पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी चातुर्मास 2026 का शुभारंभ दिल्ली ऋषभ विहार में हुआ। हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में संयम, साधना और अहिंसा का प्रेरक संदेश दिया गया।
पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी चातुर्मास 2026: संयम, साधना और अहिंसा का महापर्व
रिपोर्ट: राजेश जैन ‘दद्दू’ | इंदौर/दिल्ली
दिल्ली के ऋषभ विहार में 37वें चातुर्मास का शुभारंभ
पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी चातुर्मास 2026 का 37वां वर्षायोग (चातुर्मास) मंगलवार को दिल्ली के ऋषभ विहार में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ प्रारंभ हुआ। सकल दिगंबर जैन समाज दिल्ली-एनसीआर के तत्वावधान में आयोजित मंगल कलश स्थापना समारोह में देशभर से हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे। धार्मिक वातावरण, मंत्रोच्चार और भक्ति के बीच चातुर्मास की विधिवत स्थापना की गई।
संयम, साधना और अहिंसा का संदेश
अपने प्रेरणादायी प्रवचन में पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि चातुर्मास आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का अनुष्ठान है। इसका मूल उद्देश्य अहिंसा की उपासना और आत्मकल्याण है।उन्होंने कहा—“अहिंसा ही परम धर्म है। उसकी आराधना करने वाला साधक भगवान बनने की दिशा में अग्रसर होता है।”उन्होंने स्पष्ट कहा कि चातुर्मास धन संग्रह, बाहरी व्यवस्थाओं या राजनीति का माध्यम नहीं बल्कि आत्मसाधना का पवित्र अवसर है। यह श्रावक और श्रमण के मिलन का पर्व है, जिसमें श्रद्धालुओं को संतों के सान्निध्य में धर्मश्रवण एवं साधना का सौभाग्य प्राप्त होता है।
चातुर्मास का ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व
पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी ने बताया कि प्राचीन काल में मुनिराज वर्षा ऋतु में जंगलों में वृक्षों के नीचे वर्षावास करते थे। वे महीने-महीने के उपवास एवं अत्यंत नीरस आहार से कठोर तपस्या करते थे।उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में साधकों की शारीरिक क्षमता पहले जैसी नहीं रही, इसलिए अब वे भवनों में चार माह तक रुककर विशेष साधना, स्वाध्याय, तप और धर्मप्रभावना करते हैं।चातुर्मास केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आत्मसंयम, चरित्र निर्माण और समाज में अहिंसा के संदेश का महापर्व है।
मंगल कलश स्थापना की परंपरा कैसे शुरू हुई?
समारोह में बताया गया कि वर्ष 1973 में समाधिस्थ आचार्य विमल सागर जी महाराज के चातुर्मास से मंगल कलश स्थापना की परंपरा प्रारंभ हुई थी।कलश मंगल, समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। परंपरा के अनुसार मुनिगण भक्ति पाठ के माध्यम से चातुर्मास की स्थापना करते हैं, जबकि श्रद्धालु मंगल कलश स्थापित कर धर्मलाभ प्राप्त करते हैं।
इन गणमान्य लोगों की रही गरिमामयी उपस्थिति
समारोह में अनेक संत, विद्वान, जनप्रतिनिधि एवं समाजसेवी उपस्थित रहे, जिनमें प्रमुख रूप से—
- आचार्य श्री प्रज्ञ सागर जी महाराज
- श्रवणबेलगोला के भट्टारक स्वामी चारुकीर्ति जी
- अखिल भारतीय शास्त्री परिषद के अध्यक्ष पंडित श्रेयांश जैन बड़ौत
- विभिन्न दिगंबर जैन तीर्थों के अध्यक्ष
- विधायक
- राज्यसभा सदस्य
- इंदौर के वरिष्ठ समाजसेवी आजाद जैन
- हंसमुख गांधी
- सीए अशोक खासगीवाला
- धर्मेंद्र पाटनी
- डॉ. जैनेंद्र जैन
- प्रतिपाल टोंग्या
- पंकज जैन (पिंकी)
- कमलेश कासलीवाल
- नेमी बड़कुल
- मनीष मोना
- सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
प्रथम एवं द्वितीय मुख्य कलश का सौभाग्य
चातुर्मास के प्रथम मुख्य कलश का सौभाग्य दिल्ली के श्री शैलेश धर्मेंद्र एवं पिंटू जैन परिवार को प्राप्त हुआ।द्वितीय मुख्य कलश इंदौर के वरिष्ठ समाजसेवी स्वर्गीय हेमचंद जैन की स्मृति में श्रीमती मीना जैन, स्वतंत्र जैन एवं भरत जैन परिवार द्वारा स्थापित किया गया।
धर्मसभा का संचालन
पूरे कार्यक्रम का सफल संचालन विजेंद्र जैन एवं पंडित कमल कुमार कमलांकुर ने किया।
निष्कर्ष
पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी चातुर्मास 2026 का शुभारंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि समाज को संयम, सदाचार, आत्मानुशासन और अहिंसा की दिशा में प्रेरित करने वाला आध्यात्मिक महापर्व है। हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में आयोजित यह समारोह जैन समाज की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक एकता का जीवंत उदाहरण बन गया।

