हमें कर्मों से नहीं, परिणाम बिगड़ने से डरना चाहिए: पं. संयम शास्त्री
विदिशा के श्री शीतलनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म की आराधना, समयसार ग्रंथ पर स्वाध्याय जारी
विदिशा। किले के अंदर स्थित श्री शीतलनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म की श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ आराधना की गई। इस अवसर पर मुंबई से पधारे पंडित संयम शास्त्री ने समयसार ग्रंथ पर स्वाध्याय कराते हुए आत्मा, भेद-विज्ञान, परिणामों की शुद्धता और जीवन में सरलता के महत्व पर प्रकाश डाला।
मंदिर ट्रस्ट के प्रवक्ता डॉ. मक्खनलाल जैन ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के दौरान प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान, स्वाध्याय, संगीतमय भक्ति और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें समाजजन उत्साहपूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।
बाहर नहीं, अपने भीतर सुख खोजें
पंडित संयम शास्त्री ने समयसार ग्रंथ की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव अपने सभी कार्यों में सुख की खोज करता है, लेकिन उसे वास्तविक सुख प्राप्त नहीं हो पाता, क्योंकि उसकी दृष्टि अपने भीतर के बजाय बाहरी वस्तुओं और परिस्थितियों पर टिकी रहती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कोई व्यक्ति सोने के सोफे पर बैठा होने के बावजूद दुखी हो सकता है, क्योंकि उसके घर और मन में सुख-शांति नहीं है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य परिग्रह, भौतिक वस्तुओं और बाहरी सुविधाओं में सुख तलाशता रहता है। वास्तविक सुख बाहरी साधनों में नहीं, बल्कि आत्मा के स्वभाव को पहचानने और अपने परिणामों को शुद्ध बनाने में है।
उन्होंने कहा कि बाहरी संसाधन जीवन को सुविधाजनक बना सकते हैं, लेकिन मन की शांति और आत्मिक सुख के लिए व्यक्ति को अपने भीतर देखना होगा।
स्वच्छंद नहीं, स्वच्छ बनने का संदेश देता है समयसार
पंडित संयम शास्त्री ने कहा कि आचार्य कुंदकुंद ने समयसार ग्रंथ की रचना इसलिए नहीं की कि लोग इसे पढ़कर स्वच्छंद हो जाएं, बल्कि इसलिए की कि वे आत्मचिंतन के माध्यम से स्वच्छ बन सकें। समयसार व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने और जीवन के परिणामों को पवित्र करने की दिशा दिखाता है।
उन्होंने बताया कि मूल समयसार ग्रंथ की भाषा और विषय अत्यंत गूढ़ होने के कारण कविवर बनारसीदास ने इसे ब्रजभाषा में ‘समयसार नाटक’ के रूप में प्रस्तुत किया। इसका उद्देश्य जैन दर्शन के आत्मकल्याणकारी सिद्धांतों को सामान्य व्यक्ति तक सरल रूप में पहुंचाना था, ताकि प्रत्येक व्यक्ति इन्हें समझकर अपनी परिणति को पवित्र बना सके।
उन्होंने कहा, “मुझसे मेरा रिश्ता क्या है, यह रिश्ता मैं भूल गया।” इस पंक्ति के माध्यम से उन्होंने बताया कि मनुष्य का सबसे बड़ा अज्ञान यही है कि वह स्वयं को नहीं पहचानता। व्यक्ति संसार, परिवार और बाहरी वस्तुओं से संबंध बनाता है, लेकिन अपनी आत्मा के साथ संबंध को भूल जाता है।
भेद-विज्ञान समयसार ग्रंथ की आत्मा
पंडित संयम शास्त्री ने भेद-विज्ञान को समयसार ग्रंथ की आत्मा बताया। उन्होंने कहा कि ग्रंथ के प्रारंभिक द्वारों में जीव और अजीव के स्वरूप तथा कर्ता एवं कर्म के बीच के भेद को समझाया गया है।
