निजी स्कूलों में स्टेशनरी कमीशन को लेकर झाबुआ जिले में अभिभावकों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। निजी स्कूलों द्वारा चयनित दुकानों से स्टेशनरी, पुस्तकें और यूनिफॉर्म खरीदने का दबाव बनाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। शिक्षा विभाग से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की गई है।
निजी स्कूलों में स्टेशनरी कमीशन का खेल! अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ, शिक्षा विभाग से कार्रवाई की मांग
रिपोर्ट: मनीष कुमट, झाबुआ
झाबुआ। निजी स्कूलों में स्टेशनरी कमीशन को लेकर एक बार फिर अभिभावकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ जिले के कई निजी विद्यालयों में स्टेशनरी, पुस्तकें और यूनिफॉर्म की खरीदारी को लेकर कथित कमीशनखोरी के आरोप सामने आए हैं। पालकों का कहना है कि कुछ निजी विद्यालय प्रबंधन विद्यार्थियों के अभिभावकों पर विशेष दुकानों से ही शैक्षणिक सामग्री खरीदने का दबाव बना रहे हैं, जिससे उन्हें बाजार में उपलब्ध सस्ते और बेहतर विकल्पों का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
निजी स्कूलों में स्टेशनरी कमीशन का आरोप
झाबुआ जिले के कई अभिभावकों ने आरोप लगाया है कि कुछ निजी विद्यालय छात्रों के लिए आवश्यक स्टेशनरी, पुस्तकें और यूनिफॉर्म खरीदने हेतु निश्चित दुकानों की सूची प्रदान करते हैं। कई मामलों में अभिभावकों को मौखिक रूप से भी बताया जाता है कि सामग्री केवल उन्हीं दुकानों से खरीदी जाए।
अभिभावकों का कहना है कि यदि वे अन्य दुकानों से सामग्री खरीदने का प्रयास करते हैं तो उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से हतोत्साहित किया जाता है। इससे निजी स्कूलों में स्टेशनरी कमीशन की आशंकाएं और अधिक मजबूत होती हैं।
अभिभावकों ने लगाए गंभीर आरोप
कई अभिभावकों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि विद्यालयों द्वारा निर्धारित दुकानों पर पुस्तकों, कॉपियों और यूनिफॉर्म की कीमतें सामान्य बाजार दरों से अधिक होती हैं।उनका कहना है कि:
- बाजार में वही सामग्री कम कीमत पर उपलब्ध है।
- विद्यालय द्वारा निर्धारित दुकानों से खरीदारी करने पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है।
- प्रतिस्पर्धी बाजार के विकल्प समाप्त हो जाते हैं।
- आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
अभिभावकों का आरोप है कि यह व्यवस्था शिक्षा से अधिक व्यावसायिक हितों को बढ़ावा देती दिखाई देती है।
शिक्षा या व्यापार?
शिक्षा को समाज में सेवा और विकास का माध्यम माना जाता है। विद्यालयों का उद्देश्य विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करना है। लेकिन यदि किसी भी स्तर पर शिक्षा संस्थान व्यापारिक गतिविधियों से जुड़ते दिखाई दें तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विद्यालय किसी विशेष दुकान से सामग्री खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाते हैं तो इससे शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता प्रभावित होती है।
शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल
निजी स्कूलों में स्टेशनरी कमीशन की शिकायतें केवल आर्थिक बोझ का विषय नहीं हैं बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं।यदि किसी विद्यालय और दुकान के बीच कमीशन आधारित व्यवस्था संचालित होती है तो उसका सीधा प्रभाव अभिभावकों की जेब पर पड़ता है।
बढ़ रहा है आर्थिक बोझ
नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में अभिभावकों को पहले ही फीस, परिवहन, पुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्चों का सामना करना पड़ता है।ऐसे में यदि उन्हें महंगी दुकानों से सामग्री खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है तो यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन जाता है।अभिभावकों का कहना है कि:
- पुस्तकें बाजार से कम कीमत पर मिल सकती हैं।
- यूनिफॉर्म कई दर्जियों द्वारा तैयार कराई जा सकती है।
- स्टेशनरी स्थानीय दुकानों पर सस्ती उपलब्ध है।
इसके बावजूद निर्धारित दुकानों से खरीदारी का दबाव अनुचित प्रतीत होता है।
नियम क्या कहते हैं?
