उत्तम शौच धर्म की आराधना के साथ भगवान पुष्पदंत को चढ़ाया निर्वाण लड्डू
दाना ओली के चंपाबाग जैन मंदिर में दशलक्षण पूजन, आचार्य चैत्य सागर महाराज ने बताया संतोष और शुचिता का महत्व
ग्वालियर। पर्युषण महापर्व के चौथे दिन शनिवार को जैन धर्मावलंबियों ने उत्तम शौच धर्म की श्रद्धा और भक्तिभाव से आराधना की। आचार्य श्री 108 चैत्य सागर महाराज एवं मुनिश्री 108 अनुमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में दाना ओली स्थित दिगंबर बीसपंथी चंपाबाग जैन मंदिर में दशलक्षण महामंडल पूजन का आयोजन किया गया। इस दौरान जैन धर्म के नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत के मोक्ष कल्याणक पर श्रद्धालुओं ने निर्वाण लड्डू समर्पित किया।
आत्म साधना वर्षायोग समिति और सकल जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान में बड़ी संख्या में महिला, पुरुष एवं बच्चे शामिल हुए। मंदिर परिसर भगवान जिनेंद्र और आचार्यश्री के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने भक्ति नृत्य करते हुए महाअर्घ्य समर्पित किए।
पंचामृत अभिषेक और शांतिधारा
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि प्रतिष्ठाचार्य पंडित डॉ. आनंद प्रकाश शास्त्री के निर्देशन में श्रद्धालुओं ने मंत्रोच्चार के बीच भगवान जिनेंद्र को पांडुशिला पर विराजमान किया। इसके बाद रजत कलशों से श्रीजी का जलाभिषेक और पंचामृत अभिषेक किया गया। आचार्यश्री के मुखारविंद से उच्चारित मंत्रों के बीच संजीव जैन, संभव जैन एवं विकास जैन परिवार ने वृहद शांतिधारा करने का सौभाग्य प्राप्त किया।
दशलक्षण महामंडल विधान में नित्य पूजन, नवदेवता पूजन, पंचमेरु पूजन, दशलक्षण पूजन, निर्वाण पूजन और उत्तम शौच धर्म की विशेष पूजा की गई। श्रद्धालुओं ने संगीत की मधुर धुनों पर भक्ति नृत्य करते हुए भगवान जिनेंद्र के चरणों में अर्घ्य चढ़ाए।
पुष्पदंत भगवान को निर्वाण लड्डू समर्पित
भगवान पुष्पदंत के मोक्ष कल्याणक अवसर पर आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज और मुनिश्री अनुमान सागर महाराज के सानिध्य में निर्वाण पाठ का वाचन किया गया। प्रथम निर्वाण लड्डू चढ़ाने का सौभाग्य राजू जैन, पंकज जैन और अनामिका जैन परिवार को प्राप्त हुआ। इसके बाद अन्य श्रावक-श्राविकाओं ने भी भक्तिभाव से निर्वाण लड्डू समर्पित किए।
शाम को मंदिर में दीपकों से श्रीजी की महाआरती की गई। समाज के प्रवक्ता ने बताया कि पर्युषण पर्व के पांचवें दिन 20 सितंबर को उत्तम सत्य धर्म की पूजा और आराधना की जाएगी।
लोभ की निवृत्ति ही उत्तम शौच धर्म
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज ने कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ चार प्रमुख कषाय हैं। इनमें लोभ अनेक पापों और दुखों का कारण बनता है। लोभी व्यक्ति आवश्यकता से अधिक धन एवं चल-अचल संपत्ति एकत्र करने की इच्छा में अनुचित कार्यों की ओर बढ़ सकता है।
आचार्यश्री ने कहा कि लोभ की निवृत्ति ही उत्तम शौच धर्म है। जहां निर्लोभता होगी, वहीं वास्तविक शौच धर्म प्रकट होगा। अपने भीतर संतोष का भाव, निर्लोभ वृत्ति और आचरण में शुचिता लाना ही इस धर्म का मूल संदेश है। इच्छाओं और आवश्यकता से अधिक संग्रह करने की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखते हुए जो उपलब्ध है, उसमें संतोष और प्रसन्नता अनुभव करनी चाहिए।
इस अवसर पर समिति अध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र गंगवाल, महामंत्री निर्मल पाटनी, विनय कासलीवाल, विकास जैन, पंकज छाबड़ा और संजय गोधा ने आचार्यश्री के चरणों में श्रीफल अर्पित किया।
मन की निर्मलता ही शौच धर्म: मुनिश्री
मुनिश्री अनुमान सागर महाराज ने कहा कि मन की पवित्रता, निर्मलता और स्वच्छता ही शौच धर्म है। आत्मिक पवित्रता के लिए यह धर्म संजीवनी के समान है। जैन शास्त्रों में पवित्रता को शौच कहा गया है और निर्मलता आत्मा का स्वाभाविक गुण है। जो व्यक्ति लालसा, लालच, तृष्णा और अनावश्यक अभिलाषाओं का त्याग करता है, उसकी आत्मा पवित्रता की ओर अग्रसर होती है।
