उत्तम संयम जीवन की गाड़ी का ब्रेक है: आचार्यश्री उदारसागरजी
मुरैना के बड़ा जैन मंदिर में दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन धर्मसभा; मुनिश्री उपशांतसागरजी ने गृहस्थ जीवन में आत्मानुशासन का महत्व बताया
संवाददाता: मनोज जैन नायक
मुरैना। दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने उत्तम संयम धर्म की व्याख्या की। उन्होंने जीवन की तुलना एक वाहन से करते हुए कहा कि जिस तरह बिना ब्रेक की गाड़ी सुरक्षित ढंग से मंजिल तक नहीं पहुंच सकती, उसी तरह संयम के बिना मनुष्य अपने जीवन को सही दिशा नहीं दे सकता।
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य का जीवन अनमोल है। इसकी सार्थकता तभी है, जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, इंद्रियों और विकारों पर नियंत्रण रखना सीखे। उनके अनुसार, संयम का अर्थ केवल स्वयं को रोकना नहीं है। संयम व्यक्ति को सोच-समझकर निर्णय लेने और सही दिशा में आगे बढ़ने की सीख देता है।
‘संयम बताता है कि कहां रुकना है’
धर्मसभा में आचार्यश्री ने कहा कि तेज गति से चलती गाड़ी को नियंत्रित करने के लिए ब्रेक आवश्यक होता है। चालक को पता होना चाहिए कि रास्ते में कब रुकना है और गति कब कम करनी है। उन्होंने इसी उदाहरण से जीवन में संयम की आवश्यकता समझाई।
आचार्यश्री के अनुसार, इच्छाओं और वासनाओं में बहने वाला व्यक्ति कई बार यह नहीं समझ पाता कि उसे किस बिंदु पर रुकना चाहिए। संयम उसे ठहरकर विचार करने का अवसर देता है। यही विचार उसे अपने व्यवहार और फैसलों को परखने में मदद करता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में धन, ज्ञान या प्रतिष्ठा होने के बावजूद आत्मानुशासन का महत्व कम नहीं होता। यदि व्यक्ति अपने क्रोध, लोभ और अहंकार पर ध्यान नहीं देता, तो उसका प्रभाव उसके संबंधों और व्यवहार पर पड़ सकता है।
ट्रैफिक नियमों से समझाया अनुशासन का महत्व
आचार्यश्री ने सड़क पर वाहन चलाने का उदाहरण देते हुए कहा कि हर चालक को यातायात नियमों का पालन करना पड़ता है। लाल बत्ती पर रुकना, गति सीमा का ध्यान रखना और दूसरे वाहनों से सुरक्षित दूरी बनाए रखना दुर्घटना से बचने के लिए जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जीवन में भी नियम और अनुशासन की आवश्यकता होती है। बिना सोचे-समझे किए गए कार्य व्यक्ति को कठिनाई में डाल सकते हैं। उनके अनुसार, क्रोध में बोले गए शब्द संबंधों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जबकि लोभ और मोह निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। संयम इन भावनाओं को पहचानकर उन पर नियंत्रण रखने का अभ्यास है।
गृहस्थ भी अपना सकते हैं संयम: मुनिश्री उपशांतसागरजी
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि उत्तम संयम केवल साधु-संतों के लिए नहीं, बल्कि गृहस्थों के लिए भी आवश्यक है। व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में भोजन और वाणी में संयम रख सकता है। वह क्रोध पर नियंत्रण, अनावश्यक खर्च से बचने और अपनी इंद्रियों को अनुशासित करने का प्रयास भी कर सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि परिवार और समाज में रहने के लिए अनुशासन जरूरी है। यदि लोग केवल अपने अधिकारों पर ध्यान दें और कर्तव्यों को भूल जाएं, तो आपसी व्यवस्था प्रभावित होती है। उन्होंने आत्मानुशासन और कर्तव्य के महत्व को समझने का संदेश दिया।
धूप दशमी पर जिनालयों में अर्पित की धूप
दशलक्षण महापर्व के छठवें दिन धूप दशमी भी मनाई गई। इस अवसर पर जिनालयों में श्रद्धालुओं ने भगवान जिनेन्द्र देव को सुगंधित धूप अर्पित की और आत्मशुद्धि का संकल्प लिया। जैन परंपरा में धूप अर्पित करने के साथ राग-द्वेष और कषायों से दूर होने का भाव जोड़ा जाता है।
धर्मसभा में बताया गया कि धूप की सुगंध की तरह मनुष्य के आचरण में भी संयम, अहिंसा और सद्भाव दिखाई देना चाहिए। धूप दशमी पर हुई पूजा-अर्चना और उत्तम संयम धर्म की व्याख्या ने श्रद्धालुओं को अपने व्यवहार पर विचार करने का संदेश दिया।
