चंपाबाग जैन मंदिर में उत्तम त्याग धर्म की आराधना, पंचामृत अभिषेक और शांतिधारा हुई
पर्युषण महापर्व के आठवें दिन श्रद्धालुओं ने पूजन कर अर्घ्य समर्पित किए; गुरुवार को होगी उत्तम आकिंचन धर्म की आराधना
ग्वालियर। पर्युषण महापर्व के आठवें दिन बुधवार को दाना ओली स्थित दिगंबर बीसपंथी चंपाबाग जैन मंदिर में उत्तम त्याग धर्म की आराधना की गई। आत्म साधना वर्षायोग समिति और सकल जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज एवं मुनिश्री अनुमान सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में संपन्न हुआ। जैन समाज के महिला, पुरुष, बालिकाओं और त्यागी-व्रती श्रद्धालुओं ने भगवान जिनेंद्र का अभिषेक कर पूजन में भाग लिया। गुरुवार, 24 सितंबर को पर्युषण के नौवें दिन उत्तम आकिंचन धर्म की आराधना की जाएगी।
108 मंत्रों के साथ हुआ पंचामृत अभिषेक
जैन समाज के प्रवक्ता सचिन जैन ने बताया कि प्रतिष्ठाचार्य पंडित डॉ. आनंद प्रकाश शास्त्री के निर्देशन में श्रद्धालुओं ने 108 मंत्रों के उच्चारण के साथ भगवान जिनेंद्र का पंचामृत अभिषेक किया। मंदिर परिसर में जयकारों के बीच कलशों से अभिषेक किया गया। इसके बाद आचार्य श्री के सानिध्य में मंत्रोच्चार के साथ श्रीजी की बृहद शांतिधारा हुई।
अभिषेक और शांतिधारा के बाद दशलक्षण पूजन आरंभ हुई। श्रद्धालुओं ने पंचमेरू पूजा, नवदेवता पूजा और सोलह कारण पूजा के साथ उत्तम त्याग धर्म की आराधना की। अष्ट द्रव्य से पूजन करते हुए भगवान जिनेंद्र के समक्ष महाअर्घ्य समर्पित किए गए। संगीतमय भक्ति और नृत्य के साथ श्रद्धालुओं ने आयोजन में सहभागिता की। दस दिनों तक व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को आचार्य श्री ने जाप भी कराया।
त्याग के बाद अभिमान और आसक्ति न रखें: आचार्य चैत्य सागर
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री चैत्य सागर महाराज ने कहा कि त्याग का संस्कार प्रकृति से भी मिलता है। लौकिक जीवन हो या धार्मिक जीवन, त्याग के बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बाजार से कोई वस्तु लेने के लिए भी धन, समय और श्रम लगाना पड़ता है। इसी तरह आत्मिक निर्मलता के लिए त्याग आवश्यक है।
आचार्य श्री ने कहा कि त्याग करने से पहले मान का त्याग करना चाहिए। किसी वस्तु को छोड़ देने के बाद उसके प्रति अभिमान या आसक्ति बनी रहे, तो त्याग का उद्देश्य पूरा नहीं होता। उन्होंने श्रद्धालुओं को त्याग धर्म सुनकर अपने जीवन में कुछ न कुछ छोड़ने का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया। आचार्य श्री ने कहा, “त्याग में सुख है, राग में दुःख है।” उनके अनुसार त्याग आत्मा को निर्मल बनाता है और जीवन में सुख का मार्ग खोलता है।
धर्मसभा के दौरान समिति के अध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र गंगवाल, सचिव निर्मल पाटनी, विकास गंगवाल, विनय कासलीवाल, पंकज छाबड़ा और संजय गोधा सहित अन्य सदस्यों ने आचार्य श्री के चरणों में श्रीफल समर्पित किया।
कषायों को छोड़ना भी उत्तम त्याग: मुनिश्री अनुमान सागर
मुनिश्री अनुमान सागर महाराज ने कहा कि त्याग केवल वस्तुओं को छोड़ने तक सीमित नहीं है। सांसारिक सुख-सुविधाओं को भोगने की अनावश्यक इच्छा से बचना और आवश्यकता से अधिक वस्तुओं तथा धन का संग्रह न करना भी त्याग धर्म का हिस्सा है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपनी आवश्यकताओं पर विचार करने और अनावश्यक संग्रह से दूर रहने का आह्वान किया।
मुनिश्री ने कहा कि क्रोध आदि कषायों का त्याग करना भी उत्तम त्याग धर्म है। अच्छे कर्म और संयम व्यक्ति के चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं। धर्मसभा में मौजूद श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री और मुनिश्री के प्रवचन सुने तथा पूजन-अर्चना के माध्यम से उत्तम त्याग धर्म की आराधना की।
