*ज्ञान शोधक है, तप शोधक है, तप के बिना तीर्थंकर भी मुक्ति नहीं पाते : पट्टाचार्य विशुद्धसागर जी*
*मध्यमोदय, दिल्ली | 22 सितंबर 2026*
राजेश जैन दद्दू
पर्वराज *पर्युषण महापर्व* पर उत्तम तप धर्म के अवसर पर दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के उन्नायक *पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव* ने कहा – धर्म सत्य है, हितकर है, शांतिप्रद है।
*ज्ञान शोधक, तप शोधक -*
गुरुदेव ने कहा – ज्ञान शोधक है, जो हित-अहित का बोध कराता है और तप शोधक है, जो कर्मों को हर कर आत्मा को शुद्ध करता है। शोध के लिए बोध आवश्यक है। ज्ञान-विहीन तप निरर्थक है और केवल शून्य ज्ञान भी व्यर्थ है। तप मुक्ति का साधन है, सिद्धि एवं समृद्धि के लिए परमोपकारी है। तप से संवर और निर्जरा दोनों होते हैं।
*तप सिद्धि का साधन -*
सिद्धि चाहिए तो तप करो। दूध को तपाने से घृत प्राप्त होता है, देह को तप से तपाने पर आत्म-सिद्धि प्राप्त होती है। यदि प्रसिद्धि भी चाहिए तो प्रसिद्धि मत चाहो, तप करो, सिद्धि प्राप्त करो, प्रसिद्धि स्वतः मिलेगी। संयम सिद्धि, राग क्षय, कर्म क्षय, ध्यान सिद्धि और आगम आलोचन के लिए तप ही साधन है।
*तपस्वी सर्वत्र वंदनीय -*
मन और इंद्रियों के निरोध तथा उपवास आदि से शरीर को कृश करना तप है। कर्मों के उच्छेद के लिए श्रम करना ही तप है। तप करने वाले तपस्वी सर्वत्र पूजे जाते हैं। तपस्वी का कोई सम्प्रदाय नहीं होता, वह निर्वन्धनीय होता है। जैसे गंगा का नीर सभी की प्यास बुझाता है, वैसे ही तपस्वी जन-जन के हितकारी होते हैं।
*“जो गुरु चरण जहाँ धरें, तहाँ-तहाँ तीरथ होय”*
तप के समान आत्मा का हितकारी दूसरा कोई नहीं। जैसे अग्नि में तपाने पर स्वर्ण शुद्ध होता है, वैसे ही तपस्या से आत्म-शुद्धि होती है। जिससे परिणाम मंद हों, भाव विशुद्ध हों, ज्ञान निर्मल हो, वही तप है। ऐसे तपस्वी जहाँ चरण रखते हैं, वहीं तीर्थ बन जाता है।
*तप के 12 भेद -*
गुरुदेव ने बताया – तप दो प्रकार के हैं। *छह बाह्य तप* – अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रस-परित्याग, विविक्त-शय्यासन और काय-क्लेश। *छह अंतरंग तप* – प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान। जैसे जल से मलिन वस्त्र स्वच्छ होता है, वैसे ही तप से आत्मा शुद्ध होती है।
*तप करो, जप करो, कर्म हरो -*
नर तन मिला है तो तप करो, कर्मों का क्षय करो। तप करते हुए यौवन भी क्षय हो गया तो समझो कुछ नहीं गया, क्योंकि तपस्वी ऋद्धि सम्पन्न देवत्व अथवा सिद्धत्व को प्राप्त करता है। तप करो, प्रभु नाम जपो, कर्म हरो, मुक्ति प्राप्त करो। तप के बिना तीर्थंकर भी मुक्ति प्राप्त नहीं करते।
*प्रेषक – राजेश जैन दद्दू, मीडिया प्रभारी*
