श्री महावीरजी तीर्थ क्षेत्र के स्वरूप में बदलाव का आरोप, दिगंबर जैन समाज ने जताई चिंता
आचार्य विशुद्धसागर महाराज के कथन का उल्लेख; जिन शासन एकता संघ ने शांतिपूर्ण और वैधानिक तरीके से तीर्थ संरक्षण की अपील की
रिपोर्टर: राजेश जैन दद्दू
इंदौर। राजस्थान स्थित प्रसिद्ध जैन तीर्थ श्री महावीरजी में दर्शन व्यवस्था, पूजा-पद्धति और प्रबंधन को लेकर दिगंबर जैन समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने चिंता व्यक्त की है। उनका आरोप है कि तीर्थ क्षेत्र के पारंपरिक दिगंबर स्वरूप को प्रभावित करने वाली गतिविधियां बढ़ रही हैं। हालांकि इन आरोपों की संबंधित तीर्थ प्रबंधन, प्रशासन अथवा दूसरे पक्ष से स्वतंत्र पुष्टि अभी सामने नहीं आई है।
जिन शासन एकता संघ से जुड़े पदाधिकारियों ने कहा कि श्री महावीरजी दिगंबर जैन समाज की आस्था का प्रमुख केंद्र है और यहां प्रचलित पूजा, प्रक्षाल एवं धार्मिक परंपराओं का मूल स्वरूप सुरक्षित रखा जाना चाहिए। संगठन ने समाज के लोगों से भावनात्मक उत्तेजना से बचते हुए शांतिपूर्ण, संवादपूर्ण और वैधानिक माध्यमों से अपनी बात रखने की अपील की है।
आचार्य विशुद्धसागर महाराज के कथन का उल्लेख
जारी वक्तव्य में श्रमण परंपरा के आचार्य विशुद्धसागर महाराज के कथन का उल्लेख करते हुए कहा गया कि दिगंबर जैन समाज ने दूसरे संप्रदायों के तीर्थ क्षेत्रों में जाकर अपना अधिकार जताने का प्रयास नहीं किया, लेकिन दिगंबर परंपरा से जुड़े तीर्थों में बाहरी हस्तक्षेप को लेकर समाज में चिंता बढ़ रही है।
वक्तव्य में आचार्यश्री के हवाले से सवाल उठाया गया कि जब दिगंबर समाज दूसरे पक्ष के मूल धार्मिक क्षेत्रों और व्यवस्थाओं का सम्मान करता आया है, तब उसके प्राचीन तीर्थों की परंपराओं में बदलाव के प्रयास क्यों किए जा रहे हैं। इस कथन को तीर्थों की धार्मिक पहचान और परंपरागत पूजा-पद्धति की रक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।
विश्व प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र है श्री महावीरजी
राजस्थान का श्री महावीरजी क्षेत्र जैन समाज का प्रमुख आस्था केंद्र माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यहां भगवान महावीर की प्राचीन प्रतिमा भूमि से प्रकट हुई थी। देश के अलग-अलग राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
दिगंबर समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस तीर्थ में लंबे समय से दिगंबर पद्धति के अनुसार पूजा, प्रक्षाल और अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते आए हैं। इसलिए क्षेत्र की ऐतिहासिक परंपरा और धार्मिक व्यवस्था में किसी प्रकार का एकतरफा परिवर्तन नहीं होना चाहिए।
समाज के कुछ प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों से तीर्थ की पूजा-पद्धति, दर्शन व्यवस्था और प्रबंधन को लेकर विवाद की स्थिति बन रही है। उनका दावा है कि अन्य परंपराओं से संबंधित गतिविधियां बढ़ने के कारण मूल धार्मिक स्वरूप में बदलाव की आशंका उत्पन्न हुई है। इन दावों पर तीर्थ प्रबंधन और संबंधित पक्ष का आधिकारिक जवाब मिलना शेष है।
‘यह केवल भूमि नहीं, परंपराओं का प्रश्न’
राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि दिगंबर जैन समाज सहिष्णुता, अहिंसा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास रखता है। समाज ने दूसरे संप्रदायों की आस्था, पूजा-पद्धति और धार्मिक क्षेत्रों का हमेशा सम्मान किया है।
उन्होंने कहा, “दिगंबर समाज ने कभी दूसरे पक्ष के धार्मिक स्थलों पर अपनी परंपराएं थोपने या अधिकार जताने का प्रयास नहीं किया। इसके विपरीत दिगंबर परंपरा से जुड़े कुछ प्रमुख तीर्थों और अतिशय क्षेत्रों के धार्मिक स्वरूप को लेकर समाज को समय-समय पर चिंता व्यक्त करनी पड़ रही है।”
