आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने ऋषभोदय जैन मंदिर में आत्मकल्याण, संयम, सत्य, अहिंसा और ईर्ष्या से बचने का संदेश दिया। जानिए उनके 5 प्रेरक जीवन सूत्र।
आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज का प्रेरक संदेश: 5 जीवन सूत्र, जो बदल सकते हैं सोच और जीवन
रिपोर्ट: राजेश जैन दद्दू
दिल्ली/इंदौर।
आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने ऋषभोदय जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण, संयम, सत्य, अहिंसा और सकारात्मक जीवन का महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में सुखद अनुभूति प्राप्त करनी है तो सबसे पहले दूसरों की गलतियां देखने के बजाय स्वयं को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
पहले स्वयं का कल्याण करो
आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि दूसरों की गलती देखने और उनके सुधार में अपना अमूल्य समय व्यतीत करने से पहले व्यक्ति को स्वयं के जीवन को देखना चाहिए। उन्होंने संदेश दिया कि “पहले स्वयं का कल्याण करो, फिर दूसरों का सोचो।”
गुरुदेव ने समझाया कि यदि व्यक्ति अपने भीतर के दोषों, कषायों और नकारात्मक भावों को दूर करने का प्रयास करे तो जीवन में वास्तविक शांति और सुख की अनुभूति प्राप्त हो सकती है।
उन्होंने कहा कि शास्त्र बहुत हैं, विद्याएं अनंत हैं, लेकिन मनुष्य की शक्ति और सामर्थ्य सीमित है तथा आयु भी थोड़ी है। इसलिए गुरु-उपदेश और आगम पारायण के माध्यम से इतना समझ लेना चाहिए कि मैं भिन्न हूं और मेरे भिन्न हैं।
आत्मा का स्वभाव परभावों से अत्यंत भिन्न है। इसी आत्मस्वरूप को समझना और उसकी ओर आगे बढ़ना जीवन की वास्तविक साधना है।
गुरु-वचन और संयम ही जीवन का सार
“क्या सार?” इस प्रश्न का उत्तर देते हुए आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि गुरु-वचन ही सार है। संयम-साधना ही जीवन का सार है। सत्य, अहिंसा, दया और करुणा को जीवन में उतारना ही वास्तविक धर्म है।
जैन दर्शन में अहिंसा को अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत माना गया है। जैन परंपरा में अहिंसा केवल किसी जीव को शारीरिक नुकसान न पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि विचार, वाणी और व्यवहार में भी संयम रखने की प्रेरणा देती है।
जैन धर्म और उसके मूल सिद्धांतों को समझने के लिए पाठक जैन धर्म के मूल सिद्धांत और दिगम्बर जैन समाज से जुड़ी खबरें भी पढ़ सकते हैं।
“जलो मत, जलाओ मत”
धर्मसभा में आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने ईर्ष्या और दूसरों की सफलता से होने वाली जलन से बचने का संदेश दिया।उन्होंने कहा कि दूसरों की उन्नति और सफलता देखकर जलना नहीं चाहिए। ईर्ष्या करने के बजाय व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए।गुरुदेव ने जीवन का सुंदर सूत्र दिया—“जलो मत, जलाओ मत, दीप की तरह जलो।”अर्थात स्वयं प्रकाशमान बनो और अपने ज्ञान, सद्भाव तथा अच्छे कर्मों से दूसरों के जीवन में भी प्रकाश फैलाओ।
क्या सुन्दर? क्या असुन्दर?
आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने समझाया कि वस्तु जैसी है, वैसी ही है। कोई वस्तु अपने आप में सुन्दर या असुन्दर नहीं होती। व्यक्ति का राग और लगाव ही उसे किसी वस्तु या व्यक्ति को श्रेष्ठ मानने के लिए प्रेरित करता है।जिस वस्तु या व्यक्ति से हमारी प्रीति होती है, उसमें हमें विशेषता दिखाई देती है। इसलिए बाहरी आकर्षण के बजाय वस्तु और जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझने की आवश्यकता है।
क्या अमृत? क्या जहर?
गुरुदेव ने कहा कि कषाय परिणति, कषायपूर्ण भाव, वासना, क्रूर परिणाम, ईर्ष्या और कलह ही जीवन के विष हैं।इसके विपरीत विशुद्ध भाव, आत्मविशुद्धि, संयम और वीतराग परिणति ही अमृत हैं। विनय, विवेक, परोपकार और गुरु-वचन को भी उन्होंने अमृत के समान बताया।आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज की यह सीख वर्तमान समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है, जब मनुष्य छोटी-छोटी बातों को लेकर तनाव, प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या का शिकार हो जाता है।
“शनैः पंथः, शनैः शनैः”
जीवन में सफलता के लिए धैर्य का महत्व समझाते हुए गुरुदेव ने कहा—“शनैः पंथः, शनैः शनैः।”उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक-एक कदम बढ़ाते-बढ़ाते पथिक मंजिल तक पहुंच जाता है और एक-एक पृष्ठ पढ़ते-पढ़ते पूरा ग्रंथ समाप्त हो जाता है।इसलिए जीवन में किसी भी कार्य को लेकर जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। धैर्यपूर्वक प्रयास करते रहना चाहिए। गुरुदेव का संदेश है—बढ़ते चलो, रुको मत, थको मत।
धर्मसभा में उमड़ा श्रद्धालुओं का उत्साह
ऋषभोदय जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज के मंगल प्रवचन को श्रद्धापूर्वक सुना और उनके संदेशों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।गुरुदेव के प्रवचन का मूल संदेश आत्मचिंतन, संयम, सत्य, अहिंसा, दया, करुणा, परोपकार और सकारात्मक जीवन की ओर बढ़ना रहा।
“पहले स्वयं का कल्याण करो, फिर दूसरों का सोचो।”
“जलो मत, जलाओ मत, दीप की तरह जलो।”
“संयम-साधना, सत्य-अहिंसा ही जीवन का सार है।”
यही संदेश धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बना।
देशनाचार्य: दिगम्बर जैन संत आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज
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