दिल्ली में ‘फांसीघर’ विवाद: क्या है पूरा मामला?
दिल्ली विधानसभा परिसर में बने कथित “फांसीघर” को लेकर राजनीतिक उठापटक तेज हो गई है। इस विवाद के केंद्र में हैं पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, जिन्हें इस मामले में पेश होने का समन जारी किया गया है।
विवाद की शुरुआत
22 अगस्त 2022 को दिल्ली विधानसभा परिसर में एक संरचना का उद्घाटन किया गया था, जिसमें केजरीवाल-सिसोदिया मौजूद थे। इस उद्घाटन कार्यक्रम में उस संरचना को स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और शहीदों के बलिदान का प्रतीकात्मक स्मारक बताया गया था।
लेकिन बाद में इस ’फांसीघर’ नामक संरचना को लेकर खर्च, निर्माण एवं प्रमाणीकरण को लेकर सवाल उठने लगे।
मुख्य आरोप
– वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने सत्र में कहा था कि उक्त संरचना वास्तव में ब्रिटिश-कालीन फांसीघाट नहीं, बल्कि “टिफिन रूम” जैसी अन्य कार्य-प्रणाली का हिस्सा थी और सरकार ने इसे ‘जेल जैसी थीम’ में बदलने के लिए करीब 1 करोड़ रुपये खर्च किए।
– इसके बाद विधानसभा की विशेषाधिकार समिति, जिसकी अध्यक्षता प्रद्युम्न सिंह राजपूत कर रहे हैं, ने इस मामले की जांच के लिए समन जारी किया।
समन और हाईकोर्ट अभियोजन
– 6 नवंबर 2025 को, सचिवालय द्वारा नोटिस जारी किया गया जिसमें केजरीवाल, सिसोदिया, पूर्व स्पीकर राम निवास गोयल एवं पूर्व उपाध्यक्ष राखी बिड़ला को 13 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का समन दिया गया था।
– इस समन को केजरीवाल-सिसोदिया ने चुनौती दी और दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की कि यह कार्रवाई “अवैध और राजनीतिक रूप से प्रेरित” है।
– सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि यह “फांसीघर” वास्तव में विधानसभा परिसर में है, तो क्या सदन को अपने परिसर पर नियंत्रण रखने का अधिकार नहीं है?
विधानसभा सचिवालय का रुख
विधानसभा सचिवालय ने इस याचिका पर दावा किया है कि समन कोई विशेषाधिकार हनन का नोटिस नहीं, बल्कि समिति की जांच समर्थन प्रक्रिया का हिस्सा है — अर्थात यह केवल तथ्यों की पड़ताल के लिए है।
क्यों अहम है यह मामला?
यह विवाद सिर्फ एक स्मारक-निर्माण या खर्च का मामला नहीं है। इसमें कई अहम बातें जुड़ी हैं:
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लोकशाही-पारदर्शिता: सार्वजनिक निधियों के उपयोग, निर्माण प्रक्रिया एवं राजनीति-निर्धारित निर्णयों की पारदर्शिता पर सवाल उठ गए हैं।
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विधायी कार्यक्षेत्र की सीमा: क्या विधानसभा अपनी पिछली अवधि के कामों पर वर्तमान में कार्रवाई कर सकती है — यह संवैधानिक और विधायी सवाल है।
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ऐतिहासिक सत्य-प्रमाण: उस स्थल का क्या इतिहास था, क्या यह वास्तव में ‘फांसीघर’ था — यह नींव का सवाल है।
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राजनीतिक उपयोग: विपक्षी दल ने आरोप लगाए हैं कि इस मामले का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव के रूप में किया जा रहा है।
प्रमुख दलों की दलीलें
आम आदमी पार्टी (AAP) का पक्ष
AAP ने कहा है कि यह मामला विधानसभा के विधायी कामकाज से जुड़ा नहीं है और समिति को इस तरह की कार्रवाई करने का अधिकार नहीं। वरिष्ठ वकील शादन फरासत ने कहा है:
“फांसीघर विधानसभा के जरूरी कामकाज का हिस्सा नहीं है। यह सिर्फ राजनीतिक दबाव डालने की कोशिश है।”
वहीं उन्होंने यह भी कहा कि यह समन पुराने कार्यकाल का मामला है, जिसके खिलाफ नई सभा कार्रवाई नहीं कर सकती।
विधानसभा-सचिवालय / भाजपा का पक्ष
विधानसभा की ओर से वरिष्ठ वकील जयंत मेहता ने कहा है कि समिति की जिम्मेदारी केवल तथ्यों की जांच तक सीमित है। उन्होंने यह दलील दी कि याचिका में बहुत जल्दबाजी है।
विधानसभा ने याचिका को “भ्रमित करने वाला और तथ्यों से परे” करार दिया है।
क्या होगा आगे?
– दिल्ली हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई 24 नवंबर 2025 को तय की है।
– समिति की बैठक 13 नवंबर को होने वाली थी।
– इस प्रक्रिया के अंत में यह तय होगा कि उस स्मारक-संरचना की वास्तविकता क्या है, खर्च की जिम्मेदारी किसकी थी, और क्या विधिवत जांच-कार्रवाई होगी या नहीं।
निष्कर्ष
यह मामला दर्शाता है कि स्मारक निर्माण, सार्वजनिक खर्च, इतिहास-प्रमाण, और राजनीतिक जवाबदेही एक साथ कैसे जुड़े हैं। ‘फांसीघर’ विवाद सिर्फ एक स्थल-निर्माण का नहीं बल्कि विधि-नीति-राजनीति के परस्पर क्रिया-कलाप का उदाहरण बन गया है।
यदि समिति और कोर्ट ने निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच सुनिश्चित की, तो यह भविष्य में ऐसी घटनाओं के लिए भी मापदंड तय कर सकती है।

