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Chinmoy Krishna Das Case: TMC का भाजपा पर निशाना, कुणाल घोष बोले—सत्ता मिलने के बाद बांग्लादेशी हिंदू संत को भूल गई पार्टी

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Published On: 12 September 2026
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Chinmoy Krishna Das Case: TMC का भाजपा पर निशाना, कुणाल घोष बोले—सत्ता मिलने के बाद बांग्लादेशी हिंदू संत को भूल गई पार्टी

दैनिक स्वराज वाणी, कोलकाता। बांग्लादेश में जेल में बंद हिंदू धार्मिक नेता चिन्मय कृष्ण दास ब्रह्मचारी को लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। तृणमूल कांग्रेस नेता एवं विधायक कुणाल घोष ने भारतीय जनता पार्टी पर इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए चिन्मय कृष्ण दास की रिहाई की मांग को लेकर प्रदर्शन किए, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनकी स्थिति पर चुप्पी साध ली।

कुणाल घोष का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब चिन्मय कृष्ण दास की मां संध्या रानी धर का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। बांग्लादेश प्रशासन ने उन्हें मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए केवल पांच घंटे की पैरोल दी थी। अंतिम संस्कार के बाद उन्हें दोबारा जेल ले जाया गया।

कुणाल घोष ने भाजपा से पूछा सवाल

टीएमसी नेता कुणाल घोष ने कहा कि जब भाजपा पश्चिम बंगाल में विपक्ष की भूमिका में थी, तब उसके नेताओं ने चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया था।

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने उस समय संत की रिहाई की मांग को लेकर धरने और विरोध प्रदर्शन किए, लेकिन सत्ता में आने के बाद इस विषय को भुला दिया। घोष ने भाजपा नेतृत्व से पूछा कि चिन्मय कृष्ण दास की रिहाई और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए अब तक क्या कूटनीतिक पहल की गई।

ये सभी आरोप कुणाल घोष और तृणमूल कांग्रेस का राजनीतिक पक्ष हैं। भाजपा की ओर से इन आरोपों पर तत्काल कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। भाजपा का पक्ष आने पर ही इस राजनीतिक विवाद की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।

मां के निधन के बाद मिली पांच घंटे की पैरोल

चिन्मय कृष्ण दास की मां संध्या रानी धर का 10 सितंबर को बांग्लादेश के चटगांव स्थित हथाजारी क्षेत्र में निधन हो गया था। वह करीब 70 वर्ष की थीं और लंबे समय से कैंसर सहित दूसरी बीमारियों से पीड़ित थीं।

परिवार ने उनकी मृत्यु से पहले चिन्मय कृष्ण दास को मां से मिलवाने के लिए पैरोल का आवेदन किया था, लेकिन उस समय अनुमति नहीं मिली। मां के निधन के बाद परिवार ने दोबारा आवेदन किया। इसके बाद चटगांव जिला प्रशासन ने चिन्मय दास को अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए पांच घंटे की पैरोल मंजूर की।

इस सीमित अवधि के दौरान उन्हें हथाजारी स्थित पुंडरीक धाम ले जाया गया। अंतिम संस्कार पूरा होने के बाद चिन्मय कृष्ण दास को वापस चटगांव केंद्रीय जेल पहुंचाया गया। बांग्लादेशी मीडिया ने जिला प्रशासन के अधिकारियों के हवाले से इसकी पुष्टि की है।

कौन हैं चिन्मय कृष्ण दास?

चिन्मय कृष्ण दास ब्रह्मचारी बांग्लादेश सम्मिलित सनातनी जागरण जोत के प्रवक्ता रहे हैं। वह बांग्लादेश में हिंदू समुदाय और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं।

उनका पारिवारिक नाम चंदन कुमार धर बताया जाता है। धार्मिक दीक्षा लेने के बाद उन्होंने चिन्मय कृष्ण दास ब्रह्मचारी नाम अपनाया। वह हथाजारी स्थित पुंडरीक धाम से भी जुड़े रहे हैं।

वर्ष 2024 में बांग्लादेश की राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बाद अल्पसंख्यक समुदायों पर कथित हमलों के विरोध में उन्होंने कई कार्यक्रमों और रैलियों में हिस्सा लिया। उनकी सभाओं में हिंदू समुदाय की सुरक्षा, मंदिरों की रक्षा और अल्पसंख्यकों के अधिकारों से जुड़ी मांगें उठाई गईं।

नवंबर 2024 में हुई थी गिरफ्तारी

बांग्लादेश पुलिस ने चिन्मय कृष्ण दास को 25 नवंबर 2024 को ढाका के शाहजलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया था। उनके खिलाफ राष्ट्रीय ध्वज के कथित अपमान से जुड़ा राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया था।

उनकी गिरफ्तारी के अगले दिन चटगांव की अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए उन्हें जेल भेजने का आदेश दिया। इसके बाद अदालत परिसर के बाहर उनके समर्थकों और पुलिस के बीच तनाव तथा हिंसक झड़पें हुई थीं।

