विसर्जन सिर्फ मूर्ति का नहीं होता…
विसर्जन सिर्फ मूर्ति का नहीं होता,
कुछ भाव भी आज पानी में उतरते हैं…
कुछ प्रार्थनाएं चुप हो जाती हैं,
कुछ आंसू बिना कहे बिखरते हैं।
जिस बप्पा को रोज निहारा था,
आज उन्हीं से नजरें चुरानी पड़ती हैं।
जिनके सामने दिल खोलकर रोए थे,
आज उन्हीं से विदाई कहनी पड़ती है।
**बप्पा…**
आपको मिट्टी से बनाकर पूजा था,
आज उसी मिट्टी में लौटाना है।
शायद यही जीवन का सच है—
जो आया है, उसे एक दिन लौट जाना है।
पर एक बात समझ आई,
ईश्वर मूर्ति में बसते हैं,
मगर सिर्फ मूर्ति तक सीमित नहीं होते।
विसर्जन के बाद भी
अगर मन में श्रद्धा बची रहे,
तो बप्पा कभी हमसे दूर नहीं होते।
आज आपकी प्रतिमा जाएगी,
पर आपकी सीख यहीं रहेगी…
आपकी कृपा यहीं रहेगी…
और सबसे बढ़कर—
आपका नाम हमारे भीतर हमेशा जीवित रहेगा।
इसलिए आंखों में आंसू हैं,
पर दिल में विश्वास भी है—
बप्पा आज जा नहीं रहे,
बस अगली मुलाकात का वादा कर रहे हैं।
**गणपति बप्पा मोरया…
अगले बरस तू जल्दी आ।**
**— पूनम रमेश गांधी**
**राजस्थान**
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