विदिशा के शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में मनाया उत्तम त्याग धर्म, ‘जीवन यात्रा’ नाटिका ने दिया भक्ति और आत्मचिंतन का संदेश
विदिशा। श्री शीतलनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर में चल रहे पर्युषण पर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म मनाया गया। इस अवसर पर धार्मिक स्वाध्याय और प्रवचन के साथ बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। रात्रि में मंचित लघु नृत्य नाटिका ‘जीवन यात्रा’ ने उपस्थित लोगों को बचपन से बुढ़ापे तक के जीवन सफर पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
मंदिर ट्रस्ट के प्रवक्ता डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि पर्व के दौरान प्रतिदिन रात्रि में बच्चे सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दे रहे हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य मनोरंजन के साथ धर्म के विचारों को सरल तरीके से समझाना है। ‘जीवन यात्रा’ में जीवन के अलग-अलग पड़ावों को रेलगाड़ी की यात्रा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। नाटिका के जरिए भक्ति और धर्म के महत्व को रोचक ढंग से सामने रखा गया।
रेलगाड़ी की यात्रा से समझाए जीवन के पड़ाव
‘जीवन यात्रा’ लघु नाटिका में बचपन से बुढ़ापे तक के सफर को रेलगाड़ी की यात्रा की तरह दिखाया गया। प्रस्तुति ने दर्शकों को यह सोचने का अवसर दिया कि जीवन आगे बढ़ने के साथ व्यक्ति की प्राथमिकताएं कैसे बदलती हैं और इस यात्रा में धर्म तथा भक्ति का क्या स्थान है। बच्चों की प्रस्तुति को उपस्थित समाजजनों ने सराहा।
डॉ. जैन के अनुसार, प्रतिदिन होने वाले ऐसे कार्यक्रमों से बच्चों को मंच पर अपनी बात रखने का अवसर मिल रहा है। साथ ही, दर्शकों तक धार्मिक विषय सहज भाषा और अभिनय के माध्यम से पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि अगली रात्रि में ‘धर्म के धुरंधर’ नामक ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। ट्रस्ट अध्यक्ष ने समाजजनों से अधिक संख्या में कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है।
भेद-विज्ञान को बताया आत्मचिंतन की प्रक्रिया
पंडित संयम शास्त्री ने समयसार नाटक ग्रंथ पर चल रहे स्वाध्याय में भेद-विज्ञान पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि भेद-विज्ञान केवल सुनने या याद कर लेने का विषय नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसके लिए व्यक्ति को अपनी दृष्टि बाहर की दुनिया से हटाकर अपने भावों और विचारों पर भी डालनी होगी।
स्वाध्याय के दौरान उन्होंने कहा कि मनुष्य को अक्सर इस बात की चिंता रहती है कि दुनिया उसे किस नजर से देख रही है। उन्होंने धर्म, कर्म और स्वयं के प्रति सजग रहने पर जोर देते हुए कहा कि व्यक्ति दूसरों के सामने अपनी वास्तविक स्थिति छिपा सकता है, लेकिन अपने भीतर उठने वाले भावों से अनजान नहीं रह सकता। उनके अनुसार, आत्मचिंतन की शुरुआत इसी ईमानदारी से होती है।
पंडित शास्त्री ने समझाया कि भेद-विज्ञान में आत्मा और बाहरी पदार्थों के बीच अंतर को समझने का अभ्यास किया जाता है। उन्होंने कहा कि ज्ञानी जिस प्रकार अपने स्वरूप और पर पदार्थों के संबंध पर विचार करते हैं, साधक को भी उस दृष्टि को समझने का प्रयास करना चाहिए। केवल शास्त्र पढ़ना पर्याप्त नहीं है; उसमें कही गई बातों को अपने जीवन और व्यवहार के संदर्भ में देखना भी जरूरी है।
‘शास्त्र आईना देखने के लिए हैं’
पंडित संयम शास्त्री ने कहा कि शास्त्रों के प्रसंगों को केवल कहानी मानकर नहीं सुनना चाहिए। वे व्यक्ति को अपने विचारों और आचरण पर ध्यान देने का अवसर देते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने सती अंजना के जीवन का उल्लेख किया। उनके अनुसार, ऐसे प्रसंग पढ़ते या सुनते समय व्यक्ति को अपने जीवन की परिस्थितियों और प्रतिक्रियाओं पर भी विचार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बाहरी परिस्थितियों में ही सुख खोजते रहने से मन में अस्थिरता बनी रहती है। भेद-विज्ञान का अभ्यास व्यक्ति को यह देखने की प्रेरणा देता है कि उसका लगाव किन चीजों से है और वह अपने भीतर की स्थिति को कितना समझ पा रहा है।
त्याग में ‘मैंने छोड़ा’ का अहंकार भी बाधा
सायंकालीन प्रवचन में पंडित संयम शास्त्री ने उत्तम त्याग धर्म पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि त्याग करने से पहले यह विचार करना आवश्यक है कि क्या वस्तु छोड़ी जा रही है और उसे छोड़ने के बाद मन में कैसी भावना है। यदि व्यक्ति लगातार यह सोचता रहे कि ‘मैंने त्याग किया है’, तो उसके साथ अहंकार जुड़ सकता है। उनके अनुसार, त्याग का वास्तविक अभ्यास ममत्व कम करने से शुरू होता है।
उन्होंने बाहरी और आंतरिक त्याग का अंतर समझाते हुए कहा कि धन या किसी वस्तु का त्याग लोगों को दिखाई दे सकता है, लेकिन मान और राग-द्वेष को छोड़ने का प्रयास भीतर चलता है। कोई निंदा करे और उस समय भी व्यक्ति अपने मन की प्रतिक्रिया को देख सके, यह आंतरिक साधना की कठिन परीक्षा है। पंडित शास्त्री ने कहा कि उत्तम त्याग धर्म व्यक्ति को बाहरी वस्तुओं के साथ उनके प्रति अपने लगाव पर भी विचार करने की प्रेरणा देता है।
डॉ. मक्खन लाल जैन ने बताया कि पर्युषण पर्व के अंतर्गत मंदिर में धार्मिक स्वाध्याय, प्रवचन और बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम जारी हैं। उन्होंने समाजजनों से आगामी कार्यक्रमों में भाग लेकर धर्मचर्चा तथा बच्चों की प्रस्तुतियों का लाभ लेने का आह्वान किया।
