क्लर्क कॉलोनी जैन मंदिर में स्वर्ण कलशों से हुआ भगवान महावीर का अभिषेक
संगीतमय पूजन के साथ मनाया उत्तम मार्दव धर्म, पं. नवीन जैन ने बताया विनम्रता और अहंकार त्याग का महत्व
इंदौर। पर्वाधिराज पर्युषण एवं दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर क्लर्क कॉलोनी स्थित दिगंबर जैन मंदिर में श्रद्धा और भक्ति के साथ धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। मंदिर के मूलनायक भगवान महावीर स्वामी का स्वर्ण कलशों से अभिषेक किया गया। इसके बाद मंत्रोच्चार के बीच शांतिधारा संपन्न हुई। बड़ी संख्या में उपस्थित समाजजनों ने भगवान महावीर का अभिषेक एवं पूजन कर विश्व शांति, सुख-समृद्धि और आत्मकल्याण की कामना की।
अभिषेक और शांतिधारा के बाद देव-शास्त्र-गुरु, भगवान महावीर, सोलह कारण, पंचमेरु एवं दशलक्षण धर्म की संगीतमय पूजा की गई। भक्ति संगीत और धार्मिक मंत्रों से मंदिर परिसर का वातावरण धर्ममय हो गया। श्रद्धालुओं ने उत्साह के साथ पूजन में भाग लेते हुए उत्तम मार्दव धर्म को अपने जीवन में धारण करने का संकल्प लिया।
मार्दव का अर्थ कोमलता और विनम्रता
कार्यक्रम में पंडित नवीन जैन ने उत्तम मार्दव धर्म का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मार्दव का अर्थ मन, वचन और व्यवहार में कोमलता एवं विनम्रता बनाए रखना तथा अहंकार का त्याग करना है। मान और अहंकार को छोड़ना ही उत्तम मार्दव धर्म का मूल भाव है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी जाति, कुल, रूप, धन, ज्ञान, पद अथवा प्रतिष्ठा पर अभिमान नहीं करना चाहिए। सांसारिक उपलब्धियां स्थायी नहीं होतीं। इन पर किया गया घमंड व्यक्ति को धर्म और आत्मकल्याण के मार्ग से दूर कर सकता है। प्रत्येक जीव को अपने समान समझकर उसके साथ विनम्र और सम्मानपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।
सफलता में अहंकार और असफलता में निराशा न हो
पंडित नवीन जैन ने कहा कि जीवन में सफलता मिलने पर अहंकार नहीं करना चाहिए और असफलता आने पर निराश नहीं होना चाहिए। परिस्थितियां सदैव एक जैसी नहीं रहतीं। इसलिए व्यक्ति को हर स्थिति में संयम, धैर्य और विनम्रता बनाए रखनी चाहिए।
अपने ज्ञान, सामर्थ्य और उपलब्धियों को दूसरों से श्रेष्ठ मानना घमंड का कारण बन सकता है। सच्चा ज्ञानी वही है, जो ज्ञान प्राप्त करने के बाद और अधिक विनम्र हो जाए। जिस प्रकार फल से लदा वृक्ष झुक जाता है, उसी प्रकार गुणवान व्यक्ति भी नम्रता से युक्त होता है।
उन्होंने कहा कि विनम्रता मनुष्य को दूसरों के प्रति मैत्री, करुणा और सम्मान का भाव रखने की प्रेरणा देती है। मार्दव धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र के व्यवहार में भी उतारना आवश्यक है।
मधुर एवं हितकारी वचन बोलने की प्रेरणा
धर्मसभा में बताया गया कि कठोर वाणी और अपमानजनक व्यवहार से बचना चाहिए। मनुष्य को ऐसे मधुर एवं हितकारी वचन बोलने चाहिए, जिनसे किसी दूसरे व्यक्ति के मन को ठेस न पहुंचे। वाणी की कठोरता संबंधों में दूरी उत्पन्न करती है, जबकि नम्र और मधुर व्यवहार लोगों को जोड़ता है।
दूसरों की गलतियां देखकर स्वयं को श्रेष्ठ समझने के बजाय व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य में कोई न कोई कमी होती है। अपनी कमियों को पहचानकर उनमें सुधार करना ही धर्म साधना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। दूसरों को छोटा दिखाने से व्यक्ति महान नहीं बनता, बल्कि स्वयं के दोषों को दूर करने से वास्तविक महानता प्राप्त होती है।
शरीर, धन और पद सभी नश्वर
पंडित नवीन जैन ने कहा कि उत्तम मार्दव धर्म हमें याद दिलाता है कि शरीर, धन, पद और प्रतिष्ठा सभी नश्वर हैं। इनके कारण किया गया अभिमान व्यर्थ है। मनुष्य संसार में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है। इसलिए जीवन में प्राप्त साधनों का उपयोग सेवा, परोपकार और धर्म के लिए करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि क्षमा, दया, प्रेम और सम्मान की भावना को जीवन में अपनाने से मार्दव धर्म सार्थक होता है। अहंकार छोड़ना, विनम्रता अपनाना और प्रत्येक जीव का सम्मान करना ही उत्तम मार्दव धर्म का सार है।
बड़ी संख्या में शामिल हुए समाजजन
मीडिया प्रभारी प्रवीण जैन ने बताया कि धार्मिक आयोजन में प्रथम जैन, रमेश जैन, दिलीप बज, एसके सोगानी, संजय जैन, विशाल जैन, पिंटू अजमेरा, डम्पी जैन, शम्भू पाटोदी, रोहित पाटनी, रमणिक जैन, विमल डेडी और अनिल गोठाने सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
पूजन के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव के साथ भगवान महावीर के सिद्धांतों पर चलने और अपने जीवन से मान, अहंकार एवं घमंड को दूर करने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंत में विश्व शांति और समस्त जीवों के कल्याण की मंगल भावना व्यक्त की गई।
