लघुकथा: श्राद्ध — परंपरा, रिश्तों और संवेदना के बीच एक सवाल
अपार्टमेंट की पांचवीं मंजिल पर रहने वाली मोहिनी नौकरीपेशा महिला थी। आज छुट्टी का दिन था, लेकिन सुबह वह रोज की अपेक्षा जल्दी उठ गई। घर में उसके स्वर्गीय ससुर अखिलेश जी का श्राद्ध था। परिवार में चली आ रही परंपरा के अनुसार श्राद्ध पूजा की तैयारियां शुरू हो गईं।
मोहिनी ने रसोई में खीर, पूड़ी, आलू-मटर की सूखी सब्जी और हलवा तैयार किया। पूजा-पाठ पूरा होने के बाद उसने प्रसाद तीन अलग-अलग दोनों में रख दिया। एक गाय के लिए, दूसरा कौवे के लिए और तीसरा काले कुत्ते के लिए।
उसने अपनी सास सुषमा जी से कहा, “मांजी, आप इन्हें अपने हाथों से खिला आइएगा। घर की परंपरा है। श्राद्ध का भोग इसी तरह कराया जाता है।”
सुषमा जी ने बिना कुछ कहे तीनों दोने अपने हाथों में ले लिए।
उनकी उम्र ढल चुकी थी। घुटनों में अक्सर दर्द रहता था और पांचवीं मंजिल से सीढ़ियों के रास्ते नीचे उतरना उनके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था। लेकिन आज बात उनके स्वर्गीय पति अखिलेश जी की थी। पति के प्रति वर्षों का प्रेम, सम्मान और समर्पण उनके कदमों को रोक नहीं पाया।
वे धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरकर नीचे आईं और कॉलोनी में गाय, कौवे और काले कुत्ते को तलाशने लगीं।
उधर उनका बेटा राजीव सुबह से ही अपने कमरे में लैपटॉप लेकर बैठा था। ऑफिस का कुछ जरूरी काम था। मां की परेशानी पर उसका ध्यान नहीं गया।
सुषमा जी कभी पार्क की ओर जातीं, कभी कॉलोनी के दूसरे हिस्से में देखतीं। लेकिन काफी देर तक उन्हें न गाय दिखाई दी, न कौआ और न ही काला कुत्ता।
समय बीतता गया।
सुबह दोपहर में बदलने लगी।
तीनों दोने अब भी उनके हाथों में थे।
आखिरकार थककर सुषमा जी कॉलोनी के पार्क में लगी एक कुर्सी पर बैठ गईं। उनके हाथ कांप रहे थे। घुटनों का दर्द बढ़ चुका था। उन्होंने सामने रखे प्रसाद को देखा और फिर आसमान की ओर निहारने लगीं।
उनके मन में केवल एक ही सवाल था—
“अखिलेश जी का श्राद्ध कैसे पूरा होगा? उन्हें भोग कैसे मिलेगा?”
आंखों से आंसू छलक पड़े।
उन्हें शायद यह समझ नहीं आ रहा था कि जिस पति के साथ उन्होंने पूरी जिंदगी बिताई, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की इस परंपरा को पूरा करने के लिए आज वे इतनी दूर तक अकेली क्यों भटक रही हैं।
कहानी यहीं एक बड़ा सवाल छोड़ जाती है।
हम अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए तरह-तरह की परंपराएं निभाते हैं। गाय, कौवे और दूसरे जीवों को भोजन कराते हैं। लेकिन क्या उन परंपराओं के साथ हमारे आसपास मौजूद जीवित रिश्तों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण नहीं है?
जिस मां के कांपते हाथों में प्रसाद था, क्या उसके लिए कुछ पल निकालना भी श्राद्ध का हिस्सा नहीं हो सकता?
शायद सच्ची श्रद्धांजलि केवल परंपरा निभाने में नहीं, बल्कि जीवित माता-पिता और बुजुर्गों के सम्मान, सेवा और संवेदना में भी छिपी होती है।
— डॉ. सुरेंद्र मीणा
और न ही काला कुत्ता।
आखिरकार थककर वे पार्क की एक कुर्सी पर बैठ गईं।
हाथ में प्रसाद के दोने अब भी वैसे ही थे।
उनकी आंखें कॉलोनी की ऊंची इमारत की ओर उठीं। फिर पति की तस्वीर जैसे मन में उभर आई।
उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं।
वे बुदबुदाईं—
“अखिलेश जी… आपका श्राद्ध तो कर दिया, लेकिन आपका भोग आखिर आप तक पहुंचेगा कैसे?”
कुछ पल बाद उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।
उसी समय उनके मन में एक सवाल कौंधा—
क्या श्राद्ध की सार्थकता केवल उस गाय, कौवे या कुत्ते तक प्रसाद पहुंचाने में है, जिसे हम ढूंढते रह गए?
या फिर उस बुजुर्ग मां की सेवा में भी है, जो अपने ही घर में परंपराओं का बोझ उठाते हुए पांचवीं मंजिल की सीढ़ियां उतरती-चढ़ती रही?
शायद… सच्चा श्राद्ध जीवितों के प्रति अपने कर्तव्य को समझने से शुरू होता है।
@ डॉ सुरेन्द्र मीणा
