परिस्थिति नहीं, मनःस्थिति बदलो, सुख-दुःख वस्तु में नहीं मन की कल्पना में है: पं. संयम शास्त्री
पर्युषण पर्व के चौथे दिन भगवान पुष्पदंत का निर्वाण कल्याणक मनाया, समयसार नाटक ग्रंथ पर हुआ स्वाध्याय
विदिशा। श्री शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में चल रहे पर्युषण पर्व के चौथे दिन भगवान पुष्पदंत का निर्वाण कल्याणक भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान के समक्ष निर्वाण लाडू अर्पित कर धर्मलाभ लिया। कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मंदिर ट्रस्ट के प्रवक्ता डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि निर्वाण कल्याणक के बाद मुंबई से आए पं. संयम शास्त्री ने समयसार नाटक ग्रंथ पर स्वाध्याय कराया।
सुख-दुःख मन की कल्पना पर निर्भर
स्वाध्याय के दौरान पं. संयम शास्त्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन अक्सर बिना मन के दुःख में बीतता रहता है, जबकि दुःख का वास्तविक आधार बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन की कल्पनाओं और भावों में होता है। एक व्यक्ति को जो वस्तु सुखद लगती है, वही दूसरे व्यक्ति को पसंद नहीं आती। इसलिए सुख और दुःख वस्तु में नहीं, बल्कि उसे देखने वाली हमारी मनःस्थिति में निहित है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को तीन प्रकार के कर्मों के विज्ञान को समझाते हुए कहा कि द्रव्यकर्म आत्मा से जुड़े सूक्ष्म पुद्गल परमाणु हैं, जो कर्मों के उदय के अनुसार जीव को विभिन्न परिस्थितियां प्रदान करते हैं। नौकर्म के अंतर्गत शरीर, घर, वाहन, धन, परिवार, मान-सम्मान और अन्य बाहरी संयोग आते हैं। वहीं भावकर्म उन भावनाओं को कहा गया है जो इन परिस्थितियों के मिलने या न मिलने पर हमारे भीतर उत्पन्न होती हैं।

भावों पर नियंत्रण ही आत्मकल्याण का मार्ग
पं. संयम शास्त्री ने कहा कि मनुष्य बाहरी परिस्थितियों या कर्मों के उदय को अपने अनुसार नहीं बदल सकता, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति अपने भावों को नियंत्रित करना उसके हाथ में है। क्रोध करना है या नहीं, राग-द्वेष में फंसना है या नहीं और परिस्थितियों से प्रभावित होना है या नहीं—यह व्यक्ति के अपने पुरुषार्थ पर निर्भर करता है।
उन्होंने पंडित बनारसीदास जी के पद “भेदी मिथ्यात सुबेदी महारस, भेद विज्ञान कला जिन पाई” का उल्लेख करते हुए भेदविज्ञान के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति आत्मा और पर पदार्थ के बीच का भेद समझ लेता है, वह बाहरी वस्तुओं के प्रति आसक्ति कम कर आत्मस्वरूप में रमण करने की दिशा में आगे बढ़ता है।
उत्तम शौच धर्म देता है संतोष का संदेश
सायंकालीन प्रवचन में उत्तम शौच धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला गया। बताया गया कि उत्तम शौच दस लक्षण धर्म का दूसरा लक्षण है और इसका संबंध केवल शरीर, वस्त्र या बाहरी स्थान की सफाई से नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शुद्धता से है।
जैन दर्शन के अनुसार लोभ को आत्मा की अशुद्धि का प्रमुख कारण माना गया है। अधिक पाने की तृष्णा, असंतोष और दूसरों के धन-वैभव के प्रति ईर्ष्या व्यक्ति को मानसिक अशांति की ओर ले जाती है। उत्तम शौच धर्म संतोष अपनाने, इच्छाओं को सीमित करने और उपलब्ध परिस्थितियों में प्रसन्न रहने का संदेश देता है। प्रवचन में श्रद्धालुओं से लोभ का त्याग कर संतोष को जीवन में अपनाने का आह्वान किया गया।

म्यूजिकल अंताक्षरी में गूंजे भजन
रात्रि में संगीतमय भक्ति के साथ म्यूजिकल अंताक्षरी का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतियोगियों ने सुंदर भजनों की प्रस्तुति दी। मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से गूंज उठा।
प्रवक्ता डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि आज रात्रि बच्चों द्वारा सुंदर नाटक की प्रस्तुति दी जाएगी। ट्रस्ट अध्यक्ष मलुकचंद जैन ने सभी श्रद्धालुओं से कार्यक्रम में शामिल होकर धर्मलाभ लेने की अपील की।
