जैन समाज के आत्मसम्मान और संस्कृति पर आघात! अब मौन नहीं, जागरण का समय- मनीष कुमट
झकनावदा – नई दिल्ली के ऐतिहासिक श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर में घटित एक घटनाक्रम ने देशभर के जैन समाज को गहरी पीड़ा और आक्रोश से भर दिया है। पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी द्वारा परम पूज्य जैन आचार्यों एवं संतों की उपस्थिति में दिगंबर जैन मुनियों की पवित्र मयूर पिच्छिका को लेकर दिए गए कथित बयान ने समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है।
स्वयं को जैन मुनियों से अधिक जैन होने तक की बात कही
सामाजिक कार्यकर्ता मनीष कुमट ने बताया कि मेनका गांधी ने यह आरोप लगाया कि मयूर पिच्छिका के निर्माण के लिए लाखों मोरों को मारा जाता है। इतना ही नहीं, उन्होंने स्वयं को जैन मुनियों से अधिक जैन होने तक की बात कही। इस प्रकार की टिप्पणी न केवल तथ्यात्मक रूप से विवादित है, बल्कि जैन धर्म की हजारों वर्षों पुरानी अहिंसा, तपस्या और संयम की परंपरा पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास प्रतीत होती है।
दिगंबर जैन साधुओं द्वारा उपयोग की जाने वाली मयूर पिच्छिका प्राकृतिक रूप से झड़े हुए मोरपंखों से निर्मित होती है
जैन समाज का स्पष्ट मत है कि दिगंबर जैन साधुओं द्वारा उपयोग की जाने वाली मयूर पिच्छिका प्राकृतिक रूप से झड़े हुए मोरपंखों से निर्मित होती है। जैन धर्म का मूल आधार ही अहिंसा है, जहाँ सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव की रक्षा को भी सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। ऐसे में हिंसा से जुड़ा कोई भी आरोप जैन दर्शन और उसकी मूल भावना के सर्वथा विपरीत माना जाता है।
जैन समाज में इस घटना को लेकर रोष व्याप्त
देशभर के जैन समाज में इस घटना को लेकर रोष व्याप्त है। समाज के विभिन्न संगठनों, धर्माचार्यों और श्रद्धालुओं ने मांग की है कि धार्मिक परंपराओं पर टिप्पणी करने से पूर्व उनके वास्तविक स्वरूप और इतिहास को समझा जाना चाहिए। किसी भी धर्म की मान्यताओं पर बिना पर्याप्त जानकारी के सार्वजनिक टिप्पणी करना सामाजिक सौहार्द और आपसी सम्मान की भावना को ठेस पहुंचा सकता है।
धार्मिक आस्थाओं का सम्मान लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की पहचान है जैन समाज
जैन समाज ने स्पष्ट किया है कि वह अहिंसा, सत्य और संयम के मार्ग पर चलते हुए अपने धर्म, संस्कृति और संत परंपरा के सम्मान की रक्षा के लिए सदैव प्रतिबद्ध रहेगा। समाज का मानना है कि धार्मिक आस्थाओं का सम्मान लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की पहचान है, और किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले वक्तव्यों से बचना चाहिए।
जैन संतों का त्याग, तप और अहिंसा केवल जैन समाज की ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की अमूल्य धरोहर
आज आवश्यकता इस बात की है कि जैन समाज एकजुट होकर अपनी गौरवशाली परंपरा, संस्कृति और सिद्धांतों के प्रति जागरूकता बढ़ाए तथा तथ्यों के आधार पर समाज के समक्ष अपना पक्ष मजबूती से रखे। जैन संतों का त्याग, तप और अहिंसा केवल जैन समाज की ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की अमूल्य धरोहर है।
