दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म पर हुआ प्रवचन, मन-वचन-कर्म की एकरूपता का दिया संदेश
मुरैना (मनोज जैन नायक) । दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में श्रद्धा और भक्ति का माहौल रहा। इस अवसर पर ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने श्रद्धालुओं को धर्म के तीसरे लक्षण उत्तम आर्जव धर्म का महत्व समझाया।
आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि आर्जव का अर्थ मन, वचन और काय की सरलता है। जिसके जीवन में कथनी और करनी में अंतर नहीं होता तथा जिसके मन में किसी के प्रति छल-कपट नहीं रहता, वही वास्तविक रूप से आर्जव धर्म का पालन करता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में अनेक परेशानियों का कारण सरलता का अभाव और कपटपूर्ण व्यवहार है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति जैसा भीतर सोचता है, वैसा बाहर नहीं बोलता और कई बार जैसा बोलता है, वैसा आचरण भी नहीं करता। मन, वचन और कर्म की यह असमानता जीवन में अशांति और तनाव को जन्म देती है। आर्जव धर्म व्यक्ति को अपने भीतर और बाहर एकरूपता लाने की प्रेरणा देता है।

आचार्यश्री ने कहा कि कपट मन को बोझिल बनाता है, जबकि सरलता मन को हल्का और शांत करती है। व्यक्ति दूसरों को छल सकता है, लेकिन अपनी आत्मा को नहीं छल सकता। इसलिए आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए मन से विकार, वचन से छल और व्यवहार से दिखावा छोड़ना जरूरी है। दशलक्षण पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रत्येक धर्म के मर्म को जीवन में उतारने का प्रयास होना चाहिए।
सरलता ही आर्जव धर्म का सार
मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि आर्जव का अर्थ सरलता, निष्कपटता और मन-वचन-काय की एकरूपता है। मन में कुछ और, वचन में कुछ और तथा व्यवहार में कुछ और होना आर्जव धर्म के विपरीत है। जीवन में छल-कपट बढ़ने के साथ मन की अशांति भी बढ़ती जाती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य कई बार दूसरों को प्रसन्न करने, स्वार्थ पूरा करने या अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए वास्तविकता को छिपाता है। धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाती है। बाहर से अच्छा दिखाई देने के बावजूद यदि मन में कपट है तो आत्मिक शांति प्राप्त करना कठिन है।
मुनिश्री ने कहा कि सरल व्यक्ति को दिखावे की आवश्यकता नहीं होती। वह जैसा भीतर होता है, वैसा ही बाहर दिखाई देता है। उसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं होता और ऐसे व्यक्ति पर परिवार, समाज तथा मित्रों का विश्वास स्वतः स्थापित होता है।
