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कुटिलता छोड़ो, सरल बनो – जो जितना सहता है, वही जीवन में ऊँचा उठता है: पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी

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Published On: 18 September 2026
कुटिलता छोड़ो, सरल बनो - जो जितना सहता है, वही जीवन में ऊँचा उठता है: पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी

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*कुटिलता छोड़ो, सरल बनो – जीवन में जो जितना सहता है, वही ऊँचा उठता है : पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी*

राजेश जैन दद्दू

पर्वाधिराज दशलक्षण पर्व के अंतर्गत धर्मसभा में श्रंमण संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य *श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज* ने हजारों श्रावकों को संबोधित करते हुए कहा –

> *”जीवन में जो जितना सहन कर लेता है, वह उतना ही ऊँचाइयों को प्राप्त कर लेता है। धैर्य इंसान को भगवान बना देता है। संकटों में जो सहन कर लेता है, वही शक्तिशाली बन जाता है।”*

*विचार ही जीवन है -*

गुरुदेव ने कहा कि पुण्यक्षीण व्यक्ति के विचार, खान-पान, रहन-सहन, भाषा और व्यवहार निम्न ही होते हैं। जिसका विनाश सुनिश्चित है, उसकी बुद्धि भी क्षीण हो जाती है। विचारों के अनुसार ही व्यक्ति का जीवन बनता है। विचारों की पवित्रता से व्यक्ति उच्चता प्राप्त करता है और निम्नता से निम्नता को। जो अपने विचारों को संभाल लेता है, उसका जीवन स्वयंमेव संभल जाता है।

*शल्य छोड़ो, समाधि अपनाओ -*

महाराज जी ने कहा कि जिसके मन में संकल्प-विकल्प, कल्पना, कुपित परिणाम और पश्चाताप होते हैं, वह शांति से नहीं जी पाता। शल्य दुःखदायी है। जो बात अशांति उत्पन्न करे, चित्त भ्रांत करे, बुद्धि का ह्रास करे, चिंता और अपयश का कारण बने, उनसे प्रयत्नपूर्वक दूर रहना चाहिए।
उन्होंने पाँच सूत्र दिए –

*अहं छोड़ो, नम्र बनो।*

*चिंता छोड़ो, चिंतन करो।*

*संग्राम नहीं, समझौता करना सीखो।*

*हिंसा छोड़ो, अहिंसक बनो।*

*प्रमाद छोड़ो, जागृति पूर्वक कार्य करो।*
गृहस्थी के जाल में फंसा व्यक्ति उसी जाल में मृत्यु को प्राप्त होता है। प्रभुता के बंधन से पार होना सरल है, पर गृहस्थी के जंजाल से निकलना अत्यंत कठिन है।

*कारण से कार्य का बोध –
गुरुदेव ने कहा कि लक्षण से लक्ष्य का बोध होता है, दूरी से घर का और घंटी से मंदिर का। व्यक्ति की भाषा, वेश और भोजन से उसके आंतरिक भावों और कुल का बोध होता है। जैसे भाव करोगे, वैसे ही फल मिलेंगे।
*भाव संभालो, भव सुधर जाएगा।*
उन्होंने कहा कि जो जगत के प्रपंचों में लिप्त है, वह क्षण मात्र भी चित्त शांति को प्राप्त नहीं हो सकता।

*ज्ञान ही प्रकाश है -*
महाराज जी ने कहा कि ज्ञान ही प्रकाश है। ज्ञानाभ्यास से परिणाम विशुद्ध होते हैं। श्रावक के पास ज्ञान और धन दोनों होना चाहिए। धन के बिना श्रावक का जीवन कष्टपूर्ण है, वैसे ही ज्ञान के बिना संयमी का जीवन क्लेशपूर्ण है। संसार में ज्ञान के समान मित्र नहीं और अभिमान के समान शत्रु नहीं।

परिणामों को संभालो -*
अंत में उन्होंने कहा कि हिंसा के परिणामों से अशांति होती है। पल-भर का विशुद्ध परिणाम बहुत बड़ा पुण्य होता है। परिणाम संभल गए तो पर्याय संभल जाएगी। भाव बदलते ही जीवन बदल जाता है। वर्तमान के भाव ही भविष्य का जीवन बनते हैं।

यदि जगत में आनंद से जीना है तो *अनेकांत दृष्टि से देखो। एकांत में दुःख है, अनेकांत में आनंद है। दृष्टि बदलो, सृष्टि बदलेगी।*

*प्रेषक – राजेश जैन दद्दू, मीडिया प्रभारी, दिगम्बर जैन समाज

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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