दद्दू के अनुसार यह विषय केवल भूमि अथवा भवन से संबंधित नहीं है, बल्कि धार्मिक आस्था, पूजा-पद्धति, परंपरा और आम्नाय की पहचान से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि किसी तीर्थ की मूल व्यवस्था में बदलाव होता है तो उससे उससे जुड़े श्रद्धालुओं की भावनाएं प्रभावित होती हैं।
गिरनार और अन्य क्षेत्रों का भी किया उल्लेख
संगठन के वक्तव्य में श्री गिरनारजी, श्री महावीरजी, श्रवणबेलगोला के आसपास के क्षेत्रों तथा अन्य अतिशय क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है। प्रतिनिधियों ने दावा किया कि इन स्थानों पर धार्मिक अधिकार और परंपराओं को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक धार्मिक समुदाय और संप्रदाय को अपने तीर्थों की परंपराओं के संरक्षण का अधिकार है। साथ ही दूसरे पक्ष की आस्था का सम्मान करना भी आवश्यक है। किसी भी विवाद का समाधान न्यायालय, प्रशासनिक प्रक्रिया, प्रामाणिक ऐतिहासिक दस्तावेज और आपसी संवाद के माध्यम से होना चाहिए।
‘श्री महावीरजी हमारी आस्था का प्राण’
राजेश जैन दद्दू ने कहा, “श्री महावीरजी दिगंबर समाज की आस्था का प्राण है। यहां दिगंबर पूजा-पद्धति और परंपराओं का संरक्षण होना चाहिए। समाज की चिंता है कि यदि प्रमुख तीर्थों का मूल स्वरूप प्रभावित होता रहा तो भविष्य की पीढ़ियों को अपनी प्राचीन धार्मिक विरासत किस रूप में मिलेगी।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन किसी समुदाय के विरोध में नहीं है। उसकी मांग केवल इतनी है कि सभी पक्ष एक-दूसरे की धार्मिक मान्यताओं और परंपरागत तीर्थ व्यवस्थाओं का सम्मान करें। जैन धर्म का मूल संदेश अहिंसा, अनेकांतवाद, क्षमा और ‘जियो और जीने दो’ है। इसी भावना से विवाद का समाधान तलाशा जाना चाहिए।
समाज ने रखीं चार प्रमुख मांगें
जिन शासन एकता संघ और दिगंबर समाज के प्रतिनिधियों ने मांग की कि श्री महावीरजी तीर्थ का पारंपरिक दिगंबर स्वरूप अक्षुण्ण रखा जाए। तीर्थ के प्रबंधन में प्रचलित पूजा-पद्धति, प्रक्षाल और धार्मिक परंपराओं में बिना सहमति कोई परिवर्तन नहीं किया जाए।
संगठन ने केंद्र सरकार, राजस्थान सरकार तथा संबंधित पुरातात्विक और प्रशासनिक संस्थाओं से प्राचीन जैन तीर्थों के ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व का दस्तावेजीकरण कराने की मांग भी की। प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रामाणिक अभिलेखों और विशेषज्ञ अध्ययन के आधार पर संरक्षण की स्पष्ट व्यवस्था होने से भविष्य में विवाद कम किए जा सकते हैं।
इसके साथ ही दोनों जैन परंपराओं के बीच आपसी प्रेम, सम्मान और सद्भाव बनाए रखने की अपील की गई। संगठन ने कहा कि किसी भी पक्ष को दूसरे की मूल पूजा-पद्धति और तीर्थ परंपरा को प्रभावित नहीं करना चाहिए।
शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से संघर्ष की अपील
राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ से जुड़े राकेश गोहिल और मयंक जैन ने कहा कि तीर्थों की धार्मिक पहचान और परंपराओं की सुरक्षा के लिए समाज एकजुट है। उन्होंने कथित हस्तक्षेप रोकने की मांग करते हुए कहा कि इस विषय को शासन, प्रशासन और तीर्थ प्रबंधन के समक्ष तथ्यात्मक रूप से रखा जाएगा।
संघ ने सभी दिगंबर जैन संगठनों, संस्थाओं और समाजजनों से संयम बनाए रखने की अपील की। संगठन ने कहा कि सोशल मीडिया पर अपुष्ट अथवा उत्तेजक सामग्री साझा करने के बजाय प्रामाणिक दस्तावेजों, संवाद और वैधानिक प्रक्रिया का सहारा लिया जाए।
इस विवाद से जुड़े तीर्थ प्रबंधन एवं अन्य संबंधित पक्षों का विस्तृत पक्ष सामने आने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। निष्पक्ष समाधान के लिए सभी पक्षों की बात सुनना और ऐतिहासिक तथा कानूनी अभिलेखों की जांच करना आवश्यक माना जा रहा है।
