मुरैना में दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म की आराधना हुई। आचार्यश्री उदारसागर ने सत्य को जीवन में उतारने का संदेश दिया। कल धूप दशमी पर्व मनाया जाएगा।
सत्य आत्मा का स्वभाव, असत्य कर्म बंधन का कारण : आचार्यश्री उदारसागर
दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म की आराधना, कल मनाया जाएगा धूप दशमी पर्व
मुरैना (मनोज जैन नायक)। जैन समाज के प्रमुख धार्मिक पर्व दशलक्षण महापर्व के पांचवें दिन श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ उत्तम सत्य धर्म की आराधना की गई। इस अवसर पर ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सत्य आत्मा का स्वभाव है, जबकि असत्य आत्मा के स्वभाव के विपरीत आचरण और कर्म बंधन का कारण है।
आचार्यश्री ने कहा कि सत्य को केवल बोलने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि मनुष्य के विचार, व्यवहार और आचरण में भी सत्य दिखाई देना चाहिए। व्यक्ति कई बार धन, मान-सम्मान, अपने दोषों को छिपाने या दूसरे को नीचा दिखाने के लिए असत्य का सहारा लेता है। एक झूठ को छिपाने के लिए कई झूठ बोलने पड़ते हैं और इस तरह व्यक्ति स्वयं अपने लिए समस्याओं का जाल तैयार कर लेता है।
उन्होंने कहा कि सत्य बोलने वाला व्यक्ति भीतर से निर्भय और शांत रहता है, जबकि असत्य का सहारा लेने वाला व्यक्ति हमेशा अपने कथन के उजागर होने के भय में रहता है।
सत्य के साथ मधुरता, करुणा और विवेक जरूरी
आचार्यश्री उदारसागरजी ने कहा कि सत्य का अर्थ यह नहीं है कि किसी को कटु शब्द बोलकर यह कहा जाए कि हम सत्य बोल रहे हैं। सत्य के साथ हित और विवेक का होना आवश्यक है। वाणी में सत्य के साथ मधुरता, करुणा और संयम भी होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कोई बात सत्य होते हुए भी यदि किसी व्यक्ति को अनावश्यक पीड़ा पहुंचाती है या वैमनस्य उत्पन्न करती है, तो उसे कहने से पहले विवेक करना चाहिए। जैन धर्म सत्य के माध्यम से वाणी की शुद्धि और आत्मा की निर्मलता का मार्ग दिखाता है।
अपनी भूल स्वीकार करना भी सत्य धर्म की साधना
आचार्यश्री ने कहा कि उत्तम सत्य धर्म की शुरुआत स्वयं से होती है। दूसरों से सत्य की अपेक्षा करने से पहले व्यक्ति को स्वयं के प्रति ईमानदार होना चाहिए। अपनी कमियों को स्वीकार करना, अपनी भूल मानना और उसे सुधारने का प्रयास करना भी सत्य धर्म की साधना है।
उन्होंने कहा कि समाज में विश्वास की कमी का एक बड़ा कारण कथनी और करनी में अंतर है। व्यापार में ईमानदारी, परिवार में पारदर्शिता, समाज में विश्वास और धार्मिक जीवन में निष्कपटता सत्य धर्म के ही अलग-अलग रूप हैं।
भूल छिपाने के बजाय स्वीकार करें : मुनिश्री उपशांतसागर
मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि वाणी मनुष्य के व्यक्तित्व का आईना है। मुख से निकला एक शब्द किसी के जीवन में खुशी ला सकता है और वही शब्द किसी के हृदय को चोट भी पहुंचा सकता है।
उन्होंने कहा कि बोलने से पहले विचार करना चाहिए कि हमारी बात सत्य है या नहीं, आवश्यक है या नहीं और उससे किसी जीव को अनावश्यक पीड़ा तो नहीं होगी। सत्य बोलने के साथ सत्य को स्वीकार करने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि अपनी भूल को छिपाने के बजाय उसे स्वीकार करना और सुधारना ही सच्ची धर्म साधना है। उत्तम सत्य धर्म को केवल पूजा और प्रवचन तक सीमित न रखकर परिवार, व्यापार और सामाजिक व्यवहार में भी उतारना चाहिए।
कल मनाया जाएगा धूप दशमी पर्व
दिगम्बर जैन परंपरा में दशलक्षण महापर्व के दौरान मनाए जाने वाले धूप दशमी पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है। धूप दशमी पर्व कल श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर नगर के विभिन्न जिनालयों में श्रद्धालु भगवान जिनेन्द्र का अभिषेक, पूजन एवं आराधना कर शुद्ध और अहिंसक सामग्री से निर्मित सुगंधित धूप अर्पित करेंगे।
धूप अर्पित करने के पीछे आत्मा में व्याप्त राग-द्वेष और कषायों को दूर करने की भावना मानी जाती है। जिस प्रकार धूप की सुगंध चारों ओर फैलती है, उसी प्रकार जीवन में सदाचार, संयम, अहिंसा और धर्माचरण की सुगंध समाज में फैलाने का संदेश इस पर्व से मिलता है।
कल जैन समाज के श्रद्धालु नगर के विभिन्न जिनालयों में पहुंचकर पूजा-अर्चना, धर्म आराधना एवं धूप अर्पित कर आत्मशुद्धि का संकल्प लेंगे।


