गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी के अम्बाह प्रवास में धर्मसभा, पूजन और प्रवचन का आयोजन हुआ। माताजी ने बच्चों को धर्म, संस्कार, स्वाध्याय, संयम और पूजा का महत्व बताते हुए प्रेरणादायक संदेश दिया।
गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी ने बच्चों को दिए धर्म, पूजन एवं संस्कारों के अमूल्य सूत्र
रिपोर्टर: मनोज जैन नायक | मुरैना/अम्बाह
मुरैना/अम्बाह। गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी के पावन सान्निध्य में रविवार को जैन बगीची, अम्बाह में पूजन, धर्मसभा एवं आध्यात्मिक प्रवचन का भव्य आयोजन श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं, महिलाओं, युवाओं एवं बच्चों ने भाग लेकर जिनेन्द्र भगवान की विधि-विधानपूर्वक पूजन-अर्चना की तथा धर्मलाभ प्राप्त किया। पूरे परिसर में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण का विशेष उल्लास देखने को मिला।
धर्मसभा का भव्य आयोजन
जैन बगीची में आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी। भगवान जिनेन्द्र की पूजा-अर्चना के बाद धर्मसभा का आयोजन हुआ, जिसमें गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी ने अपने ओजस्वी एवं प्रेरणादायक प्रवचन से सभी को धर्म, संस्कार और आत्मचिंतन का महत्व समझाया।
कार्यक्रम में महिलाओं, युवाओं एवं बच्चों ने अत्यंत श्रद्धा और अनुशासन के साथ भाग लिया। धार्मिक वातावरण में भक्ति गीतों एवं पूजन के माध्यम से पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत दिखाई दिया।
गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी का प्रेरक संदेश
धर्मसभा को संबोधित करते हुए गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि पूजन केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और मन की निर्मलता का श्रेष्ठ माध्यम है।उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति श्रद्धा, विनय और समर्पण के साथ पूजा करता है तो उसके भीतर आत्मचिंतन, संयम, विनम्रता और सदाचार के संस्कार स्वतः विकसित होने लगते हैं।
माताजी ने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप बाहरी आडंबर में नहीं बल्कि अपने व्यवहार, विचार और आचरण को पवित्र बनाने में है। यदि व्यक्ति अपने जीवन में धर्म के सिद्धांतों को अपनाता है तो उसका जीवन सुख, शांति और संतुलन से भर जाता है।
पूजन का आध्यात्मिक महत्व
गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि पूजन व्यक्ति के भीतर अहिंसा, सत्य, क्षमा, करुणा, संयम और विनम्रता जैसे दिव्य गुणों का विकास करती है।उन्होंने कहा कि पूजा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की एक श्रेष्ठ कला है। जब मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता है तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः आने लगते हैं।
माताजी ने बताया कि धर्म व्यक्ति को केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी श्रेष्ठ बनाता है। धार्मिक संस्कार परिवार और समाज को मजबूत बनाते हैं।
बच्चों को दिए संस्कारों के अमूल्य सूत्र
अपने प्रवचन के दौरान गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी ने विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को संबोधित किया।उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बावजूद प्रत्येक बच्चे को प्रतिदिन कुछ समय पूजा, स्वाध्याय, जिनवाणी अध्ययन और आत्मचिंतन के लिए अवश्य निकालना चाहिए।उन्होंने कहा कि यही अभ्यास बच्चों में—
- आत्मविश्वास
- अनुशासन
- विवेक
- नैतिक शक्ति
- सकारात्मक सोच
- आत्मसंयम
जैसे गुणों का विकास करता है।माताजी ने बच्चों से मोबाइल और सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से बचने तथा अध्ययन एवं धर्म दोनों में संतुलन बनाए रखने का संदेश भी दिया।
अभिभावकों से विशेष अपील
गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है।उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को बचपन से ही—
- पूजा
- स्वाध्याय
- जिनवाणी
- धार्मिक संस्कार
- बड़ों का सम्मान
- सत्य एवं अहिंसा
का अभ्यास कराएं।उन्होंने कहा कि संस्कारयुक्त पीढ़ी ही समाज, संस्कृति और राष्ट्र का उज्ज्वल भविष्य तैयार करती है।
श्रद्धालुओं ने लिया संकल्प
धर्मसभा के समापन पर सभी श्रद्धालुओं, महिलाओं और बच्चों ने अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजन किया तथा धर्म, संयम, सेवा और संस्कारों को अपने दैनिक जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।
उपस्थित श्रद्धालुओं ने कहा कि गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी के प्रवचन आत्मकल्याण के साथ-साथ पारिवारिक जीवन को भी नई दिशा देने वाले हैं।
कार्यक्रम का समापन मंगल पाठ एवं धर्म लाभ के साथ हुआ।
निष्कर्ष
गुरूमां आर्यिका संगममति माताजी के प्रवचन ने यह संदेश दिया कि जीवन में धर्म, संस्कार, संयम और आत्मचिंतन का स्थान सर्वोपरि है। यदि परिवार अपने बच्चों को बचपन से धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों से जोड़ता है तो समाज में संस्कारवान, जिम्मेदार और चरित्रवान नागरिकों का निर्माण संभव है। अम्बाह में आयोजित यह धार्मिक आयोजन श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा और जीवन मूल्यों का प्रेरणास्रोत बना।


