—Advertisement—

‘हजारों किलोमीटर के तीर्थ, लेकिन 500 मीटर दूर जिनालय क्यों नहीं?’— प्रिंस जैन ‘देवांश’ ने जैन समाज से किया आत्ममंथन का आह्वान

Author Picture
Published On: 4 August 2026
A symbolic view of a Jain temple representing daily worship and spiritual devotion, accompanying an opinion article by Prince Jain “Devansh” encouraging devotees to visit their nearby Jain temple regularly instead of relying only on long-distance pilgrimages
— A symbolic view of a Jain temple representing daily worship and spiritual devotion, accompanying an opinion article by Prince Jain “Devansh” encouraging devotees to visit their nearby Jain temple regularly instead of relying only on long-distance pilgrimages

—Advertisement—

‘हजारों किलोमीटर के तीर्थ, लेकिन 500 मीटर दूर जिनालय क्यों नहीं?’— प्रिंस जैन ‘देवांश’ ने जैन समाज से किया आत्ममंथन का आह्वान

संवाददाता: मनोज जैन नायक
मुरैना।
आधुनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच धार्मिक आस्था और दैनिक साधना को लेकर जैन समाज के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता दिखाई दे रहा है। क्या हम दूर-दराज़ के प्रसिद्ध जैन तीर्थों की यात्रा के लिए तो उत्साह, समय और संसाधन जुटा लेते हैं, लेकिन अपने घर से कुछ ही दूरी पर स्थित जिनालय में प्रतिदिन दर्शन करने के लिए समय नहीं निकाल पाते? इसी विषय पर जैन चिंतक एवं भाव लेखक प्रिंस जैन “देवांश” ने समाज के नाम एक प्रेरक संदेश देते हुए आत्ममंथन का आह्वान किया है।

उन्होंने अपने विचारों में कहा कि जैन समाज की आस्था सदियों से तीर्थों और जिनालयों से जुड़ी रही है। जहां एक ओर सम्मेद शिखरजी, गिरनार, सोनागिरि, मुक्तागिरि और कुंडलपुर जैसे पवित्र तीर्थ आत्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर घर के निकट स्थित जिनालय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यदि दैनिक जीवन में जिनालय के प्रति नियमित श्रद्धा नहीं होगी तो तीर्थयात्रा का आध्यात्मिक उद्देश्य भी कहीं न कहीं अधूरा रह जाएगा।

दूर के तीर्थों के लिए उत्साह, पास के जिनालय के लिए समयाभाव?

प्रिंस जैन “देवांश” ने कहा कि आज अधिकांश श्रद्धालु वर्ष में एक या दो बार बड़े जैन तीर्थों की यात्रा के लिए महीनों पहले से योजना बनाते हैं। लोग छुट्टियां लेते हैं, यात्रा की तैयारी करते हैं, लंबी दूरी तय करते हैं और आर्थिक खर्च भी सहजता से स्वीकार कर लेते हैं।

लेकिन जब प्रतिदिन अपने घर से कुछ सौ मीटर की दूरी पर स्थित जिनालय में दर्शन करने की बात आती है, तो अक्सर यह सुनने को मिलता है—

“आज समय नहीं है, कल चले जाएंगे।”

उन्होंने कहा कि यही सोच समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।

तीर्थयात्रा का महत्व अपनी जगह, लेकिन दैनिक साधना भी आवश्यक

भाव लेखक ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य तीर्थयात्राओं के महत्व को कम करना नहीं है।

उन्होंने कहा कि—

  • सम्मेद शिखरजी
  • गिरनार
  • सोनागिरि
  • मुक्तागिरि
  • कुंडलपुर
  • अन्य सिद्ध एवं अतिशय क्षेत्र

जैन धर्म की अमूल्य धरोहर हैं।

इन तीर्थों का वातावरण व्यक्ति को तप, त्याग, संयम और मोक्षमार्ग की प्रेरणा देता है। वहां पहुंचकर श्रद्धालु आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं और आत्मचिंतन का अवसर प्राप्त करते हैं।

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यदि दैनिक जीवन में जिनालय के प्रति नियमित श्रद्धा नहीं है, तो तीर्थयात्रा का वास्तविक लाभ सीमित रह सकता है।

जिनालय केवल भवन नहीं, आस्था का केंद्र है

प्रिंस जैन “देवांश” ने कहा कि जिनालय केवल पत्थरों से निर्मित मंदिर नहीं होता।

उनके अनुसार जिनालय—

  • आस्था का केंद्र है।
  • जैन संस्कृति की पहचान है।
  • धार्मिक संस्कारों का विद्यालय है।
  • आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का स्थान है।
  • मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत है।

