शासकीय महाविद्यालय आठनेर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया गया, विद्यार्थियों को स्वरोजगार और करियर के अवसरों की दी जानकारी
हथकरघा उद्योग के इतिहास, महत्व और रोजगार की संभावनाओं पर विशेषज्ञों ने डाला प्रकाश
संवाददाता : आशीष ठाकरे
आठनेर (बैतूल)। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक हस्तकला और स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शासकीय महाविद्यालय आठनेर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस उत्साह और गरिमामय वातावरण में मनाया गया। कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सरोज पाटील के निर्देशन में 7 अगस्त 2026 को किया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापकों ने विद्यार्थियों को हथकरघा उद्योग के ऐतिहासिक महत्व, रोजगार की संभावनाओं, स्वरोजगार के अवसरों तथा भारतीय संस्कृति में इसकी भूमिका से अवगत कराया।
कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के महत्व से परिचित कराना ही नहीं था, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना के अनुरूप हथकरघा क्षेत्र में करियर और उद्यमिता की संभावनाओं के प्रति भी जागरूक करना था। कार्यक्रम में महाविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का उद्देश्य बताया
कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के महत्व पर परिचर्चा से हुई। इस दौरान डॉ. गजानंद ठाकरे ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रीय हथकरघा दिवस देश के लाखों हथकरघा बुनकरों के परिश्रम, कौशल और योगदान को सम्मान देने के उद्देश्य से मनाया जाता है।
उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने वर्ष 2015 से प्रत्येक वर्ष 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाने की शुरुआत की। इसका मुख्य उद्देश्य देश की पारंपरिक बुनाई कला को संरक्षित करना, स्वदेशी वस्त्रों को प्रोत्साहित करना तथा हथकरघा उद्योग से जुड़े कारीगरों को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाना है।
उन्होंने कहा कि हथकरघा केवल वस्त्र निर्माण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान, कला, परंपरा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी है।
विद्यार्थियों को बताए स्वरोजगार और करियर के नए अवसर
कार्यक्रम के दौरान डॉ. निर्मल कुमार विश्वास ने विद्यार्थियों को हथकरघा उद्योग में उपलब्ध रोजगार और स्वरोजगार के अवसरों की विस्तृत जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में हथकरघा क्षेत्र केवल पारंपरिक व्यवसाय तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आधुनिक तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से इसमें रोजगार की असीम संभावनाएं मौजूद हैं।
उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि यदि कोई युवा स्वयं का व्यवसाय शुरू करना चाहता है, तो वह करघा यूनिट स्थापित कर उत्पादन प्रारंभ कर सकता है। इसके लिए स्वयं का फ्रेम लूम या पिट लूम लगाकर कपड़ों का निर्माण किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में हस्तनिर्मित वस्त्रों की देश और विदेश में अच्छी मांग है। यदि युवा अपनी रचनात्मकता और डिज़ाइन क्षमता का उपयोग करें तो वे अपने उत्पादों को एक ब्रांड के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
ई-कॉमर्स और ऑनलाइन मार्केटिंग से बढ़ रहे अवसर
डॉ. निर्मल कुमार विश्वास ने कहा कि डिजिटल युग में हथकरघा उद्योग के लिए ऑनलाइन बाजार एक बड़ी संभावना बनकर उभरा है।
उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि अपने डिज़ाइन किए गए कपड़ों और हस्तनिर्मित वस्त्रों को विभिन्न ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन पोर्टल और सोशल मीडिया के माध्यम से देश-विदेश के ग्राहकों तक पहुंचाया जा सकता है।
इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले हथकरघा एक्सपो, व्यापार मेलों और प्रदर्शनी में भाग लेकर भी अपने उत्पादों की बिक्री की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत सरकार भी हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित कर रही है, जिनका लाभ युवा उद्यमी उठा सकते हैं।
कच्चे माल और रंगाई के व्यवसाय में भी रोजगार की संभावना
कार्यक्रम के दौरान डॉ. विकेश सिंह ने हथकरघा उद्योग से जुड़े अन्य व्यवसायों की जानकारी देते हुए कहा कि इस क्षेत्र में केवल कपड़ा बुनाई ही नहीं, बल्कि कच्चे माल की आपूर्ति, रंगाई, डिज़ाइनिंग और विपणन जैसे अनेक क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं उपलब्ध हैं।
