मान महाविष के समान, मार्दव अमृत स्वरूप: पट्टाचार्य विशुद्धसागर महाराज
श्रावक संस्कार शिविर में धर्मसभा को किया संबोधित, कहा—अहंकार छोड़कर नम्रता और विनय धारण करें
प्रेषक – राजेश जैन दद्दू, प्रचार प्रमुख
इंदौर। पर्वाधिराज पर्युषण के पावन अवसर पर आयोजित श्रावक संस्कार शिविर की धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिगंबर जैन धर्म के पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने उत्तम मार्दव धर्म का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि मान और अहंकार महाविष के समान हैं, जबकि मार्दव धर्म अमृत स्वरूप है। मनुष्य को अहंकार का त्याग कर नम्रता, सरलता और विनय को अपने जीवन में धारण करना चाहिए।
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि धर्म ही मंगल, उत्तम और शरण है। धर्म ही मनुष्य को परम सुख एवं शांति प्रदान करने का उपाय है। संसार रूपी सागर से पार होने के लिए धर्म जहाज के समान है और जीवों को सही मार्ग दिखाकर पार लगाने वाले निर्ग्रंथ गुरु हैं।
अहंकार छोड़ें, नम्रता धारण करें
विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि अहंकार वास्तव में मान कषाय है। जब मनुष्य के भीतर से मान की भावना समाप्त होती है, तभी मार्दव धर्म प्रकट होता है। छल, कपट और मान जीव को पतन एवं दुर्गति की ओर ले जाते हैं। अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझता है और विनयपूर्वक झुकने से बचता रहता है।
उन्होंने कहा कि मानी व्यक्ति कई बार अपना सर्वनाश स्वीकार कर लेता है, लेकिन झुकना स्वीकार नहीं करता। यही भाव उसके पतन का प्रमुख कारण बनता है। नम्रता के बिना धर्म का वास्तविक स्वरूप जीवन में प्रकट नहीं हो सकता। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवहार, विचार और वाणी से अहंकार दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
पट्टाचार्य श्री ने समझाया कि नारकी जीवों में क्रोध कषाय, तिर्यंचों में माया कषाय, देवों में लोभ कषाय और मनुष्यों में मान कषाय की प्रधानता मानी गई है। मानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए मान कषाय पर विजय पाना आवश्यक है।
जो झुकेगा, वही ऊंचाइयों तक पहुंचेगा
गुरुदेव ने कहा कि जो व्यक्ति विनय के साथ झुकना सीखता है, वही जीवन में वास्तविक ऊंचाइयां प्राप्त करता है। फल से भरा हुआ वृक्ष सदैव झुकता है। इसी प्रकार गुणवान व्यक्ति भी नम्रता और सरलता से युक्त होता है।
उन्होंने कहा कि विनय मानव जीवन का शृंगार है। जो व्यक्ति विनयपूर्वक दूसरों का सम्मान करता है, एक समय ऐसा आता है जब पूरी दुनिया उसका सम्मान करती है। विनय से शत्रु का हृदय भी परिवर्तित किया जा सकता है। विनयशील व्यक्ति अपने सद्गुणों के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्धि प्राप्त कर सकता है।
नम्रता और सरलता गुरुजनों की मूल विद्या है, जबकि अहंकार को दुष्टता का चिह्न माना गया है। किसी व्यक्ति की महानता उसके पद, धन अथवा बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार में दिखाई देने वाली नम्रता से पहचानी जाती है।
राग के कारण बदलती है प्रिय-अप्रिय की भावना
विशुद्धसागर जी महाराज ने प्रिय और अप्रिय की भावना को समझाते हुए कहा कि जो व्यक्ति अथवा वस्तु हमारे राग की पुष्टि करती है, वह हमें अच्छी लगने लगती है। जिससे हमारे राग की पुष्टि नहीं होती, वह हमें प्रिय नहीं लगती।
उन्होंने कहा कि वस्तु वास्तव में जैसी है, वैसी ही रहती है। वह स्वयं न सुंदर होती है और न असुंदर। मनुष्य की राग-द्वेष से प्रभावित दृष्टि उसे सुंदर या असुंदर मानती है। जो हमें प्रिय होता है, उसके दोष दिखाई नहीं देते और जो अप्रिय लगता है, उसके गुण भी नजर नहीं आते। यह सब राग का परिणाम है।
राग आग, वीतराग भाव शीतल जल
पट्टाचार्य श्री ने कहा कि राग आग के समान है, जबकि वीतराग भाव शीतल जल के समान है। राग की एक छोटी-सी चिंगारी भी मनुष्य के संपूर्ण जीवन को अशांत कर सकती है। संसार में होने वाले अनेक अनर्थों के पीछे राग, मोह और आसक्ति प्रमुख कारण होते हैं।
राग के वशीभूत होकर मनुष्य हित और अहित का विचार नहीं कर पाता। वह अपने संचित पुण्य को नष्ट कर पाप के मार्ग पर आगे बढ़ता है और संसार में भ्रमण करता रहता है। इसलिए मनुष्य को राग का त्याग कर वैराग्य एवं वीतरागता के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए। वीतराग भाव ही जीव के लिए कल्याणकारी है।
मार्दव धर्म जीवन के लिए हितकारी
धर्मसभा के अंत में पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि सरलता मानव जीवन का आभूषण है, क्षमा आनंद की जननी और विनय सुख का आधार है। इसके विपरीत अहंकार, मान और मद जीवन को विनाश की ओर ले जाते हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश देते हुए कहा कि मान का त्याग कर मार्दव धर्म को स्वीकार करें। मनुष्य की वास्तविक श्रेष्ठता दूसरों को छोटा समझने में नहीं, बल्कि अपने अहंकार को समाप्त कर विनयपूर्वक जीवन जीने में है। उत्तम मार्दव धर्म मन को सरल, व्यवहार को मधुर और आत्मा को निर्मल बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
