अनूपपुर से 17 जिलों के विकास का लाइव प्रोजेक्ट शुरू, 712 विद्यार्थी करेंगे जमीनी मैपिंग
बीवॉक छात्रों ने स्थानीय संसाधनों, रोजगार और रोजमर्रा की जरूरतों का आकलन करने के लिए शुरू किया हैकाथॉन; लक्ष्य—हर हाथ को काम, हर घर स्वदेशी और हर युवा उद्यमी
मदन मोहन मिश्रा | अनूपपुर। जिले और स्थानीय अर्थव्यवस्था को विकास से जोड़ने की पहल के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक के वोकेशनल एजुकेशन विभाग में “मैराथन टेक्नोलॉजी लाइव प्रोजेक्ट हैकाथॉन” आयोजित किया गया। इसमें बीवॉक के विद्यार्थियों ने देश के 17 जिलों की अर्थव्यवस्था और स्थानीय जरूरतों की जमीनी मैपिंग का काम शुरू किया। आयोजकों के मुताबिक, इस परियोजना का उद्देश्य जिलों के संसाधनों, रोजगार की संभावनाओं और उद्यमिता के अवसरों को पहचानकर स्थानीय स्तर पर विकास की रूपरेखा तैयार करना है।
कार्यक्रम में फैकल्टी के डीन एवं विभागाध्यक्ष प्रो. विकास सिंह, सहायक प्राध्यापक डॉ. कमलेश पांडे, अनुराग सिंह, गोपेश्वर प्रजापति, अजीत कुर्रे, ओमप्रकाश पाठक, रंजन कुमार, आशीष गुप्ता, रामभाऊ कोठार, अभिनेंद्र सिंह, जगदीश और खेलन सिंह उपस्थित रहे। शोधार्थी हरीश विश्वकर्मा और विशाल ताम्रकार सहित 700 से अधिक विद्यार्थी इसमें शामिल हुए। हैकाथॉन के अंत में 17 जिलों का काम 712 छात्र-छात्राओं में बांटा गया। विभाग के सहायक प्राध्यापक टीमों का मार्गदर्शन करेंगे। आयोजकों ने बताया कि अर्थशास्त्र, तकनीक और बिजनेस मैनेजमेंट के विशेषज्ञों को भी परियोजना से जोड़ा गया है।
रोजमर्रा की जरूरतों से तलाशेंगे स्थानीय उत्पादन के अवसर
विद्यार्थियों ने जिलों के स्थानीय संसाधनों, रोजगार की स्थिति, स्वरोजगार और उद्यमिता की संभावनाओं पर चर्चा की। मैपिंग में स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक कंपनियों, प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों, बागवानी और पर्यटन से जुड़े पहलुओं को भी शामिल किया गया है। एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी एंड मैनेजमेंट, मीडिया, आर्ट एंड क्राफ्ट तथा टेक्नोलॉजी एंड सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट शाखाओं के विद्यार्थी अलग-अलग विषयों पर काम करेंगे।
परियोजना के तहत जिले की अर्थव्यवस्था और वहां उपयोग होने वाले फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स यानी रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की जरूरत का आकलन किया जाएगा। टूथब्रश, सुई-धागे, कपड़े और बर्तन धोने के सामान से लेकर घरेलू रसायन, उर्वरक, वस्त्र, सेमी-इलेक्ट्रॉनिक्स, आयुष उत्पाद और दवाइयों तक की मांग को दैनिक, साप्ताहिक और मासिक जरूरतों के आधार पर समझने की योजना है। इसके जरिए यह पता लगाया जाएगा कि किन वस्तुओं का उत्पादन स्थानीय युवा और छोटे उद्यम जिले के भीतर कर सकते हैं।
आयोजकों का कहना है कि कई जिलों में आटा, चावल, दाल, तेल, मसाले और डेयरी उत्पाद जैसी वस्तुएं बाहर से आती हैं। परियोजना के जरिए स्थानीय उत्पादन और आपूर्ति की संभावनाएं तलाशकर जिला-आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा गया है।
कारीगरों और स्थानीय समूहों को बाजार से जोड़ने की योजना
मैपिंग में रोजगार के साथ सेवा और पर्यटन क्षेत्र की संभावनाओं पर भी काम होगा। वेलनेस, होमस्टे, मालिश और एडवेंचर टूरिज्म जैसे विकल्पों का अध्ययन किया जाएगा। आयोजकों के अनुसार, जिलों की संस्कृति और विशिष्टताओं पर आधारित फिल्मों तथा वेब सीरीज के निर्माण की संभावनाएं भी तलाशी जाएंगी।