उन्होंने बताया कि सूत की सप्लाई, प्राकृतिक एवं रासायनिक रंगाई, कपड़ों की फिनिशिंग तथा तैयार उत्पादों के विपणन का कार्य भी युवाओं के लिए आय का अच्छा माध्यम बन सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि विद्यार्थी इन क्षेत्रों में प्रशिक्षण प्राप्त करें तो वे स्वयं का व्यवसाय शुरू कर सकते हैं और अन्य लोगों को भी रोजगार उपलब्ध करा सकते हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा है भारतीय हथकरघा का इतिहास
अपने व्याख्यान में डॉ. विकेश सिंह ने भारतीय हथकरघा उद्योग के गौरवशाली इतिहास पर भी विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि पुरातत्वीय खोजों के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप में हथकरघा की शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता के समय से मानी जाती है।
उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में सूती वस्त्रों का निर्माण विश्वभर में प्रसिद्ध था। समय के साथ यह कला और अधिक विकसित होती गई और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई।
मुगल काल में हथकरघा उद्योग को विशेष संरक्षण मिला। शाही संरक्षण के कारण भारत में अनेक उत्कृष्ट वस्त्रों का विकास हुआ, जिनमें मलमल, बनारसी ब्रोकेड तथा जामवार जैसे प्रसिद्ध वस्त्र शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय हथकरघा की विशेषता उसकी हस्तनिर्मित गुणवत्ता, कलात्मक डिज़ाइन और सांस्कृतिक विविधता है, जिसकी मांग आज भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में बनी हुई है।
स्वदेशी उद्योगों को मजबूत करने की आवश्यकता
वक्ताओं ने अपने उद्बोधन में कहा कि वर्तमान समय में मशीनों से बड़े पैमाने पर वस्त्रों का उत्पादन हो रहा है, लेकिन इसके बावजूद हथकरघा उद्योग की अपनी अलग पहचान और महत्व है।
उन्होंने कहा कि हस्तनिर्मित वस्त्र पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और इनमें भारतीय संस्कृति की झलक दिखाई देती है।
यदि अधिक से अधिक लोग स्वदेशी उत्पादों को अपनाएं तो इससे न केवल स्थानीय कारीगरों की आय बढ़ेगी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान को सफल बनाने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएं।
विद्यार्थियों को नवाचार और उद्यमिता अपनाने की सलाह
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को यह भी बताया गया कि आधुनिक समय में पारंपरिक हथकरघा उद्योग को नई तकनीकों के साथ जोड़कर बेहतर आय अर्जित की जा सकती है।
डिजिटल मार्केटिंग, फैशन डिज़ाइन, टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों का उपयोग कर युवा अपने उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचा सकते हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि यदि परंपरा और आधुनिक तकनीक का समन्वय किया जाए तो हथकरघा उद्योग आने वाले वर्षों में युवाओं के लिए रोजगार का एक बड़ा माध्यम बन सकता है।
स्वामी विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ की रही महत्वपूर्ण भूमिका
कार्यक्रम का संचालन और समन्वय स्वामी विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ के माध्यम से किया गया।
प्रकोष्ठ के प्रभारी डॉ. निलेश धुर्वे ने कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के साथ-साथ उन्हें भविष्य की संभावनाओं से भी परिचित कराते हैं। ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवा अपने करियर का सही चयन कर सकते हैं और समाज तथा राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
विद्यार्थियों ने लिया आत्मनिर्भर बनने का संकल्प
कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों ने स्वदेशी उत्पादों को अपनाने, हथकरघा उद्योग के प्रति जागरूकता फैलाने और भारतीय हस्तकला के संरक्षण में अपनी सहभागिता निभाने का संकल्प लिया।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि उन्हें भारतीय परंपरा, स्वदेशी उद्योग, आत्मनिर्भरता और रोजगार के नए अवसरों से जोड़ने वाला एक प्रेरणादायी मंच साबित हुआ।
महाविद्यालय प्रशासन ने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम भविष्य में भी विद्यार्थियों को नई दिशा देने के साथ-साथ उन्हें रोजगारोन्मुखी शिक्षा और उद्यमिता की ओर प्रेरित करते रहेंगे।
