कुलपति चयन समिति पर उठे सवाल: ABVP की 2011 की सूची में था प्रो. एन.सी. गौतम का नाम, अब IGNTU चयन समिति में शामिल होने का दावा
संवाददाता – मदन मोहन मिश्रा
अनूपपुर। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक में नए कुलपति के चयन की प्रक्रिया के बीच चयन समिति की संरचना को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। विवाद का केंद्र पूर्व कुलपति प्रो. एन.सी. गौतम को बताया जा रहा है। दावा किया गया है कि उनका नाम वर्ष 2011 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के अभियान ‘यूथ अगेंस्ट करप्शन’ द्वारा जारी कथित भ्रष्ट कुलपतियों की सूची में शामिल था, जबकि अब उन्हें IGNTU की कुलपति चयन प्रक्रिया से जुड़ी समिति में सदस्य बनाया गया है।
2011 की सूची का दिया जा रहा हवाला
12 मई 2011 को नई दिल्ली में ‘यूथ अगेंस्ट करप्शन’ अभियान की शुरुआत के दौरान ABVP ने देश के 25 कुलपतियों को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे। संगठन ने उस समय दावा किया था कि संबंधित कुलपतियों से जुड़ी कथित वित्तीय एवं प्रशासनिक अनियमितताओं के दस्तावेज उसके पास मौजूद हैं।
इस संबंध में 29 मई 2011 को ‘ऑर्गेनाइजर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया जा रहा है। बताया जा रहा है कि उस समय जारी सूची में महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय, सतना के पूर्व कुलपति प्रो. एन.सी. गौतम का नाम भी शामिल था।
हालांकि, किसी संगठन द्वारा सूची में नाम शामिल करना अपने आप में भ्रष्टाचार सिद्ध होने या किसी न्यायिक दोषसिद्धि के बराबर नहीं है। संबंधित आरोपों पर किसी सक्षम न्यायालय या जांच एजेंसी के अंतिम निष्कर्ष की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
IGNTU की चयन समिति में शामिल किए जाने पर सवाल
दावा है कि शिक्षा मंत्रालय की 15 जून 2026 की नोटशीट के अनुसार प्रो. एन.सी. गौतम को IGNTU, अमरकंटक की कुलपति चयन समिति में सदस्य के रूप में शामिल किया गया है।
बताया गया है कि समिति ने 20 और 21 अगस्त 2026 को प्राप्त आवेदनों की स्क्रूटनी की और अभ्यर्थियों को शॉर्टलिस्ट किया। चयन प्रक्रिया के तहत 29 और 30 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में इंटरेक्शन प्रस्तावित होने की बात कही गई है।
इसी को लेकर सवाल उठाया जा रहा है कि यदि किसी चयन समिति के सदस्य के संबंध में पूर्व में सार्वजनिक स्तर पर गंभीर आरोप लगाए गए थे, तो उनकी नियुक्ति से पहले संबंधित तथ्यों और आरोपों की स्थिति की जांच की गई थी या नहीं।
चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी प्रश्न
शिकायतकर्ताओं की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि अलग-अलग केंद्रीय विश्वविद्यालयों की कुलपति चयन प्रक्रियाओं में कुछ नाम बार-बार शॉर्टलिस्ट होते रहे हैं। गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय और डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर की प्रक्रियाओं को लेकर भी शिकायतों का उल्लेख किया गया है।
शिकायत पक्ष का कहना है कि बड़ी संख्या में आवेदन प्राप्त होने के बावजूद यदि सीमित नाम विभिन्न चयन प्रक्रियाओं में लगातार सामने आते हैं, तो शॉर्टलिस्टिंग के मानदंड, स्कोरिंग व्यवस्था और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता सार्वजनिक होनी चाहिए।
इन आरोपों और कथित पैटर्न की स्वतंत्र जांच अथवा आधिकारिक पुष्टि के बिना इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
मामले में कानूनी तर्क के रूप में Centre for PIL बनाम Union of India (2011) के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला दिया जा रहा है। यह मामला केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पी.जे. थॉमस की नियुक्ति से संबंधित था, जिसमें न्यायालय ने उच्च सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति के संदर्भ में ‘institutional integrity’ के महत्व पर विचार किया था।
इसके अतिरिक्त Gambhirdan K. Gadhvi बनाम State of Gujarat (2022) के निर्णय का उल्लेख करते हुए यह तर्क दिया जा रहा है कि कुलपति की नियुक्ति और सर्च/चयन समिति का गठन लागू कानून तथा संबंधित विनियमों के अनुरूप होना आवश्यक है।
Babu Verghese बनाम Bar Council of Kerala (1999) के निर्णय का भी हवाला दिया गया है, जिसमें वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित होने पर उसी के अनुरूप कार्यवाही किए जाने के सिद्धांत पर जोर दिया गया था।
हालांकि इन फैसलों का IGNTU की मौजूदा चयन प्रक्रिया पर क्या कानूनी प्रभाव पड़ेगा, यह संबंधित अधिनियम, नियमों, समिति के गठन और पूरे तथ्यात्मक रिकॉर्ड की न्यायिक जांच पर निर्भर करेगा।
मंत्रालय और विश्वविद्यालय के पक्ष का इंतजार
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि IGNTU की कुलपति चयन समिति का गठन किन नियमों और प्रक्रियाओं के आधार पर किया गया तथा समिति सदस्यों की नियुक्ति से पहले किस स्तर पर सत्यापन किया गया।
प्रो. एन.सी. गौतम, शिक्षा मंत्रालय अथवा IGNTU प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक पक्ष सामने आने पर उसे भी समाचार में शामिल किया जाना आवश्यक होगा। जब तक संबंधित दस्तावेजों, न्यायिक रिकॉर्ड और मंत्रालय के आधिकारिक जवाब से आरोपों की पुष्टि नहीं होती, तब तक मामले को आरोप और उठाए गए सवालों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
