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त्याग शांति का दिव्य द्वार है – पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी

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Published On: 23 September 2026
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त्याग शांति का दिव्य द्वार है – पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी

रिपोर्टर: राजेश जैन दद्दू

दिगम्बर जैन श्रमण-संस्कृति के उन्नायक पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने ऋषभ विहार, दिल्ली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि त्याग उत्थान का सोपान है, त्याग सुख व मुक्ति का स्थान है। त्याग शांति का दिव्य-द्वार है। त्याग प्रकृति का नियम है। त्याग श्रेष्ठ धर्म है। त्याग शांति का उपाय है। त्याग साधना है। त्याग में आनन्द है। त्याग स्वर्ग का सोपान है। त्याग सिद्धि का साधन है। त्याग कर्म क्षय का हेतु है। त्याग संतों की गुप्त-विद्या है। त्याग मुक्ति का उपाय है। निर्वाण के लिए त्याग आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण मोह का त्याग करके जो मन-वचन-काय से निर्वेद-भावना धारण करते हैं, उनको त्याग धर्म होता है। मिष्ट भोजन, राग-द्वेष उत्पन्न करने वाले उपकरण तथा ममत्व-भाव उत्पन्न करने में निमित्त वसतिका को छोड़ देते हैं, उसी त्यागी को त्याग धर्म होता है। त्याग दुःख से छूटने का उपाय है। जो सब-कुछ त्याग देते हैं, वही परम-शांति को प्राप्त कर सकते हैं। जितना-जितना त्याग होगा, उतनी-उतनी इच्छा शांत होती है। दुःख के कारणों को शीघ्र छोड़ना भी त्याग है।

त्याग श्रमणों की परम्परा है। त्याग से ही मोक्षमार्ग प्रारम्भ होता है। त्याग के बिना समाधि सम्भव नहीं है। आन्तरिक भावों से छोड़ना ही त्याग है। जोड़ने में कष्ट है, छोड़ने में आनन्द है। छोड़ने और त्यागने से संकल्प-विकल्प कम होते हैं, निराकुलता बढ़ती है। छोड़कर चाहना महापाप है।

मुनियों और तपस्वियों की साधना में सहायक आहार, औषध, ज्ञानाराधना के लिए शास्त्र-लेखनी तथा ठहरने के लिए भवन में स्थान देना भी त्याग है। ममत्व छोड़ना ही त्याग है। व्यक्ति को अपनी शक्ति के अनुसार त्याग करना चाहिए। जिससे साधक की साधना बढ़े, तप में वृद्धि हो, परिणाम विशुद्ध हों और मोक्षमार्ग प्रशस्त हो, ऐसे आगमानुकूल साधन श्रावक को साधुओं के लिए उपलब्ध कराना चाहिए।

स्व-पर उपकार के लिए अपने द्रव्य को योग्य पात्र को अपने हाथों से देना दान है। दान में विधि, द्रव्य, दाता और पात्र का विशेष महत्व है। दान त्यागपूर्वक देना चाहिए। त्यागपूर्वक दिया गया दान ही भूषण बनता है। दान देते समय किसी प्रकार की आकांक्षा नहीं होनी चाहिए। निःकांक्ष भाव से दिए गए दान का फल ही सर्वश्रेष्ठ और उत्तम होता है।

प्रस्तुति : राजेश जैन दद्दू
प्रवक्ता एवं मीडिया प्रभारी

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