उन्होंने कहा कि जब कोई श्रद्धालु जिनालय में प्रवेश करता है तो उसका मन स्वतः शांत होता है और जीवन की भागदौड़ से कुछ समय के लिए मुक्ति मिलती है।

प्रतिदिन कुछ मिनट भी पर्याप्त हैं

उन्होंने समाज से आग्रह किया कि यदि प्रत्येक परिवार प्रतिदिन केवल कुछ मिनट जिनालय जाने के लिए निकाल ले, तो उसका सकारात्मक प्रभाव पूरे परिवार पर दिखाई देगा।

उनके अनुसार प्रतिदिन—

  • भगवान के दर्शन,
  • वंदना,
  • स्वाध्याय,
  • ध्यान,
  • या कुछ क्षणों का मौन चिंतन

भी व्यक्ति के मानसिक और आध्यात्मिक जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

समय की नहीं, प्राथमिकताओं की कमी

लेख में उन्होंने आधुनिक जीवनशैली पर भी विचार व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि लोग अक्सर कहते हैं कि उनके पास समय नहीं है, जबकि वास्तविकता यह है कि समय की कमी नहीं बल्कि प्राथमिकताओं में बदलाव की आवश्यकता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि—

  • मोबाइल फोन,
  • सोशल मीडिया,
  • मनोरंजन,
  • अन्य व्यक्तिगत गतिविधियों

के लिए लोग सहजता से समय निकाल लेते हैं, लेकिन घर के पास स्थित जिनालय तक जाने के लिए पांच-दस मिनट भी नहीं निकाल पाते।

उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपनी प्राथमिकताओं में थोड़ा बदलाव करे तो प्रतिदिन जिनालय जाना बिल्कुल कठिन नहीं है।

धर्म केवल पर्वों तक सीमित नहीं होना चाहिए

प्रिंस जैन “देवांश” ने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप तभी दिखाई देता है जब वह दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाए।

यदि धर्म केवल—

  • पर्वों,
  • बड़े आयोजनों,
  • धार्मिक समारोहों,
  • या वार्षिक तीर्थयात्राओं

तक सीमित रह जाए, तो उसका व्यापक प्रभाव जीवन पर नहीं पड़ता।

उन्होंने कहा कि नियमित जिनालय दर्शन आत्मा को जागृत रखने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम है।

नई पीढ़ी को संस्कार कैसे मिलेंगे?

उन्होंने अपने लेख में परिवार और बच्चों की भूमिका पर भी विशेष जोर दिया।

उनका कहना है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं।

यदि माता-पिता प्रतिदिन जिनालय जाएंगे तो बच्चों के मन में भी स्वाभाविक रूप से—

  • श्रद्धा,
  • विनय,
  • अनुशासन,
  • धर्म के प्रति आकर्षण

विकसित होगा।

उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी को धर्म से जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम परिवार की दैनिक धार्मिक दिनचर्या ही है।

घर के पास का जिनालय भी उतना ही महत्वपूर्ण

भाव लेखक ने कहा कि दूर-दराज़ के तीर्थों के प्रति श्रद्धा बनी रहनी चाहिए, लेकिन अपने नगर या मोहल्ले के जिनालय को भी समान महत्व मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि धर्म की शुरुआत दूर स्थित तीर्थों से नहीं, बल्कि अपने निकट स्थित जिनालय से होती है।

वहीं से आत्मकल्याण की यात्रा का पहला कदम उठता है।

जैन समाज से किया संकल्प लेने का आह्वान

uykj
प्रिंस जैन “देवांश” ने जैन समाज से अपील की कि सभी लोग एक संतुलित धार्मिक जीवन अपनाएं।

उन्होंने सुझाव दिया कि—

  • वर्ष में कम से कम एक बार तीर्थयात्रा अवश्य करें।
  • लेकिन प्रतिदिन निकट स्थित जिनालय में दर्शन करने का भी प्रयास करें।
  • परिवार के साथ जिनालय जाने की परंपरा विकसित करें।
  • बच्चों को भी नियमित रूप से जिनालय ले जाएं।
  • धर्म को केवल उत्सव नहीं बल्कि दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं।

आत्ममंथन का संदेश

लेख का मूल संदेश यही है कि धार्मिक आस्था केवल दूर स्थित पवित्र तीर्थों तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

यदि व्यक्ति अपने घर के पास स्थित जिनालय के प्रति नियमित श्रद्धा विकसित करता है तो वही आध्यात्मिक जीवन की मजबूत नींव बनती है।

प्रिंस जैन “देवांश” ने अंत में समाज से आत्ममंथन करने का आग्रह करते हुए कहा कि—

 

Related News
Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp