त्याग से आत्मा होती है निर्मल, ममत्व छोड़ना ही सच्चा त्याग: आचार्य उदारसागर
दशलक्षण पर्व के आठवें दिन मुरैना के बड़े जैन मंदिर में उत्तम त्याग धर्म की आराधना, धर्मसभा में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु
रिपोर्ट: मनोज जैन नायक, दैनिक स्वराज वाणी
मुरैना। दशलक्षण पर्व के आठवें दिन बुधवार को बड़े जैन मंदिर में उत्तम त्याग धर्म की आराधना श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ की गई। सुबह से मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही रही। पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद आयोजित धर्मसभा में जैनाचार्य उदारसागरजी महाराज तथा मुनि उपशांत सागरजी के प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। दोनों संतों ने श्रद्धालुओं को जीवन में संग्रह, मोह और मन के विकारों पर विचार करने का संदेश दिया।
वस्तु छोड़ने के साथ मन का मोह छोड़ना जरूरी
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य उदारसागरजी महाराज ने कहा कि त्याग का अर्थ केवल किसी वस्तु को छोड़ देना नहीं है। उस वस्तु के प्रति मन में उत्पन्न ममत्व, आसक्ति और मोह को छोड़ना ही वास्तविक त्याग है। मनुष्य संसार में रहते हुए धन, संपत्ति, परिवार और भौतिक साधनों को अपना मानकर उनसे गहरा लगाव बना लेता है। जब यह लगाव आवश्यकता से अधिक बढ़ जाता है, तो दुख का कारण बनता है।
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में वस्तुओं का उपयोग होता है, लेकिन उनके प्रति अत्यधिक मोह और संग्रह की भावना व्यक्ति को बांधती है। इसलिए हर व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं और अपने संग्रह के बीच अंतर समझना चाहिए। जो वस्तु उसके पास जरूरत से अधिक है, वह किसी अन्य के काम आ सकती है। उसे समाज और जरूरतमंदों के हित में देना उत्तम त्याग धर्म की भावना के अनुरूप है।
नाव में भरे पानी के उदाहरण से समझाया त्याग
आचार्य उदारसागरजी महाराज ने नाव और पानी का दृष्टांत देते हुए कहा कि नाव में पानी भरने लगे तो उसे बाहर निकालना पड़ता है। पानी न निकाला जाए तो नाव धीरे-धीरे डूब सकती है। इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह और उनके प्रति बढ़ता ममत्व आत्मकल्याण के मार्ग में बाधा बन जाता है।
उन्होंने कहा कि जरूरत से अधिक संग्रहित वस्तुओं का त्याग कर उन्हें दूसरों के हित में लगाना चाहिए। दान से जरूरतमंद को सहायता मिलती है और दान देने वाला व्यक्ति भी संग्रह के प्रति अपना मोह कम करने का अभ्यास करता है। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि त्याग को अपने दैनिक जीवन और व्यवहार में उतारने का प्रयास करें।
प्रशंसा की अपेक्षा से कमजोर होती है त्याग की भावना
आचार्यश्री ने कहा कि दान देना त्याग का एक रूप है, लेकिन अपने भीतर के विकारों को छोड़ना उससे भी बड़ी साधना है। क्रोध, मान, छल-कपट, लोभ और राग-द्वेष का त्याग करके व्यक्ति आत्मिक शांति की ओर बढ़ सकता है। केवल बाहरी वस्तु छोड़ देने से मन के ये दोष अपने आप दूर नहीं होते; इसके लिए अपने विचारों और आचरण पर भी ध्यान देना पड़ता है।
उन्होंने त्याग के बाद अहंकार से बचने का संदेश दिया। आचार्यश्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति दान देकर उसका प्रदर्शन करता है या बदले में सम्मान और प्रशंसा की अपेक्षा रखता है, तो त्याग की वास्तविक भावना कमजोर हो जाती है। देने वाले के मन में किसी पर उपकार करने का भाव नहीं होना चाहिए। त्याग को आत्मकल्याण की साधना समझकर किया जाना चाहिए।
भीतर के विकारों का त्याग भी आवश्यक: मुनि उपशांत सागर
मुनि उपशांत सागरजी ने कहा कि जैन दर्शन में त्याग केवल बाहरी वस्तुओं तक सीमित नहीं है। इसका संबंध मनुष्य के भीतर छिपे विकारों से भी है। कोई व्यक्ति धन का त्याग कर दे, लेकिन क्रोध और लोभ को अपने भीतर बनाए रखे, तो उसे अपने व्यवहार पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।
मुनिश्री ने कहा कि ‘मेरा’ और ‘तेरा’ की भावना मोह को बढ़ाती है। संसार की भौतिक वस्तुएं परिवर्तनशील हैं और शरीर भी स्थायी नहीं है। इस बात को समझते हुए मनुष्य को वस्तुओं का सदुपयोग करना चाहिए, साथ ही उनके प्रति अपनी आसक्ति कम करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने व्यवहार में सरलता और संयम अपनाने का आह्वान किया।
एक बुरी आदत छोड़ने का संकल्प लें
मुनि उपशांत सागरजी ने दशलक्षण पर्व को आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का अवसर बताया। उन्होंने कहा कि पर्व के दस दिनों में प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर झांककर यह देखना चाहिए कि उसके स्वभाव में कौन से दोष हैं और किन बुराइयों को छोड़ा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति इन दिनों में एक बुरी आदत भी जीवनभर के लिए छोड़ने का संकल्प ले और उसे निभाए, तो पर्व की साधना उसके जीवन में सार्थक बदलाव ला सकती है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि उत्तम त्याग धर्म के अवसर पर वस्तुओं के दान के साथ दुर्व्यसन, कटु वचन, क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष छोड़ने का भी संकल्प लें। मन के इन विकारों को कम करना आत्मा को निर्मल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
दशलक्षण पर्व के चलते बड़े जैन मंदिर में प्रतिदिन पूजन, धार्मिक अनुष्ठान और प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं। प्रतिष्ठाचार्य पंडित महेंद्रकुमार शास्त्री ने बताया कि अगले दिन उत्तम आकिंचन धर्म की आराधना की जाएगी। इस अवसर पर मुनिराज आकिंचन धर्म की महत्ता और आत्मकल्याण में उसकी भूमिका पर प्रवचन देंगे।