शिक्षा के अधिकार अधिनियम और विभिन्न सरकारी निर्देशों की भावना यही है कि अभिभावकों को अपनी सुविधा और आर्थिक क्षमता के अनुसार किसी भी दुकान से शैक्षणिक सामग्री खरीदने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।कई राज्यों में शिक्षा विभाग द्वारा समय-समय पर यह निर्देश भी जारी किए जाते रहे हैं कि विद्यालय अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से खरीदारी करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।
अभिभावकों का अधिकार
अभिभावकों को अधिकार है कि वे:
- अपनी पसंद की दुकान से स्टेशनरी खरीदें।
- किसी भी प्रकाशक की उपलब्ध पुस्तकें खरीदें।
- यूनिफॉर्म अपनी सुविधा अनुसार तैयार कराएं।
- कम कीमत वाले विकल्प चुन सकें।
गंभीर जांच का विषय
यदि निजी स्कूलों में स्टेशनरी कमीशन संबंधी आरोप सही पाए जाते हैं तो यह गंभीर जांच का विषय बन सकता है।शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में:
- विद्यालय प्रबंधन से जवाब मांगा जाना चाहिए।
- दुकानों और विद्यालयों के बीच संबंधों की जांच होनी चाहिए।
- मूल्य निर्धारण की पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- अभिभावकों की शिकायतों का सत्यापन किया जाना चाहिए।
प्रशासन से क्या मांग कर रहे हैं अभिभावक?
झाबुआ जिले के अभिभावकों ने प्रशासन और शिक्षा विभाग से मांग की है कि:
- निजी विद्यालयों की जांच कराई जाए।
- निर्धारित दुकानों की व्यवस्था की समीक्षा की जाए।
- अभिभावकों की शिकायतें सुनी जाएं।
- दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाए।
- शिक्षा विभाग स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे।
अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक है।
शिक्षा विभाग की भूमिका
जिला शिक्षा अधिकारी, बीआरसी तथा संबंधित अधिकारियों से अपेक्षा की जा रही है कि वे इस मामले को गंभीरता से लें।विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षा विभाग को:
- शिकायतों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।
- अभिभावकों के बयान दर्ज करने चाहिए।
- विद्यालयों को नियमों का पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश देने चाहिए।
- भविष्य में ऐसी शिकायतों की रोकथाम के लिए निगरानी तंत्र विकसित करना चाहिए।
अभिभावकों की बढ़ती नाराजगी
झाबुआ जिले में कई पालकों का कहना है कि शिक्षा पहले से ही महंगी होती जा रही है। ऐसे में यदि स्टेशनरी और यूनिफॉर्म के नाम पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव बनाया जाता है तो यह आम परिवारों के लिए बड़ी समस्या बन जाती है।अभिभावकों का मानना है कि विद्यालयों को केवल शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए, न कि व्यापारिक गतिविधियों पर।
निष्कर्ष
निजी स्कूलों में स्टेशनरी कमीशन को लेकर झाबुआ जिले में उठे सवाल शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े हैं। यदि किसी भी विद्यालय द्वारा अभिभावकों को विशेष दुकानों से सामग्री खरीदने के लिए बाध्य किया जा रहा है, तो यह जांच और कार्रवाई का विषय है।
जिले के अभिभावकों ने प्रशासन और शिक्षा विभाग से निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि विद्यालय शिक्षा के मंदिर हैं और उन्हें व्यापार का केंद्र बनने से बचाया जाना चाहिए।
(रिपोर्ट: मनीष कुमट, झाबुआ | दैनिक स्वराज वाणी)
