मुनि सुधासागर जी के प्रवचन में इंदौर में कर्म, धर्म, संस्कार और परिवार की विरासत पर महत्वपूर्ण संदेश दिया गया। जानिए क्यों मुनिश्री ने कहा कि कर्म सबसे बलवान हैं और धर्म को जीवित रखने के लिए संस्कार जरूरी हैं।
मुनि सुधासागर जी के प्रवचन: कर्म से डरो, कर्म किसी के भी मीत नहीं होते
रिपोर्टर: राजेश जैन दद्दू | इंदौर
मुनि सुधासागर जी के प्रवचन: कर्म से डरो, कर्म किसी के भी मीत नहीं होते
इंदौर। श्रमण संस्कृति के महाश्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कर्म, धर्म और संस्कारों पर अत्यंत प्रेरणादायक संदेश दिया। मुनि सुधासागर जी के प्रवचन में उन्होंने कहा कि इस संसार में यदि कोई सबसे अधिक शक्तिशाली है तो वह कर्म हैं। कर्म न किसी के मित्र होते हैं और न ही किसी पर दया करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य चाहे गुरु से न डरे, भगवान से भी न डरे, लेकिन उसे अपने कर्मों से अवश्य डरना चाहिए क्योंकि कर्म किसी को भी नहीं छोड़ते।
भगवान आदिनाथ का उदाहरण देकर समझाया कर्म का प्रभाव
मुनि सुधासागर जी के प्रवचन में भगवान आदिनाथ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म के कर्मों के कारण भगवान आदिनाथ को भी 7 माह 7 दिन तक आहार की विधि प्राप्त नहीं हुई थी। इससे स्पष्ट होता है कि कर्मों का प्रभाव देव, मानव और महापुरुष सभी पर समान रूप से पड़ता है।उन्होंने कहा कि कर्मों का बंधन तभी समाप्त होता है जब मनुष्य संयम, तप, त्याग और धर्म के मार्ग पर चलता है।
भारतीय नारी का सबसे बड़ा धन उसकी संतान
मुनिश्री ने भारतीय संस्कृति की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय नारी के लिए धन-दौलत से अधिक प्रिय उसकी संतान होती है। विशेष रूप से पुत्र को वह वंश परंपरा का वाहक मानती है।उन्होंने कहा कि विवाह केवल भोग-विलास का संबंध नहीं बल्कि परिवार, संस्कार और आने वाली पीढ़ी को श्रेष्ठ बनाने का माध्यम है। विवाह का वास्तविक उद्देश्य समाज और परिवार को श्रेष्ठ संस्कार देना है।
धर्म को भी चाहिए योग्य वारिस
मुनि सुधासागर जी के प्रवचन में उन्होंने कहा कि जिस प्रकार परिवार और संपत्ति को संभालने के लिए उत्तराधिकारी आवश्यक होता है, उसी प्रकार धर्म को जीवित रखने के लिए भी योग्य वारिस की आवश्यकता होती है।यदि नई पीढ़ी को धर्म, संयम और संस्कृति के संस्कार नहीं दिए जाएंगे तो आने वाले समय में धार्मिक परंपराएं कमजोर हो जाएंगी।
अपने बच्चों को धर्म के संस्कार देकर जाएं
रिपोर्टर राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनिश्री ने आगे कहा कि प्रत्येक माता-पिता का कर्तव्य है कि वे अपनी संतान को ऐसे संस्कार दें जिससे उनके जाने के बाद भी परिवार में धर्म जीवित रहे।उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि यदि प्रत्येक परिवार यह नियम बना ले कि घर का प्रत्येक सदस्य देव दर्शन करने के बाद ही भोजन करेगा, तो आने वाली पीढ़ियां भी उसी परंपरा का पालन करेंगी और धर्म सदैव जीवित रहेगा।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे
धर्मसभा का संचालन अनुराग जैन ने किया।इस अवसर पर आकाश कोल, प्रिंसिपल टोंग्या, सपना, मनीष गोधा, आनंद, नवीन गोधा, भूपेंद्र जैन, अखिलेश सोधिया, श्रीमती मुक्ता जैन तथा सोनाली बगड़िया सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
निष्कर्ष
मुनि सुधासागर जी के प्रवचन केवल धार्मिक उपदेश नहीं बल्कि जीवन जीने की कला का संदेश हैं। कर्मों से सावधान रहना, परिवार में संस्कारों की परंपरा बनाए रखना और धर्म को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। यदि समाज इन शिक्षाओं को अपनाता है तो परिवार, संस्कृति और राष्ट्र तीनों मजबूत होंगे।


