ललित सरावगी जैन ने दशलक्षण पर्व में तपस्या और पारणा के बाद उपहार व लेन-देन की बढ़ती अपेक्षाओं पर सवाल उठाते हुए सादगीपूर्ण तपस्वी सम्मान और आत्ममंथन की अपील की है।
क्या त्याग भी बनता जा रहा दिखावे और लेन-देन की परंपरा? ललित सरावगी जैन ने उठाया सवाल
दशलक्षण पर्व की तपस्या के बाद उपहार और ‘मायरा’ की परंपरा पर चिंतन की अपील, कहा—तपस्वी का वास्तविक सम्मान उसके संयम से प्रेरणा लेना
विशेष आलेख। जैन धर्म में त्याग, तप, संयम और आत्मशुद्धि का विशेष महत्व है। दशलक्षण पर्व के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपवास और विभिन्न प्रकार की तपस्या कर आत्मसंयम की साधना करते हैं। कई श्रद्धालु लगातार कई दिनों तक अन्न का त्याग कर तपस्या करते हैं। इस साधना में युवाओं के साथ बच्चे भी उत्साह और श्रद्धा से भाग लेते हैं।
इसी त्याग और तपस्या के बाद होने वाले सम्मान और उपहार की परंपराओं को लेकर ‘वाह ज़िन्दगी’ के ललित सरावगी जैन ने समाज के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखा है—क्या हमने त्याग को भी दिखावे और लेन-देन की परंपरा बना दिया है?
तपस्या के बाद उपहार की अपेक्षा क्यों?
ललित सरावगी जैन के अनुसार, पारणा के बाद तपस्या करने वाले व्यक्ति को उपहार देकर सम्मानित करने की परंपरा कई स्थानों पर देखने को मिलती है। यदि यह स्वेच्छा और स्नेह तक सीमित रहे तो इसे पारिवारिक प्रेम और श्रद्धा की अभिव्यक्ति माना जा सकता है।
लेकिन उनका कहना है कि कुछ स्थानों पर यह परंपरा धीरे-धीरे ‘मायरा’ और सामाजिक अपेक्षाओं का रूप ले रही है। माता-पिता, सास-ससुर, जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी और परिवार के अन्य सदस्यों से लिफाफे, फल, मिठाइयां और यहां तक कि आभूषण देने की अपेक्षा किए जाने की बातें भी सामने आती हैं।
वे सवाल उठाते हैं कि जिस तपस्या का मूल उद्देश्य इच्छाओं और भोग का त्याग है, उसके पूर्ण होने के बाद यदि उपहार और सामाजिक प्रतिष्ठा की अपेक्षाएं जुड़ जाएं तो क्या यह त्याग की मूल भावना के अनुरूप है?
“त्याग सम्मान का विषय है तो लेन-देन क्यों?”
आलेख में ललित सरावगी जैन ने समाज से आत्ममंथन करने की अपील करते हुए कहा है कि तपस्या यदि आत्मशुद्धि का माध्यम है तो उसके बाद दिखावे की होड़ नहीं होनी चाहिए। त्याग को प्रतिष्ठा और प्रदर्शन की प्रतियोगिता बनाने के बजाय उसकी आध्यात्मिक भावना को समझना आवश्यक है।
उनके अनुसार, उपवास और तपस्या करने वाले व्यक्ति का सबसे बड़ा सम्मान महंगे उपहार देना नहीं, बल्कि उसके तप, संयम और साधना को सच्चे मन से नमन करना हो सकता है।
सम्मान के लिए दिए कई सकारात्मक विकल्प
ललित सरावगी जैन ने तपस्वियों के सम्मान के लिए सादगीपूर्ण और समाजोपयोगी विकल्प भी सुझाए हैं। उनके अनुसार सामूहिक प्रार्थना या नवकार मंत्र का जाप कर तपस्वी के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जा सकती है।
तपस्वी को परिवार अथवा समाज की ओर से सादगीपूर्ण सम्मान-पत्र दिया जा सकता है। उनके नाम से पौधारोपण, जरूरतमंद लोगों को भोजन, शिक्षा में सहायता या अन्य सेवा कार्य किए जा सकते हैं।
उनका मानना है कि तपस्वी की साधना से प्रेरणा लेकर स्वयं संयम, स्वाध्याय अथवा सेवा का संकल्प लेना भी उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने का सार्थक तरीका हो सकता है।
समाज के सामने छोड़ा सवाल
आलेख के माध्यम से ललित सरावगी जैन ने जैन समाज से इस परंपरा के स्वरूप पर खुले मन से विचार करने की अपील की है। उन्होंने सवाल किया है कि क्या स्नेह और सम्मान को किसी आर्थिक अपेक्षा या लेन-देन के बिना व्यक्त नहीं किया जा सकता?
उनका संदेश है कि समय के साथ सामाजिक परंपराओं में बदलाव संभव है, लेकिन त्याग, संयम और तपस्या की मूल भावना को प्रदर्शन और आर्थिक अपेक्षाओं से दूर रखना जरूरी है।
— ललित सरावगी जैन
वाह ज़िन्दगी, कोलकाता