परियोजना में महिला समूहों, प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों, किसान उत्पादक कंपनियों और वनधन विकास केंद्रों को जोड़ने की योजना है। छोटे और मझोले दुकानदारों के साथ पीएम विश्वकर्मा योजना से जुड़े चर्मकार, लोहार, बढ़ई और कुम्हार जैसे कारीगर भी इसमें शामिल किए जा सकते हैं। आयोजकों ने कहा कि जिन कारीगरों को नियमित काम या बाजार नहीं मिल पाता, उन्हें स्थानीय मांग से जोड़ने की दिशा में प्रयास होगा। इस पहल का मूल मंत्र “प्रत्येक हाथ को काम और प्रत्येक काम के लिए हाथ” बताया गया है।
दैनिक जरूरतों के कारोबार में स्थानीय हिस्सेदारी पर जोर
डीन प्रो. विकास सिंह और अनुराग सिंह ने बताया कि परियोजना के लिए चुने गए 17 जिलों में प्रत्येक की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 10 से 12 हजार करोड़ रुपये के बीच है। उनके मुताबिक, इनमें से करीब 5 से 6 हजार करोड़ रुपये का कारोबार दैनिक जरूरत की वस्तुओं से जुड़ा हो सकता है। परियोजना का उद्देश्य इस मांग का आकलन करना और स्थानीय स्तर पर उत्पादन की व्यवहार्यता समझना है।
उन्होंने बताया कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के माध्यम से खाद्य और अन्य जरूरी वस्तुओं के स्थानीय उत्पादन की संभावनाएं देखी जाएंगी। प्लास्टिक पैकेजिंग पर निर्भरता कम करने और ताजा, शुद्ध तथा स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों को बढ़ावा देने के विकल्प भी अध्ययन में शामिल होंगे। सब्जी विक्रेताओं की सहकारी समितियों और कारीगरों को सीधे ग्राहकों से जोड़ने के तरीके तलाशे जाएंगे। आयोजकों के अनुसार, इससे स्थानीय उत्पादकों को बाजार तक पहुंच मिल सकती है और ग्राहकों को आसपास उपलब्ध वस्तुओं की जानकारी मिल सकेगी।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और ‘आनकिट’ ऐप का शुभारंभ
कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय के लक्ष्मण ऑडिटोरियम में विद्यार्थियों द्वारा तैयार हाइपरलोकल मार्केटप्लेस ऐप और वेबसाइट ‘आनकिट’ का शुभारंभ भी किया गया। विद्यार्थियों सचिन कुमार, सचिन लोधी, नैतिक मिश्रा और समृद्धि जैन ने इसे डॉ. अनुराग सिंह और डॉ. कमलेश कुमार पांडेय के मार्गदर्शन में विकसित किया है।
ऐप के माध्यम से ग्राहक आसपास की दुकानों को खोज सकेंगे, उत्पादों की उपलब्धता की जानकारी ले सकेंगे और दूरी तथा अपनी जरूरत के आधार पर दुकान चुन सकेंगे। स्थानीय दुकानदारों को डिजिटल पहचान और ऑनलाइन बाजार उपलब्ध कराने की इसकी परिकल्पना है।
17 जिलों से आगे विस्तार की योजना
प्रो. विकास सिंह ने इस पहल को प्रधानमंत्री के विकसित भारत संकल्प और केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह के “सहकार से समृद्धि” विजन से जोड़ते हुए कहा कि परियोजना में जिले की 50 प्रतिशत आबादी की भागीदारी का लक्ष्य रखा गया है। प्रस्तावित डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जिले के अधिकारी, पर्यटन स्थल, दुकानदार और कारीगरों को जोड़ने की योजना है, जहां उन्हें बाजार, मार्गदर्शन और क्षमता निर्माण से संबंधित सहायता मिल सके।
आयोजकों के अनुसार, “मेरा जिला, विकसित जिला” की सोच के साथ अभी 17 जिलों में काम शुरू किया गया है। परियोजना के सफल रहने पर इसे 400 जिलों तक विस्तार देने की योजना है। प्रो. सिंह ने इसे देश में अपनी तरह का पहला लाइव प्रोजेक्ट बताया। विद्यार्थियों की टीमें अब जिलों की जरूरतों और संसाधनों का आकलन कर स्थानीय रोजगार तथा उद्यमिता से जुड़ी संभावनाओं पर काम करेंगी।
