ऊंचा उठने के लिए झुकना सीखें, विनम्रता महानता की सीढ़ी है: मुनि सुधासागर जी
महाराज जी ने कहा कि व्यक्ति जब कुछ बनने की इच्छा करता है, तब उसे अपने विचारों के प्रति सबसे अधिक सावधान रहना चाहिए। दूसरों से तुलना करने पर मन में हीनता, असंतोष और अहंकार जन्म लेते हैं। दूसरों को पीछे छोड़ने या छोटा समझने की भावना व्यक्ति के पतन का कारण बनती है। जीवन में आगे बढ़ने की इच्छा के साथ विनम्रता बनाए रखना भी आवश्यक है।
अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने बीज का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि बीज को वृक्ष बनने से पहले मिट्टी के अंधकार में जाना और नीचे दबना पड़ता है। इसके बाद ही वह बढ़ता है और आकाश की ऊंचाई छूता है। इसी तरह व्यक्ति को बड़ा बनने से पहले झुकना सीखना चाहिए। उन्होंने कहा, “जो बड़े लोगों से नीचे रहना सीखता है, वही एक दिन बड़ा बनता है।” इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने धैर्य रखने और दूसरों से सीखने का संदेश दिया।
प्रवचन में महाराज जी ने आराम और सुख के बीच का अंतर भी समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य रोटी, पानी, धन, मकान और वाहन जैसी वस्तुओं में सुख खोजता है। ये वस्तुएं जीवन में आराम दे सकती हैं, लेकिन इन पर निर्भर रहने वाला सुख स्थायी नहीं है। कोई वस्तु चली जाए तो उससे मिलने वाला आराम भी समाप्त हो जाता है। इसलिए वास्तविक सुख को केवल बाहरी साधनों में खोजना उचित नहीं है।
महाराज जी ने कहा, “तुम्हें सुखी बनना नहीं है, तुम सुखी हो।” उन्होंने अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचानने और “मैं शुद्ध हूं, मैं ज्ञायक स्वरूप हूं” की भावना करने का संदेश दिया। उनके अनुसार वास्तविक आनंद व्यक्ति के भीतर है। बाहरी सुविधाएं बदल सकती हैं, लेकिन आत्मस्वरूप को समझने की दिशा में किया गया चिंतन व्यक्ति को अपने भीतर देखने की प्रेरणा देता है।
तीर्थंकर के प्रति श्रद्धा का अर्थ समझाते हुए महाराज जी ने कहा कि भगवान की वंदना उनके वैभव के लिए नहीं, बल्कि उनके बताए मोक्षमार्ग पर चलने के लिए होनी चाहिए। तीर्थंकर के पास क्या है, इसके बजाय वे क्या कह रहे हैं, इस पर ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने समवशरण के वैभव में उलझने के बजाय तीर्थंकर के उपदेश को जीवन में अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवान का बाहरी स्वरूप इंद्रियों से दिखाई देता है, लेकिन अर्हंत स्वरूप को समझने के लिए आगम की दृष्टि चाहिए।
गुरु और साधु के महत्व पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि साधु का संग जीवन को बनाता है और गुरु का मार्गदर्शन जीवन को बदलता है। इसलिए साधु के प्रति श्रद्धा और गुरु के प्रति आज्ञापालन होना चाहिए। उन्होंने गुरु के बताए मार्ग पर चलने पर जोर दिया। महाराज जी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सबसे पहले स्वयं से पूछना चाहिए, “मैं कौन हूं?” जब व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तभी आत्मज्ञान की खोज शुरू होती है।
उन्होंने कहा कि धर्म का लक्ष्य बाहरी पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करना नहीं, बल्कि सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र के माध्यम से आत्मकल्याण करना है। प्रवचन में उन्होंने विनम्रता को अहंकार से बचने, आत्मचिंतन को स्वयं को समझने और गुरु के मार्गदर्शन को जीवन में अपनाने से जोड़ा।
धर्मसभा में चक्रवर्ती सपना मनीष गोधा, अध्यक्ष नवीन आनंद गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, हुकुम काका, विजय धुर्रा, ब्रह्मचारी प्रदीप भैया और पारस भैया सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम की जानकारी प्रचार प्रमुख राजेश जैन दद्दू ने दी।
