्म, परिवार, समाज अथवा संस्कृति की पवित्रता प्रभावित नहीं होने देने का संकल्प दिलाया।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में शिविरार्थियों और समाजजनों ने सहभागिता की। इस अवसर पर सपना-मनीष गोधा, आनंद-नवीन गोधा, हर्ष जैन, आलोक, आकाश कोल, हुक्म काका, अक्षय कासलीवाल, संजय पाटोदी, डॉ. जैनेन्द्र जैन, वीरेन्द्र जैन, विपुल बाझलं, अरविंद, अखिलेश सोधीया, नरेंद्र, राकेश नायक, विजय धुर्रा, मुक्ता जैन और रानी डोसी सहित समाजजन उपस्थित रहे।
प्रेषक: राजेश जैन दद्दू, मीडिया प्रभारी
