10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या, पूर्णिमा सहित 15 दिनों तक होगा श्राद्ध और तर्पण
रिपोर्ट: मनोज जैन नायक
मुरैना। पितृपक्ष में दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी और अन्य पूर्वजों का स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा तथा कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। परिवार अपनी परंपरा के अनुसार तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध, भोजन और दान करते हैं। इस वर्ष 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है। इसके अगले दिन 27 सितंबर से नियमित पितृपक्ष शुरू होगा, जिसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर होगा। पूर्णिमा श्राद्ध को साथ गिनने पर श्रद्धा कर्म की तारीखें 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक, कुल 15 कैलेंडर दिनों में आती हैं।
वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि जिन परिजनों का निधन पूर्णिमा तिथि पर हुआ था, उनका श्राद्ध 26 सितंबर को किया जाएगा। नियमित श्राद्ध पक्ष में दिवंगत व्यक्ति की मृत्यु की चंद्र तिथि के अनुसार दिन चुना जाता है। इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर में मृत्यु की तारीख और हर साल होने वाले श्राद्ध की तारीख अलग हो सकती हैं।
अपराह्न काल के आधार पर तय होती है तिथि
डॉ. जैन के अनुसार, श्राद्ध सामान्यतः अपराह्न काल में किया जाता है। जिस दिन संबंधित तिथि अपराह्न में प्राप्त होती है, उस दिन उसका श्राद्ध माना जाता है। यही वजह है कि कभी एक कैलेंडर दिन पर दो तिथियों का श्राद्ध बताया जाता है। तिथि के शुरू और समाप्त होने का समय तथा स्थानीय पंचांग की गणना देखकर परिवार अपनी पूजा का समय तय कर सकते हैं।
पंचांगों में कुछ श्राद्ध तिथियों की तारीखों को लेकर स्थान या गणना के अनुसार अंतर भी मिल सकता है। इसलिए नीचे दिया क्रम डॉ. जैन की ओर से मुरैना के लिए बताई गई जानकारी के अनुसार है। किसी निश्चित तिथि पर विधि कराने वाले परिवार स्थानीय पंचांग से समय का मिलान कर लें।
किस दिन होगा कौन-सा श्राद्ध?
डॉ. जैन के बताए क्रम में 26 सितंबर, शनिवार को पूर्णिमा और 27 सितंबर, रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध होगा। इसके बाद 28 सितंबर को द्वितीया और 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध रखा गया है। 30 सितंबर, बुधवार को चतुर्थी और पंचमी, दोनों के श्राद्ध बताए गए हैं। उनके अनुसार, तिथियों के अपराह्न काल में प्राप्त होने के आधार पर यह व्यवस्था बनी है। एक अन्य प्रकाशित पंचांग में भी 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी, दोनों श्राद्ध दर्ज हैं।
1 अक्टूबर को षष्ठी, 2 अक्टूबर को सप्तमी और 3 अक्टूबर को अष्टमी श्राद्ध होगा। 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध है। पारिवारिक परंपराओं में इस दिन को मातृ नवमी के रूप में भी महत्व दिया जाता है। इसके बाद 5 अक्टूबर को दशमी, 6 अक्टूबर को एकादशी और 7 अक्टूबर को द्वादशी श्राद्ध होगा। डॉ. जैन के अनुसार, 7 अक्टूबर को मघा श्राद्ध भी है। 8 अक्टूबर को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध रखा गया है। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ यह क्रम पूरा होगा।
मृत्यु तिथि याद न हो तो क्या करें?
डॉ. जैन ने बताया कि यदि किसी दिवंगत परिजन की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या निर्धारित दिन पर श्राद्ध नहीं हो पाया है, तो परिवार अपनी परंपरा के अनुसार 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण कर सकते हैं। इसी वजह से पितृपक्ष के अंतिम दिन का अनेक परिवारों के लिए विशेष महत्व है। श्राद्ध की विधि में क्षेत्र और परिवार के अनुसार भिन्नता रहती है। कहीं जल से तर्पण प्रमुख है, तो कहीं पिंडदान, ब्राह्मण भोज या जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा निभाई जाती है। डॉ. जैन ने कहा कि पितृपक्ष का भाव केवल विधि संपन्न करना नहीं, बल्कि पूर्वजों को याद करना और उनके प्रति कृतज्ञता तथा सेवा भाव व्यक्त करना भी है।