उन्होंने कहा कि अज्ञानी व्यक्ति थोड़ी-सी प्रतिकूल परिस्थिति आने पर राग-द्वेष के परिणामों में डूब जाता है। जिस प्रकार लकड़ी आग में जलकर कोयला बन जाती है, उसी प्रकार अज्ञान से प्रभावित व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में अपने शांत और सहज स्वभाव को छोड़ देता है।
उन्होंने उदाहरण दिया कि दुकान पर ग्राहक न आने से दुखी हो जाना या पूजन में वाद्य यंत्र अच्छा नहीं बजने पर पूरी पूजा को खराब मान लेना बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होने का संकेत है। व्यक्ति अपने सुख-दुख का कारण परिस्थितियों को मानता है, जबकि वास्तविक परिवर्तन उसके आंतरिक परिणामों में होता है।
ज्ञानी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्वभाव नहीं छोड़ता
पंडित संयम शास्त्री ने कहा कि सोने को जितना अधिक तपाया जाता है, वह उतना ही निखरता है और अपना मूल स्वरूप नहीं छोड़ता। इसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति कठिन एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने ज्ञान भाव को नहीं छोड़ता।
उन्होंने कहा, “परिस्थिति पर हमारा नियंत्रण नहीं हो सकता, लेकिन अपने परिणामों पर नियंत्रण किया जा सकता है।” मनुष्य के जीवन में कौन-सी परिस्थिति कब आएगी, यह हमेशा उसके हाथ में नहीं होता, लेकिन उस परिस्थिति के प्रति उसका भाव और प्रतिक्रिया कैसी होगी, यह उसके पुरुषार्थ पर निर्भर है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि कर्म करते हुए भयभीत होने के बजाय अपने आंतरिक परिणामों को राग, द्वेष, क्रोध, छल और कपट से बचाने का प्रयास करना चाहिए।
भेद-विज्ञान का निरंतर अभ्यास जरूरी
पंडित संयम शास्त्री ने भेद-विज्ञान के अभ्यास की तुलना व्यायाम से करते हुए कहा कि जिस प्रकार जिम में एक दिन जाने से शरीर मजबूत नहीं बनता, बल्कि इसके लिए नियमित अभ्यास आवश्यक है, उसी तरह आत्मा और पर पदार्थ के भेद को समझने का अभ्यास भी प्रतिदिन करना चाहिए।
जब जीव भेद-विज्ञान के माध्यम से यह जान लेता है कि “मैं ज्ञाता-दृष्टा हूं और राग मेरा वास्तविक स्वरूप नहीं है”, तब उसके भीतर सम्यक दर्शन की धारा प्रारंभ होती है। इस अवस्था में व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से अत्यधिक प्रभावित होने के बजाय अपने आत्मस्वरूप में स्थिर रहने का प्रयास करता है।
मन, वचन और कर्म की एकरूपता है उत्तम आर्जव
सायंकालीन स्वाध्याय में दशलक्षण महापर्व के तीसरे धर्म उत्तम आर्जव की व्याख्या की गई। पंडित संयम शास्त्री ने कहा कि मन, वचन और कर्म में एकरूपता होना ही उत्तम आर्जव धर्म है।
व्यक्ति के मन में जो भाव हो, उसकी वाणी और आचरण भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। छल-कपट, दिखावा, मायाचारी और कुटिलता से दूर रहना सच्ची सरलता है। उन्होंने कहा कि आर्जव धर्म व्यक्ति को भीतर और बाहर से एक समान बनने तथा निष्कपट जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
ट्रस्ट के प्रवक्ता डॉ. मक्खनलाल जैन ने बताया कि प्रतिदिन सायंकाल संगीतमय भक्ति और विभिन्न ज्ञानवर्धक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। ट्रस्ट अध्यक्ष मलूकचंद जैन ने सभी समाजजनों से अधिक संख्या में उपस्थित होकर धार्मिक कार्यक्रमों का लाभ लेने की अपील की है।
