Stock Market Crash: खुलते ही 700 अंक टूटा सेंसेक्स, निफ्टी 23,250 के नीचे; ₹5 लाख करोड़ घटा मार्केट कैप
कच्चा तेल 108 डॉलर के पार और पश्चिम एशिया में तनाव से बिकवाली; इंडिगो, टाटा स्टील, बजाज फाइनेंस और M&M समेत कई दिग्गज शेयर टूटे
मुंबई। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन शुक्रवार, 11 सितंबर को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत भारी गिरावट के साथ हुई। कमजोर वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण निवेशकों ने बड़े पैमाने पर बिकवाली की। शुरुआती कारोबार में बीएसई सेंसेक्स 700 अंक से अधिक नीचे चला गया, जबकि एनएसई निफ्टी 23,250 अंक के स्तर से नीचे पहुंच गया।
सुबह करीब 9:14 बजे सेंसेक्स 708.56 अंक यानी 0.95 प्रतिशत गिरकर 74,194.03 पर कारोबार कर रहा था। निफ्टी 234.10 अंक यानी लगभग एक प्रतिशत टूटकर 23,243.70 पर पहुंच गया। कारोबार के शुरुआती मिनटों में बिकवाली और बढ़ने से सेंसेक्स करीब 740 अंक तक नीचे गया और निफ्टी ने लगभग 23,231 का निचला स्तर छुआ।
बाजार में आई इस गिरावट के कारण बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण शुरुआती पांच मिनट में करीब पांच से छह लाख करोड़ रुपये घट गया। हालांकि इसे निवेशकों की जेब से निकली वास्तविक नकद राशि नहीं कहा जाता। यह शेयरों के भाव कम होने से कंपनियों के कुल बाजार मूल्य में आई गिरावट है।
30 में से 26 सेंसेक्स शेयर लाल निशान में
बाजार में गिरावट कुछ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं रही। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स की 30 कंपनियों में से 26 के शेयर लाल निशान में कारोबार कर रहे थे। केवल चार कंपनियों के शेयरों में बढ़त दिखाई दी।
इंडिगो, टाटा स्टील, बजाज फाइनेंस, महिंद्रा एंड महिंद्रा और एक्सिस बैंक जैसे प्रमुख शेयरों पर बिकवाली का दबाव रहा। इंडिगो का शेयर शुरुआती कारोबार में करीब 2.47 प्रतिशत टूट गया। टाटा स्टील में लगभग 2.29 प्रतिशत, बजाज फाइनेंस में 2.17 प्रतिशत और महिंद्रा एंड महिंद्रा में करीब 2.06 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
इसके विपरीत HCL टेक्नोलॉजीज, टेक महिंद्रा और इन्फोसिस जैसे कुछ आईटी शेयरों में शुरुआती बढ़त दिखाई दी। HCL टेक में करीब 1.17 प्रतिशत, टेक महिंद्रा में 1.03 प्रतिशत और इन्फोसिस में लगभग 0.59 प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई।
कच्चा तेल 108 डॉलर के पार
भारतीय बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजहों में कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल शामिल है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 108 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। कुछ समय के लिए यह 109 डॉलर के आसपास भी कारोबार करता दिखाई दिया।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से देश का आयात खर्च बढ़ने, महंगाई तेज होने और रुपये पर दबाव आने की आशंका रहती है। ईंधन महंगा होने पर परिवहन तथा उत्पादन लागत भी बढ़ सकती है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ने का खतरा रहता है।
तेल की बढ़ती कीमतों का सबसे अधिक दबाव विमानन, ऑटोमोबाइल, पेंट, टायर और ऐसे उद्योगों पर पड़ सकता है, जिनकी लागत में ईंधन या पेट्रोलियम उत्पादों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही कारण है कि शुरुआती कारोबार में इंडिगो और ऑटो कंपनियों के शेयरों में तेज गिरावट देखी गई।
पश्चिम एशिया के तनाव ने बढ़ाई चिंता
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास जहाजों तथा ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितता के कारण कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है।
वैश्विक व्यापार के लिए ये समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण हैं। किसी तरह की बाधा पैदा होने पर तेल और माल ढुलाई महंगी हो सकती है। इसी आशंका से निवेशक जोखिम वाले शेयरों से पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
