प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स का शुभारंभ इंदौर में प्राकृत प्रज्ञ आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के सानिध्य में हुआ। प्रो. जी.एस. मूर्ति, प्रो. डॉ. अनुपम जैन और डॉ. पारस जैन ने पाठ्यक्रम की जानकारी दी। पढ़ें पूरी खबर।
प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स का शुभारंभ: आचार्य सुनील सागर जी महाराज के सानिध्य में नई ऐतिहासिक पहल
रिपोर्ट: राजेश जैन दद्दू | इंदौर
भारत सरकार द्वारा प्राकृत को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने के बाद भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems – IKS) को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स का शुभारंभ गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर इंदौर के नेमी नगर जैन कॉलोनी में प्राकृत प्रज्ञ मनीषी जैनाचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के सानिध्य में किया गया।
यह ऑनलाइन पाठ्यक्रम आईकेएस विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा तैयार किया गया है। कार्यक्रम में प्रोफेसर जी.एस. मूर्ति (नेशनल कोऑर्डिनेटर, IKS, नई दिल्ली) विशेष रूप से उपस्थित रहे।
प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स का शुभारंभ
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इसका शुभारंभ गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज के मंगल सानिध्य में सम्पन्न हुआ।
प्रो. डॉ. अनुपम जैन ने बताया महत्व
प्रसिद्ध जैन गणितज्ञ एवं देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के IKS के मुख्य अन्वेषक प्रोफेसर डॉ. अनुपम जैन ने कहा कि प्राकृत भाषा को जाने बिना जैन संस्कृति एवं भारतीय ज्ञान परंपरा को समझना संभव नहीं है।उन्होंने बताया कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, दर्शन, साहित्य और जैन आगमों का मूल आधार प्राकृत भाषा है। इसलिए इस भाषा का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
डॉ. पारस जैन ने दी पाठ्यक्रम की जानकारी
प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स के संयोजक डॉ. पारस जैन ने बताया कि यह छह माह का ऑनलाइन कोर्स होगा।मुख्य विशेषताएँ—
- सप्ताह में तीन दिन कक्षाएं
- देशभर के प्राकृत विशेषज्ञों द्वारा अध्यापन
- आधुनिक तकनीक के माध्यम से ऑनलाइन संचालन
- राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध
- पूर्णतः गुणवत्तापूर्ण एवं निशुल्क
प्रो. जी.एस. मूर्ति का संबोधन
प्रोफेसर जी.एस. मूर्ति, नेशनल कोऑर्डिनेटर, IKS, नई दिल्ली ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण के लिए गुरुओं का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।उन्होंने कहा कि इस पाठ्यक्रम के लिए आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज का आशीर्वाद प्राप्त करना पूरे विभाग के लिए सौभाग्य की बात है।उन्होंने जानकारी दी कि अभी तक कश्मीर से कन्याकुमारी तक के 200 से अधिक शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी इस पाठ्यक्रम के लिए पंजीयन करा चुके हैं।
आचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज का प्रेरक संदेश
प्राकृताचार्य श्री सुनील सागर जी महाराज ने कार्यक्रम का शुभारंभ प्राकृत भाषा के मंगलाचरण से किया।उन्होंने कहा कि—
- प्राकृत भारत की अनेक भाषाओं की जननी है।
- हिंदी की जड़ें प्राकृत एवं अपभ्रंश में हैं।
- आज भी हिंदी में सैकड़ों प्राकृत शब्दों का उपयोग होता है।
- भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए प्राकृत भाषा का अध्ययन आवश्यक है।
आचार्य श्री ने इस महत्वपूर्ण पहल के लिए प्रो. जी.एस. मूर्ति, प्रो. डॉ. अनुपम जैन, डॉ. पारस जैन एवं पूरी टीम को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
जैन गणित संदर्भ ग्रंथ की भेंट
कार्यक्रम के दौरान प्रो. जी.एस. मूर्ति ने IKS विभाग द्वारा प्रकाशित तथा प्रोफेसर डॉ. अनुपम जैन द्वारा रचित जैन गणित संदर्भ ग्रंथ की प्रति आचार्य श्री को भेंट की।आचार्य श्री ने लेखक एवं प्रकाशक को अपना सुभाषीष प्रदान किया।इसी अवसर पर ‘प्राकृत साहित्य में गणित’ विषयक नई कृति के सृजन की प्रेरणा भी आचार्य श्री ने दी, जिसे प्रो. डॉ. अनुपम जैन ने गुरु आज्ञा मानकर स्वीकार किया।प्रो. जी.एस. मूर्ति ने इस नई कृति के प्रकाशन हेतु सरकार की ओर से अग्रिम सैद्धांतिक सहमति मिलने की जानकारी भी दी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
प्राकृत सर्टिफिकेट कोर्स केवल भाषा सीखने का माध्यम नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति, जैन दर्शन, प्राचीन साहित्य और भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है। यह पाठ्यक्रम देशभर के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों एवं भारतीय संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।
