संवत्सरी प्रतिक्रमण के बाद झकनावदा श्रीसंघ ने इंदौर पहुंचकर गच्छाधिपति से की क्षमायाचना
गच्छाधिपति श्री नित्यसेन सूरीजी महाराज साहेब ने कहा—मन में किसी के प्रति वैर न रखें, सभी जीवों से मैत्री भाव रखें
झकनावदा। जैन समाज के प्रमुख आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व के अंतिम दिवस संवत्सरी पर झकनावदा नगर में धर्माराधना, प्रतिक्रमण और क्षमायाचना का विशेष वातावरण रहा। समाजजनों ने विधि-विधानपूर्वक संवत्सरी प्रतिक्रमण करते हुए वर्षभर में जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगी। इस दौरान सभी ने ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहकर मन में किसी के प्रति द्वेष और वैर न रखने का संकल्प लिया।
केसरियानाथ जिनालय में हुई महाआरती
संवत्सरी पर्व के समापन के पश्चात झकनावदा स्थित श्री केसरियानाथ जिनालय में समाजजनों द्वारा भक्तिभाव के साथ महाआरती का आयोजन किया गया। महाआरती के विभिन्न चढ़ावे समाजजनों ने उत्साहपूर्वक लिए और लाभार्थियों द्वारा भगवान की महाआरती उतारी गई। इस दौरान जिनालय परिसर में भक्ति, श्रद्धा और धार्मिक उल्लास का वातावरण बना रहा।
इंदौर पहुंचकर गच्छाधिपति के किए दर्शन
संवत्सरी पर्व के अगले दिन बुधवार सुबह झकनावदा श्रीसंघ का प्रतिनिधिमंडल इंदौर पहुंचा। यहां चातुर्मास में विराजमान पुण्य सम्राट के पट्टधर गच्छाधिपति श्री नित्यसेन सूरीजी महाराज साहेब आदि ठाणा के दर्शन-वंदन कर श्रीसंघ के सदस्यों ने उनकी सुखसाता पूछी।
प्रतिनिधिमंडल में श्रीसंघ के शैतानमल कुमट, अखिल भारतीय श्री राजेंद्र जैन नवयुवक परिषद के प्रांतीय सह मीडिया प्रभारी मनीष कुमट, राजेंद्र कुमार सेठिया, हर्ष मांडोत और तेजस कुमट सहित अन्य समाजजन शामिल रहे। इस अवसर पर धार जिले के राजगढ़ श्रीसंघ के प्रतिनिधियों ने भी महाराज साहेब के दर्शन-वंदन किए।
श्रीसंघ के सदस्यों ने ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहते हुए गुरुदेव से क्षमायाचना की तथा पर्युषण महापर्व के दौरान हुई धार्मिक आराधना और संवत्सरी पर्व के आयोजन की जानकारी भी उनके समक्ष रखी।
गुरुदेव ने बताया क्षमापना पर्व का वास्तविक महत्व
गच्छाधिपति श्री नित्यसेन सूरीजी महाराज साहेब ने समाजजनों को संबोधित करते हुए कहा कि संवत्सरी केवल औपचारिक रूप से एक-दूसरे से क्षमा मांगने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने अंतर्मन में झांकने और आत्मचिंतन करने का अवसर है। व्यक्ति को अपनी भूलों को स्वीकार कर उन्हें दोबारा न दोहराने का संकल्प लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दूसरों से क्षमा मांगने के साथ उन्हें क्षमा करना भी उतना ही आवश्यक है। यदि मन में किसी व्यक्ति के प्रति राग, द्वेष या वैर का भाव बना हुआ है तो क्षमापना की भावना पूर्ण नहीं हो सकती।
सभी जीवों के प्रति मैत्री भाव रखने का संदेश
गुरुदेव ने कहा कि जैन धर्म सभी जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और अहिंसा का भाव रखने की प्रेरणा देता है। ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ की भावना को केवल संवत्सरी पर्व तक सीमित न रखते हुए दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।
परिवार, समाज और व्यवसाय में आपसी प्रेम, सद्भाव और विश्वास बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि पर्युषण पर्व की सार्थकता तभी है, जब पर्व के दौरान किए गए आत्मचिंतन, तप, त्याग, स्वाध्याय और क्षमापना की भावना हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे।
दिगंबर जैनाचार्य श्री सुधा सागर जी के भी किए दर्शन
गुरुदेव के मंगल संदेश को सुनकर झकनावदा श्रीसंघ के सदस्यों ने आशीर्वाद प्राप्त किया और धर्म, संयम एवं क्षमाभाव को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया। इस दौरान संघ के सदस्यों ने इंदौर में चातुर्मास में विराजमान दिगंबर जैनाचार्य श्री सुधा सागर जी के भी दर्शन-वंदन किए, उनकी सुखसाता पूछी और ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ कहते हुए क्षमायाचना की।
फोटो कैप्शन: गच्छाधिपति श्री नित्यसेन सूरीजी महाराज साहेब से क्षमायाचना करता झकनावदा श्रीसंघ।