रॉयटर्स के अनुसार सुबह 9:35 बजे निफ्टी 0.92 प्रतिशत गिरकर 23,261.70 और सेंसेक्स 0.84 प्रतिशत टूटकर 74,272.61 पर था। दोनों सूचकांक 11 जून के बाद अपने सबसे निचले स्तर तक पहुंचे।
16 में से 15 सेक्टरों में गिरावट
शुक्रवार की बिकवाली व्यापक रही और 16 प्रमुख सेक्टरों में से 15 गिरावट के साथ कारोबार करते दिखाई दिए। मेटल, वित्तीय सेवा और ऑटोमोबाइल शेयरों में ज्यादा कमजोरी रही।
मेटल इंडेक्स लगभग 2.8 प्रतिशत, वित्तीय शेयर करीब 1.4 प्रतिशत और ऑटो सेक्टर लगभग 1.3 प्रतिशत नीचे रहा। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में प्रमुख सूचकांकों से अधिक गिरावट दिखाई दी। स्मॉलकैप इंडेक्स करीब 1.2 प्रतिशत और मिडकैप इंडेक्स लगभग 1.4 प्रतिशत टूट गया।
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का लाभ कुछ ऊर्जा उत्पादक कंपनियों को मिला। ONGC और ऑयल इंडिया जैसे शेयरों में तुलनात्मक मजबूती दिखाई दी।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ने भी बनाया दबाव
अमेरिका में 10 साल की ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड पांच प्रतिशत के करीब पहुंचने से वैश्विक शेयर बाजारों पर दबाव बढ़ा है। बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर निवेशकों को अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले सरकारी बॉन्ड में बेहतर रिटर्न मिलने लगता है। ऐसी स्थिति में शेयर बाजार से पूंजी निकलने की आशंका बढ़ जाती है।
अमेरिकी ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहने की चिंता भी बाजार को प्रभावित कर रही है। महंगे कच्चे तेल से वैश्विक महंगाई बढ़ी तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती टाल सकते हैं अथवा जरूरत पड़ने पर सख्त मौद्रिक नीति अपना सकते हैं।
एशियाई बाजारों में भी भारी बिकवाली
भारतीय बाजार की कमजोरी के पीछे एशियाई बाजारों की गिरावट भी एक बड़ा कारण रही। जापान का निक्केई लगभग 2.8 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया का कोस्पी करीब 2.3 प्रतिशत नीचे आया। हांगकांग, चीन, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान के शेयर बाजारों पर भी दबाव देखा गया।
अमेरिकी बाजारों में लगातार चौथे सत्र गिरावट रहने के बाद एशियाई बाजारों की शुरुआत कमजोर हुई थी। वैश्विक संकेतों का असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई दिया।
रुपया कमजोर, विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और डॉलर की मांग बढ़ने से भारतीय रुपये पर भी दबाव बना। शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 95.79 के आसपास पहुंच गया। कमजोर रुपये से आयात महंगा होता है और महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली भी बाजार के लिए नकारात्मक संकेत बनी हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विदेशी निवेशकों ने पिछले कारोबारी सत्र में करीब 438.24 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे। इसके विपरीत घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगभग 1,025.85 करोड़ रुपये की खरीदारी की।
क्या इसे वास्तव में ‘मार्केट क्रैश’ कहा जाए?
मीडिया और सोशल मीडिया में तेज गिरावट को सामान्यतः ‘मार्केट क्रैश’ कहा जा रहा है, लेकिन सेंसेक्स और निफ्टी की करीब एक प्रतिशत की शुरुआती गिरावट को तकनीकी रूप से बड़ी बिकवाली या तेज गिरावट कहना अधिक उपयुक्त है। वास्तविक क्रैश में सूचकांकों में बहुत कम समय के भीतर असाधारण और कई प्रतिशत की गिरावट होती है।
बाजार दिनभर बदलता रहता है, इसलिए शुरुआती स्तरों को बंद होने का अंतिम आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए। निवेशकों को केवल सुर्खियों या घबराहट के आधार पर फैसला लेने के बजाय अपनी जोखिम क्षमता, निवेश अवधि और वित्तीय सलाहकार की राय को ध्यान में रखना चाहिए।
