हार्दिक हुंडिया ‘कल्याणी मित्र’ ने जैन समाज में धार्मिक अनुष्ठानों, मंदिर निर्माण, प्रतिष्ठा महोत्सव और खर्च को लेकर सवाल उठाते हुए धर्म के उद्देश्य और धन की शुद्धता पर आत्ममंथन का आह्वान किया।
क्या धार्मिक अनुष्ठानों में पुण्य की जगह पाप का बंध कर रहे हैं हम? हार्दिक हुंडिया ने उठाए सवाल
“अनीति से अर्जित धन से धर्म नहीं होता, समाज को सत्य का ज्ञान देना भी जरूरी” — हार्दिक हुंडिया
विशेष आलेख। जैन समाज में होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों, मंदिर निर्माण, प्रतिष्ठा महोत्सव और इन आयोजनों पर होने वाले बड़े खर्च को लेकर लेखक हार्दिक हुंडिया ‘कल्याणी मित्र’ ने कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि धार्मिक आयोजन का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण, धर्म प्रभावना और समाज का उत्थान होना चाहिए। यदि धर्म के माध्यम से केवल प्रतिष्ठा, नाम और व्यक्तिगत हित प्राप्त करना उद्देश्य बन जाए तो समाज को इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
हुंडिया ने अपने आलेख में सवाल उठाया है कि क्या आज कुछ धार्मिक अनुष्ठानों को करते हुए हम पुण्य अर्जित करने के बजाय अनजाने में पाप बंध की दिशा में तो नहीं बढ़ रहे हैं?
“अनीति के धन से धर्म नहीं होता”
हार्दिक हुंडिया ने पंच महाव्रत धारण करने वाले साधु-संतों से भी समाज को इस विषय में मार्गदर्शन देने की अपेक्षा जताई है। उनके अनुसार केवल धार्मिक कार्यों के लिए धन देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धन किस तरीके से अर्जित किया गया है, इस पर भी विचार होना चाहिए।
उन्होंने एक काल्पनिक उदाहरण के माध्यम से अपनी बात रखते हुए लिखा कि यदि कोई व्यक्ति अनुचित तरीके से अर्जित धन के बल पर धार्मिक निर्माण या आयोजन करता है और इसके माध्यम से सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल करता है, तो ऐसे मामलों में समाज और धर्मगुरुओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
उनका तर्क है कि धर्म का उपयोग किसी व्यक्ति की सामाजिक छवि बनाने या निजी आर्थिक हितों को पूरा करने के माध्यम के रूप में नहीं होना चाहिए।
प्रतिष्ठा महोत्सव के खर्च पर भी उठाया सवाल
हुंडिया ने मंदिर प्रतिष्ठा और बड़े धार्मिक आयोजनों में होने वाले खर्च का उल्लेख करते हुए कहा कि मूर्ति निर्माण, स्थापत्य कार्य, टेंट, भोजन व्यवस्था, गायन, प्रिंटिंग, बैंड-बाजा, ढोल-शहनाई, घोड़े-ऊंट, सुसज्जित वाहन, फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी, इवेंट मैनेजमेंट और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों सहित कई सेवाओं पर बड़ी राशि खर्च होती है।
उनका दावा है कि ऐसे आयोजनों में खर्च होने वाली राशि का बड़ा हिस्सा जैन समाज से बाहर के सेवा प्रदाताओं तक पहुंचता है। हालांकि, आलेख में प्रस्तुत इस अनुपात या आर्थिक आकलन के समर्थन में कोई स्वतंत्र आंकड़ा नहीं दिया गया है।
“धर्म का मूल उद्देश्य आत्मकल्याण रहे”
हार्दिक हुंडिया ने जैन धर्म के अनुयायियों से आह्वान किया कि वे धार्मिक आयोजनों के स्वरूप, उद्देश्य और उन पर होने वाले खर्च पर चिंतन करें। उनके अनुसार धर्म के नाम पर होने वाला प्रत्येक कार्य अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मकल्याण की मूल भावना के अनुरूप होना चाहिए।
उन्होंने साधु-संतों से भी अपेक्षा जताई कि वे चतुर्विध संघ को ऐसा मार्गदर्शन दें जिससे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के बजाय धर्म, समाज और आत्मा के कल्याण को प्राथमिकता मिले।
लेख के अंत में हुंडिया ने जैन समाज से आत्ममंथन का आग्रह करते हुए सवाल रखा है—“हम जिन कार्यों को पुण्य समझकर कर रहे हैं, क्या उनके उद्देश्य और साधन भी वास्तव में धर्मसम्मत हैं?”
