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मन, वचन और काया में सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म : आर्यिका संगममति माताजी

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Published On: 18 September 2026
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मन, वचन और काया में सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म : आर्यिका संगममति माताजी

अम्बाह जैन बगीची में दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन हुई उत्तम आर्जव धर्म की आराधना, अभिषेक और शांतिधारा में उमड़े श्रद्धालु

मनोज जैन नायक

मुरैना  दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन अम्बाह स्थित जैन बगीची में उत्तम आर्जव धर्म की श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ आराधना की गई। आचार्य श्री सिद्धांत सागर महाराज की शिष्या गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में जैन समाज के महिला, पुरुष, युवा और बच्चे शामिल हुए।

प्रातःकाल भगवान जिनेंद्र का संगीतमय अभिषेक और शांतिधारा की गई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजन करते हुए उत्तम आर्जव धर्म की आराधना की। मंत्रोच्चार और भक्तिमय संगीत के बीच आयोजित कार्यक्रम से जैन बगीची का वातावरण धर्ममय हो गया। श्रद्धालुओं ने भगवान के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आत्मशुद्धि और सदाचारपूर्ण जीवन की कामना की।

मन, वचन और कर्म में एकरूपता जरूरी

धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ने कहा कि मन, वचन और काया में सरलता, निष्कपटता एवं एकरूपता होना ही उत्तम आर्जव धर्म है। आर्जव का सामान्य अर्थ सीधापन और सरलता है। मनुष्य के मन में जो भाव हों, उसकी वाणी और आचरण भी उन्हीं भावों के अनुरूप होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मन में कुछ और विचार रखना, वाणी से कुछ और कहना तथा व्यवहार में उसके विपरीत आचरण करना कुटिलता है। ऐसी प्रवृत्ति आत्मा को अशुद्ध बनाती है और व्यक्ति को धर्ममार्ग से दूर ले जाती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने विचारों, शब्दों और कार्यों में समानता रखता है, वह उत्तम आर्जव धर्म की वास्तविक साधना करता है।

आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि सरल होने का अर्थ कमजोर होना नहीं है। सरलता व्यक्ति की आंतरिक शक्ति, पवित्रता और आत्मविश्वास को प्रदर्शित करती है। निष्कपट व्यक्ति को अपने जीवन में किसी प्रकार का दिखावा करने या सत्य छिपाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

छल-कपट का त्याग आर्जव धर्म का आधार

माताजी ने उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मायाचारी अर्थात छल, कपट और धोखे का त्याग करना इस धर्म का प्रमुख आधार है। मनुष्य अनेक बार अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए छल और असत्य का सहारा लेता है। इससे भले ही उसे कुछ समय के लिए सांसारिक लाभ मिल जाए, लेकिन आत्मिक शांति और वास्तविक सुख प्राप्त नहीं हो सकता।

उन्होंने कहा कि छल-कपट व्यक्ति के मन को लगातार अशांत रखता है। कुटिल व्यवहार से विश्वास टूटता है और रिश्तों में दूरी पैदा होती है। जब व्यक्ति सरलता एवं निष्कपटता को अपनाता है तो उसके आचरण में शुद्धता आती है। सरल व्यक्ति के जीवन में दिखावा नहीं होता और उसका व्यवहार दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनता है।

उत्तम आर्जव धर्म हमें यह संदेश देता है कि व्यक्ति जैसा भीतर से है, वैसा ही बाहर भी दिखाई दे। विचार, वाणी और व्यवहार की एकरूपता से जीवन में विश्वास, संतोष तथा शांति का विकास होता है।

आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग से जुड़ा है आर्जव धर्म

dgfdsfgsdआर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि जैन दर्शन में उत्तम आर्जव धर्म को आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की साधना से जोड़ा गया है। आत्मा का स्वभाव निर्मल और सरल है, लेकिन मोह, माया और कषायों के कारण उसमें कुटिलता के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। इन भावों का त्याग कर आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाना ही धर्म साधना का उद्देश्य है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक क्रियाएं तभी सार्थक होती हैं, जब व्यक्ति अपने भीतर के छल और कपट को समाप्त करने का प्रयास करे। केवल बाहरी पूजा-अर्चना पर्याप्त नहीं है। भगवान की आराधना के साथ अपने विचारों, व्यवहार और जीवनशैली को भी शुद्ध बनाना आवश्यक है।

कुटिलता का त्याग कर सरल एवं पवित्र भावों के साथ धर्माराधना करना ही उत्तम आर्जव धर्म का सार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में सत्य, सरलता और निष्कपटता अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।

दिखावा और पाखंड से बचने का संदेश

धर्मसभा में माताजी ने कहा कि वर्तमान समय में लोग कई बार दूसरों को प्रभावित करने के लिए दिखावे का सहारा लेते हैं। धार्मिक और सामाजिक जीवन में भी बाहरी प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है। आर्जव धर्म व्यक्ति को पाखंड तथा दिखावे से बचने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि धर्म का संबंध बाहरी प्रदर्शन से अधिक आंतरिक परिवर्तन से है। यदि व्यक्ति पूजा-अर्चना तो करे, लेकिन उसके व्यवहार में छल, क्रोध और अहंकार बना रहे तो उसकी साधना अधूरी है। धर्म का वास्तविक प्रभाव व्यक्ति के विचारों, वाणी और व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।

परिवार और समाज में भी सरल एवं स्पष्ट व्यवहार अपनाने से विवाद कम होते हैं। जब व्यक्ति बिना छल-कपट के अपनी बात रखता है तो आपसी विश्वास और प्रेम बढ़ता है। उत्तम आर्जव धर्म व्यक्तिगत जीवन के साथ सामाजिक संबंधों को भी मजबूत बनाने का मार्ग दिखाता है।

श्रद्धालुओं ने उत्साह से लिया धर्मलाभ

दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन आयोजित अभिषेक, शांतिधारा और पूजन में समाज के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। महिलाओं और युवाओं ने संगीतमय पूजन में सहभागिता की, जबकि बच्चों ने भी धार्मिक गतिविधियों में शामिल होकर जैन धर्म के संस्कारों को समझा।

पूरे कार्यक्रम के दौरान भगवान जिनेंद्र के जयकारे गूंजते रहे। श्रद्धालुओं ने आर्यिका संगममति माताजी के प्रवचन सुनकर अपने जीवन से छल-कपट, दिखावा और कुटिलता दूर करने का संकल्प लिया।

प्रतिदिन हो रहे धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम

fdsfdfdदशलक्षण महापर्व के उपलक्ष्य में अम्बाह जैन बगीची में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। प्रातःकाल अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं धर्मसभा आयोजित होती है। आर्यिका संगममति माताजी द्वारा प्रतिदिन दशलक्षण धर्म के अलग-अलग स्वरूपों की सरल भाषा में व्याख्या की जा रही है।

रात्रि में भगवान की आरती, लकी ड्रॉ और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें समाज के महिला, पुरुष, युवा और बच्चे उत्साहपूर्वक सहभागिता कर रहे हैं। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से धर्म, संस्कार, अहिंसा और सदाचार का संदेश दिया जा रहा है।

आयोजन समिति ने समाज के सभी लोगों से दशलक्षण महापर्व के आगामी कार्यक्रमों में शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त करने की अपील की है। श्रद्धालुओं ने कहा कि आर्यिका संगममति माताजी के सानिध्य में आयोजित कार्यक्रमों से उन्हें धर्म को समझने और जीवन में उसके सिद्धांतों को अपनाने की प्रेरणा मिल रही है।

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