चेत्र वदी नवमी को मनाया जाए “Adi Bharatotsav”: समाजसेवी राजेश जैन दद्दू की अपील
इंदौर, राजेश जैन दद्दू
कर्म युग के प्रणेता, प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी और उनके ज्येष्ठ पुत्र, प्रथम चक्रवर्ती भरत जी के योगदान को समर्पित “Adi Bharatotsav” के रूप में पूरे देश में चेत्र वदी नवमी को मनाने की मांग उठाई गई है।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू के अनुसार, भारत देश का नाम भरत जी के नाम से पड़ा। यह नामकरण प्राचीन काल से ही प्रचलित है और महाभारत या शकुंतला पुत्र भरत की कथा से कोई संबंध नहीं है।
श्रीमती पुष्पा पांड्या ने इस मांग को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राज्यों के राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर निवेदन किया है। उन्होंने कहा कि भगवान ऋषभदेव जी और भरत चक्रवर्ती ने छः कर्मों की शिक्षा और ७२ कलाओं के माध्यम से जीवन जीने की कला सिखाई।
भरत जी का जन्म भी अयोध्या नगरी में हुआ और यह दिन चेत्र वदी नवमी है, जो इस वर्ष 12 मार्च 2026 को पड़ रहा है। इस दिन को पूरे भारत में भारतोत्सव या भारत दिवस के रूप में मनाना चाहिए।
भारतवर्ष का नामकरण और ऐतिहासिक तथ्य
भारतवर्ष का नामकरण भरत चक्रवर्ती के नाम पर हुआ। इससे पहले इसे अजनाभ वर्ष कहा जाता था, जो ऋषभदेव जी के पिता और भरत जी के दादा राजा नाभिराय से संबंधित था।
श्रीमती पांड्या ने कहा कि भारत का नाम केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक प्राचीनता और गौरव का प्रतीक है। भारत की यह संस्कृति विश्व को अहिंसा, प्रेम, करुणा, नैतिकता, सह-अस्तित्व और शांति का संदेश देती रही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि महाभारत काल के शकुंतला पुत्र भरत की कहानी देश के नामकरण से संबंधित नहीं है। इस तथ्य को पाठ्य पुस्तकों में भी सही रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि भविष्य की पीढ़ियों को सही जानकारी मिले।
कार्यक्रम और शैक्षिक पहल
सार्वजनिक और शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से “आदि भरतोत्सव” को पूरे देश में मान्यता दिलाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए गए हैं:
- कार्यक्रम आयोजित करना: भरत जी और ऋषभदेव जी के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा आयोजित की जाए। इससे समाज को उनके आदर्श और शिक्षाओं से जोड़ने का अवसर मिलेगा।
- शैक्षणिक समावेश: उनके जीवन पर आधारित पाठ्यक्रम और शिक्षण सामग्री पाठ्यपुस्तकों में शामिल की जाए। इससे बच्चों और युवाओं को उनके योगदान की सही जानकारी मिलेगी।
- प्रतिमा स्थापना: भरत चक्रवर्ती जी की विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा अयोध्या में स्थापित की जाए। यह न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगी बल्कि पर्यटन और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी बढ़ावा देगी।
- मांसाहारी खाद्य पर पाबंदी: इस दिन पशु वध, मांस विक्रय केंद्र, होटल्स, ढाबे, रेल और हवाई यात्रा में मांसाहारी व्यंजनों पर प्रतिबंध लगाया जाए। यह पारंपरिक अहिंसक संस्कृति के सम्मान के लिए जरूरी है।
समाज और राष्ट्र पर प्रभाव
राजेश जैन दद्दू ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य केवल उत्सव मनाना नहीं है, बल्कि देशवासियों को सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक सच्चाई से जोड़ना है।
भरत और ऋषभदेव जी की शिक्षा और जीवन दर्शन ने दुनिया को यह सिखाया कि सांस्कृतिक मूल्य, नैतिकता और अहिंसा किसी भी समाज की नींव हैं। भारत का इतिहास और संस्कृति हमें यह याद दिलाती है कि हमारी सभ्यता हजारों साल पुरानी है और हमें इसे संरक्षित करना चाहिए।
इस अभियान के माध्यम से समाज में शांति, सहअस्तित्व और नैतिक शिक्षा को फैलाने का प्रयास किया जा रहा है। यह उत्सव सभी वर्गों, धर्मों और समुदायों को जोड़ने वाला अवसर होगा।
राष्ट्रीय समर्थन
इस मुहिम का समर्थन निम्नलिखित प्रमुख संस्थाओं और व्यक्तियों द्वारा किया गया है:
- दिगंबर जैन महासमिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनींद्र जैन
- अखिल भारतीय दिगंबर जैन महिला परिषद की अध्यक्ष निर्मला जैन
- अखिल भारतीय दिगंबर जैन महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शेखर छाबड़ा
- महावीर ट्रस्ट अध्यक्ष अमित कासलीवाल
- वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन, हंसमुख गांधी, टीके वेद, नरेंद्र वेद, मंयक जैन, मंजू अजमेरा
- राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष महासमिति, फेडरेशन की शिरोमणि संरक्षक पुष्पा कासलीवाल, बरखा बडजात्या
- राष्ट्रीय प्रबुध मंच, विजया पहाड़िया, पुष्पा कटारिया, इंद्रा अजमेरा, मीना गोदरे, अनिता बडजात्या, पलासिया महिला मंडल की अध्यक्ष सुमन जैन, रेखा जैन, मुक्ता जैन
इन सभी संस्थाओं और व्यक्तियों ने देश भर में हस्ताक्षर अभियान और ईमेल अभियान चला कर “आदि भरतोत्सव” के रूप में चेत्र वदी नवमी को राष्ट्रीय पर्व बनाने की मांग की है।
निष्कर्ष
““Adi Bharatotsav” का उद्देश्य है देशवासियों को उनके सांस्कृतिक गौरव और ऐतिहासिक सच्चाई से जोड़ना। यह पर्व न केवल इतिहास की याद दिलाएगा, बल्कि अहिंसा, नैतिकता और करुणा के संदेश को भी समाज में फैलाएगा।
इस पहल के माध्यम से बच्चों और युवाओं को जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी और भरत चक्रवर्ती के जीवन से प्रेरणा मिलेगी। यह पर्व सभी वर्गों और समुदायों को जोड़ते हुए राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करेगा।
इस प्रकार, ““Adi Bharatotsav” को देशभर में मान्यता दिलाने का प्रयास, भारत की सांस्कृतिक विरासत और गौरव को संजोने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
