सारंगपुर में उत्तम मार्दव धर्म की आराधना, मुनि श्री प्रवर सागर जी ने दिया अहंकार त्यागने का संदेश
आत्मानुगुणों वृद्धि श्रावक संस्कार शिविर के दूसरे दिन हुईं धार्मिक क्रियाएं, द्रव्यसंग्रह एवं तत्त्वार्थ सूत्र की कक्षाएं आयोजित
रिपोर्टर: मनोज कुमार पुष्पद
सारंगपुर। दस लक्षण महापर्व के पावन अवसर पर सारंगपुर नगर में चातुर्मास के लिए विराजित पूज्य गुरुदेव मुनि श्री 108 प्रवर सागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित ‘आत्मानुगुणों वृद्धि श्रावक संस्कार शिविर’ के द्वितीय दिवस उत्तम मार्दव धर्म की श्रद्धापूर्वक आराधना की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालुओं और शिविरार्थियों ने उपस्थित होकर अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं विधान सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाओं में भाग लिया।
पूरे आयोजन स्थल पर सुबह से ही भक्तिमय वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने भगवान के अभिषेक और शांतिधारा के साथ दिन की धार्मिक गतिविधियों का शुभारंभ किया। इसके बाद नित्य नियम पूजन, पंचमेरू पूजन, सोलहकारण पूजन, भगवान पार्श्वनाथ की पूजा तथा उत्तम मार्दव धर्म विधान संपन्न कराया गया।
अहंकार छोड़कर विनम्र बनना ही मार्दव धर्म
धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य गुरुदेव मुनि श्री 108 प्रवर सागर जी महाराज ने उत्तम मार्दव धर्म का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मार्दव का अर्थ मान, अभिमान और अहंकार का त्याग करके विनम्रता को अपने जीवन में अपनाना है। मनुष्य को अपने धन, ज्ञान, पद, रूप, कुल, जाति अथवा प्रतिष्ठा का कभी घमंड नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अहंकार में डूबा व्यक्ति दूसरों को स्वयं से छोटा समझने लगता है। इसके कारण उसके भीतर क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा जैसे नकारात्मक भाव उत्पन्न होते हैं। ये भाव आत्मा को संसार के बंधनों में बांधते हैं। इसके विपरीत विनम्रता मनुष्य के व्यक्तित्व को सुंदर बनाती है और आत्मा को शुद्धता तथा आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती है।
फलदार वृक्ष की तरह झुकता है गुणवान व्यक्ति
मुनि श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार फलों से लदा हुआ वृक्ष हमेशा झुक जाता है, उसी प्रकार ज्ञानवान और गुणवान व्यक्ति भी सदैव नम्र रहता है। जो व्यक्ति वास्तव में बड़ा होता है, वह अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि दूसरों का सम्मान करता है।
उन्होंने कहा कि सच्चा बड़प्पन ऊंची आवाज में बोलने या स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने में नहीं है। वास्तविक महानता दूसरों को सम्मान देने, उनके विचारों को समझने और अपने व्यवहार में विनम्रता बनाए रखने में है। प्रशंसा मिलने पर मन में अहंकार उत्पन्न न हो और आलोचना होने पर किसी के प्रति द्वेष न आए, यही उत्तम मार्दव धर्म की वास्तविक पहचान है।
श्रद्धालुओं ने किया भगवान का अभिषेक
शिविर के दूसरे दिन आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों के अंतर्गत प्रथम कलश से भगवान का अभिषेक करने का सौभाग्य डॉ. पलक जैन, अनिल जैन एवं विमला श्री जैन परिवार को प्राप्त हुआ। द्वितीय कलश से अभिषेक का पुण्य लाभ मनोज जैन, प्रीतिश जैन एवं श्वेता जैन परिवार ने प्राप्त किया।
तृतीय कलश से अभिषेक करने का सौभाग्य नेमीचंद जैन एवं मनोज पांदा परिवार को मिला, जबकि चतुर्थ कलश से निर्मल जैन, नवीन जैन एवं मोहित जैन ने अभिषेक किया। अभिषेक के पश्चात भगवान की मंगल आरती करने का सौभाग्य नेमीचंद जैन उदनखेड़ी परिवार को प्राप्त हुआ।
शांतिधारा और विधान में परिवारों ने लिया पुण्य लाभ
कार्यक्रम के दौरान प्रथम शांतिधारा करने का सौभाग्य नेमीचंद जैन, मनोज जैन, श्रीमती कांता जैन एवं अलका जैन परिवार को मिला। द्वितीय शांतिधारा का पुण्य लाभ पारसमल जैन, ओमप्रकाश जैन एवं विजय जैन परिवार ने प्राप्त किया।
दस लक्षण विधान के अंतर्गत उत्तम मार्दव धर्म की विधान पूजा करने का सौभाग्य मनोज नेमीचंद जैन एवं गीतेश जैन को प्राप्त हुआ। सभी श्रद्धालुओं ने भक्ति एवं उत्साह के साथ धार्मिक क्रियाओं में सहभागिता की और विश्व कल्याण तथा आत्मशुद्धि की भावना से भगवान की पूजा-अर्चना की।
संगीतमय पूजन से भक्तिमय हुआ वातावरण
शिविर प्रभारी पंडित भागचंद जैन, देवास के मार्गदर्शन में सभी धार्मिक क्रियाएं विधि-विधान से संपन्न कराई गईं। नित्य नियम पूजन, पंचमेरू पूजन, सोलहकारण पूजन और भगवान पार्श्वनाथ की पूजा के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से अर्घ्य समर्पित किए।
आष्टा से पधारे संगीतकार पंकज जैन एवं उनकी पार्टी ने संगीतमय पूजन प्रस्तुत किया। भक्ति गीतों और धार्मिक संगीतमय प्रस्तुतियों से पूरा वातावरण धर्ममय हो गया। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से भगवान की आराधना करते हुए उत्तम मार्दव धर्म को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
द्रव्यसंग्रह और तत्त्वार्थ सूत्र की कक्षाएं लगीं
दोपहर के सत्र में शिविरार्थियों के लिए द्रव्यसंग्रह की विशेष कक्षाएं आयोजित की गईं। इनमें जैन दर्शन के विभिन्न सिद्धांतों और आत्मकल्याण से संबंधित विषयों की जानकारी दी गई। शिविरार्थियों ने उत्साहपूर्वक कक्षाओं में भाग लेकर धार्मिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया।
इसके साथ ही पूज्य गुरुदेव मुनि श्री 108 प्रवर सागर जी महाराज ने शिविरार्थियों को तत्त्वार्थ सूत्र के विषय में विस्तार से समझाया। उन्होंने तत्त्वार्थ सूत्र के सिद्धांतों को दैनिक जीवन से जोड़ते हुए बताया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के विचार, वाणी और आचरण में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
मुनि श्री ने सभी शिविरार्थियों से उत्तम मार्दव धर्म की भावना को केवल पर्व के दौरान ही नहीं, बल्कि जीवनभर अपने व्यवहार में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अहंकार का त्याग और विनम्रता का स्वीकार आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आयोजन में जैन समाज के महिला-पुरुषों, युवाओं और बच्चों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