इन झड़पों के दौरान वकील सैफुल इस्लाम अलीफ की हत्या हो गई थी। बाद में पुलिस जांच में चिन्मय कृष्ण दास का नाम भी इस मामले में आरोपी के रूप में शामिल किया गया। हालांकि उनके खिलाफ आरोपों पर अदालत में सुनवाई जारी है और दोष सिद्ध होने तक उन्हें दोषी नहीं माना जा सकता।

कई मामलों में मिली जमानत, फिर भी जेल में

बांग्लादेशी मीडिया की नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार चिन्मय कृष्ण दास के खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित हैं। उन्हें कुछ मामलों में हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है, लेकिन शेष मामलों में गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया जारी होने के कारण वह जेल से स्थायी रूप से रिहा नहीं हुए हैं।

वकील सैफुल इस्लाम अलीफ की हत्या से जुड़े मामले में चिन्मय दास सहित कई लोगों के खिलाफ आरोपपत्र पेश किया गया है। यह मामला चटगांव के स्पीडी ट्रायल ट्रिब्यूनल में विचाराधीन बताया गया है।

चिन्मय दास की पांच घंटे की पैरोल केवल उनकी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए दी गई थी। इसे किसी मामले में जमानत या स्थायी रिहाई नहीं माना जा सकता।

बंगाल की राजनीति में क्यों बना मुद्दा?

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद भारत, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में इसका राजनीतिक असर दिखाई दिया था। भाजपा ने बांग्लादेश में हिंदुओं पर कथित अत्याचार और चिन्मय दास की गिरफ्तारी को लेकर विरोध प्रदर्शन किए थे।

उस समय भाजपा नेताओं ने केंद्र सरकार से बांग्लादेश के सामने यह मामला मजबूती से उठाने की मांग की थी। तृणमूल कांग्रेस ने भी अल्पसंख्यकों पर हमलों की निंदा की, लेकिन साथ ही कहा था कि बांग्लादेश से जुड़ा विषय अंतरराष्ट्रीय मामला है और इस पर कार्रवाई का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।

दिसंबर 2024 में कुणाल घोष बांग्लादेश में चिन्मय दास का मुकदमा लड़ रहे अधिवक्ता रवींद्र घोष से भी मिले थे। उन्होंने उस समय हिंदुओं और दूसरे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर चिंता जताई थी।

टीएमसी ने भाजपा की राजनीतिक मंशा पर उठाए सवाल

कुणाल घोष का कहना है कि भाजपा ने पश्चिम बंगाल की तत्कालीन राजनीति में बांग्लादेश और चिन्मय दास के मुद्दे का इस्तेमाल किया था। अब उन्होंने भाजपा से पूछा है कि सत्ता मिलने के बाद पार्टी ने संत की रिहाई के लिए कौन-से कदम उठाए।

टीएमसी का आरोप है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों पर बड़े प्रदर्शन किए, लेकिन सरकार में आने के बाद उन्हीं विषयों पर उसका रुख बदल गया।

हालांकि विदेश नीति, दूसरे देश में चल रही न्यायिक प्रक्रिया और किसी भारतीय राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग विषय हैं। बांग्लादेश में बंद किसी व्यक्ति की रिहाई का फैसला वहां की अदालत और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है। भारत सरकार कूटनीतिक स्तर पर चिंता या अनुरोध दर्ज करा सकती है, लेकिन कानूनी आदेश बांग्लादेश की न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

भारत ने गिरफ्तारी पर जताई थी चिंता

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद भारत ने बांग्लादेश में हिंदुओं और दूसरे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। भारत की ओर से बांग्लादेश सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके धार्मिक स्थलों की रक्षा करने की अपील की गई थी।

बांग्लादेश ने इसे अपना आंतरिक मामला बताते हुए वहां की न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करने की बात कही थी। इसके बाद भी दोनों देशों के बीच अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का विषय विभिन्न कूटनीतिक वार्ताओं में उठता रहा है।

भाजपा के जवाब का इंतजार

कुणाल घोष के आरोपों के बाद अब भाजपा की प्रतिक्रिया का इंतजार है। पार्टी यह स्पष्ट कर सकती है कि चिन्मय कृष्ण दास की रिहाई और बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की सुरक्षा को लेकर उसने सरकार या कूटनीतिक स्तर पर क्या प्रयास किए हैं।

यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और भारत-बांग्लादेश संबंधों से जुड़ा होने के साथ पश्चिम बंगाल की घरेलू राजनीति का भी हिस्सा बन गया है। चिन्मय कृष्ण दास के विरुद्ध चल रहे मामलों का अंतिम फैसला बांग्लादेश की अदालत करेगी। ऐसे में राजनीतिक दलों के दावों से अलग न्यायिक प्रक्रिया और प्रमाणित तथ्यों पर ध्यान देना आवश्यक होगा।

 

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