मन की निर्मलता ही उत्तम शौच धर्म की सच्ची साधना: आचार्यश्री उदारसागर
भगवान पुष्पदंत स्वामी का निर्वाण लाडू अर्पित कर मनाया मोक्ष कल्याणक
Morena , मनोज जैन नायक। दस दिवसीय पर्वराज पर्युषण पर्व के अंतर्गत श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में प्रतिदिन विभिन्न धर्मों की आराधना की जा रही है। पर्व के चतुर्थ दिवस शनिवार को उत्तम शौच धर्म की आराधना की गई। इस अवसर पर नगर में चातुर्मासरत ज्ञानरत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि शौच धर्म का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और विचारों की पवित्रता है।
आचार्यश्री ने कहा कि जिस प्रकार शरीर को स्वच्छ रखने के लिए स्नान आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा को निर्मल रखने के लिए लोभ, लालच, संग्रह और परिग्रह जैसी विकृतियों का त्याग करना जरूरी है। लोभ मनुष्य को कभी संतुष्ट नहीं होने देता। व्यक्ति के पास जितना अधिक धन, संपत्ति और साधन आते हैं, उसकी इच्छाएं भी उतनी ही बढ़ती जाती हैं। वास्तविक सुख वस्तुओं के अधिक संग्रह में नहीं, बल्कि इच्छाओं को सीमित करने और प्राप्त वस्तुओं में संतोष रखने में है।
उन्होंने कहा कि उत्तम शौच धर्म हमें सिखाता है कि किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के प्रति अनावश्यक आसक्ति न रखते हुए संतोष और संयम का भाव विकसित किया जाए। यदि मन में ईर्ष्या, द्वेष, कपट और लोभ का मैल जमा हो जाए तो केवल बाहरी स्वच्छता का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। जिसका मन निर्मल होता है, उसके व्यवहार में सरलता, वाणी में मधुरता और जीवन में संतोष दिखाई देता है।
आचार्यश्री ने पर्युषण पर्व को आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का अवसर बताते हुए श्रद्धालुओं से अपने भीतर झांकने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि उसके भीतर कौन-कौन से विकार मौजूद हैं और उन्हें दूर करने के लिए वह क्या प्रयास कर सकता है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को कम करते हुए त्याग, संयम, संतोष और निष्परिग्रह को जीवन में अपनाना ही उत्तम शौच धर्म की साधना है।

मुनिश्री उपशांत सागर ने भी दिया आत्मशुद्धि का संदेश
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि जिस दिन मनुष्य के भीतर संग्रह की जगह संतोष, लोभ की जगह त्याग और अशुद्ध विचारों की जगह आत्मचिंतन का भाव उत्पन्न हो जाता है, उसी दिन उत्तम शौच धर्म जीवन में उतरने लगता है।
उन्होंने कहा कि पर्युषण पर्व का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि धर्म के गुणों को अपने व्यवहार और जीवन में उतारना है। सच्ची शुचिता मन और भावों की निर्मलता में निहित है। बाहरी रूप से स्वच्छ रहने के बावजूद यदि मन में लोभ, ईर्ष्या, छल-कपट और संग्रह की भावना है, तो जीवन की वास्तविक पवित्रता अधूरी रह जाती है।
मुनिश्री ने कहा कि लोभ का कोई अंत नहीं है। इसलिए इच्छाओं को सीमित कर संतोष का भाव अपनाना उत्तम शौच धर्म की सच्ची साधना है। मन की सफाई के लिए प्रतिदिन आत्मावलोकन जरूरी है। पर्युषण पर्व इसी आत्मशुद्धि का अवसर प्रदान करता है।

भगवान पुष्पदंत स्वामी का मोक्ष कल्याणक मनाया
चातुर्मासरत आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में जैन धर्म के नवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत नाथ का निर्वाण महोत्सव भी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया।
प्रतिष्ठाचार्य पं. महेंद्रकुमार शास्त्री ने विधिविधानपूर्वक मंत्रोच्चारण के साथ निर्वाण कांड का वाचन किया। मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ प्रथम निर्वाण लाडू डालचंद जैन

