नागदा चातुर्मास में महासती सरोज श्रीजी म.सा. ने कहा कि इंसान काम से ज्यादा नाम कमाने में दिन-रात लगा है। धर्म, जिनवाणी, पांच महाव्रत और आत्मजागृति का संदेश दिया।
नागदा चातुर्मास में महासती सरोज श्रीजी की बड़ी सीख, बोलीं- इंसान काम नहीं, सिर्फ नाम के लिए दिन-रात खपा रहा
नागदा जं. | जीवनलाल जैन।
नागदा चातुर्मास के दौरान महावीर भवन में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धया शासन दीपिका महासती श्री चारित्रप्रभा श्रीजी म.सा. की शिष्या पूज्य महासती श्री सरोज श्रीजी म.सा. ने श्रद्धालुओं को जीवन में धर्म, आत्मजागृति और जीवदया के महत्व का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में इंसान काम में इतना व्यस्त हो गया है कि 24 घंटे में से पांच मिनट भी धर्म और आत्मचिंतन के लिए निकालना मुश्किल समझता है।
हुक्म संघ के नवम पट्टधर 1008 पूज्य आचार्य भगवन श्री रामलाल जी म.सा. की आज्ञानुव्रती शिष्या श्रद्धया शासन दीपिका महासती श्री चारित्रप्रभा श्रीजी म.सा. आदि ठाना-3 का चातुर्मास नागदा में चल रहा है। इसी क्रम में महावीर भवन में आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
धर्म से ही जीवन में आता है वास्तविक परिवर्तन
महासती श्री सरोज श्रीजी म.सा. ने कहा कि जीवन में परिवर्तन केवल धार्मिक क्रियाएं करने या धर्मस्थान पर जाने से ही नहीं, बल्कि धर्म को अपने आचरण में उतारने से आता है। कई ऐसे जीव भी होते हैं जिनके दर्शन मात्र से अथवा एक जिनवाणी सुनने से उनके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन आ जाता है।उन्होंने कहा कि जिनवाणी मन की चंचलता को कम करती है और व्यक्ति के भीतर आस्था तथा आत्मविश्वास पैदा करती है। जीवन में वास्तविक शांति का मार्ग धर्मस्थान और धर्म की शरण से होकर गुजरता है।
‘इंसान काम के लिए नहीं, सिर्फ नाम के लिए दिन-रात खपा रहा’
महासती श्री सरोज श्रीजी ने वर्तमान जीवनशैली पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इंसान अपने काम में इतना मशगूल हो गया है कि 24 घंटों में पांच मिनट भी धर्म के लिए निकाल नहीं पाता।उन्होंने कहा कि आज व्यक्ति काम भी केवल काम के लिए नहीं, बल्कि अपना नाम बनाने के लिए कर रहा है। “इंसान काम के लिए नहीं, सिर्फ अपना नाम करने के लिए दिन और रात खपा देता है।”उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन करने का आह्वान किया और कहा कि जीवन में तप, त्याग, तपस्या और आराधना हो या न हो, लेकिन पांच महाव्रतों के पालन का प्रयास जरूर होना चाहिए।
आत्मा को जागृत करने का दिया संदेश
महासती श्रीजी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आत्मा को जागृत करने की आवश्यकता है। जब चेतना सही दिशा में होगी, तभी जीवों की रक्षा संभव होगी। उन्होंने कहा कि शक्ति और सामर्थ्य होते हुए भी यदि कोई जीवों की रक्षा नहीं करता तो उसके भव बिगड़ सकते हैं।उन्होंने मन, वचन और काया की चंचलता पर भी चिंतन करने की बात कही। साथ ही श्रद्धालुओं से पूछा कि वे अपने दैनिक जीवन में जीव और अजीव का कितना ध्यान रखते हैं।उन्होंने शरीर और आत्मा के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि शरीर अलग है और आत्मा अलग। इसलिए मनुष्य के लिए भेदज्ञान का होना जरूरी है।
श्रद्धा और आस्था से ज्ञान की वृद्धि
धर्मसभा में महासती श्री सरोज श्रीजी म.सा. ने कहा कि जीवन में श्रद्धा और आस्था का होना अत्यंत आवश्यक है। यदि व्यक्ति के भीतर श्रद्धा और आस्था की कमी होगी तो ज्ञान की वृद्धि भी संभव नहीं हो सकती।उन्होंने श्रद्धालुओं को धर्म को केवल धार्मिक गतिविधि तक सीमित नहीं रखने, बल्कि अपने व्यवहार और जीवनशैली में उतारने की प्रेरणा दी।
9 अगस्त को होगा सामायिक और नवकार महामंत्र जाप
धर्मसभा में बताया गया कि जिनशासन गौरव पूज्य उमेंशमुनिजी म.सा. की मासिक पुण्यतिथि श्रावण विदि ग्यारस के अवसर पर 9 अगस्त को महावीर भवन में 5-5 सामायिक एवं श्री नवकार महामंत्र के भव्य जाप का आयोजन किया जाएगा।
इस आयोजन के लाभार्थी श्री मनोहरलाल रवि कुमार कांठेड़ रहेंगे। धार्मिक आयोजन के साथ श्री माधवाचार्य शिक्षण बोर्ड समिति, थांदला द्वारा धार्मिक परीक्षा का आयोजन भी किया जाएगा।
धर्मसभा में ये श्रद्धालु रहे उपस्थित
धर्मसभा में विलास पावेचा, अनुज कांठेड़, श्रेणिक बम, जितेश भंडारी, अनिल पावेचा, मनोज कोठारी, राजेन्द्र लुणावत, सुनिल भामावत, प्रकाश चपलोत, मनीष भंडारी और राकेश कोलन सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित थे।
इस अवसर पर 2 उपवास निर्मला चंडालिया के बताए गए। आतिथ्य सत्कार चातुर्मास समिति के अध्यक्ष दिलीप कांठेड़ ने किया, जबकि आभार चंद्रशेखर जैन ने माना।
नागदा में चल रहे नागदा चातुर्मास के दौरान लगातार धार्मिक आयोजनों और धर्मसभाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, संयम, अहिंसा, जीवदया और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जा रही है। जैन समाज के लिए ऐसे आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ जीवन में सकारात्मक बदलाव का संदेश भी देते हैं।
